Friday, 27 November 2020

पी. जीवानन्दम बहादुर कम्युनिस्ट नेता

 P Jeevanandham 2010 stamp of India.jpgநேர்மையான அரசியலின் அடையாளம் ஜீவானந்தம்! | Honest Politician: Tribute to  JeevanandamP. Jeevanandham

 पी. जीवानन्दम का जन्म 21 जून1907 को तमिलनाडु के कन्याकुमारी जिले के भूथापन्डी गांव में हुआ था।उनके पिता पट्टणपिल्लै गरीब किसान थे। उनकी माता का नाम उमाइ अम्मईथा। वे ‘जीवा’ के नाम से पुकारे जाते थे और उनके माता-पिता ने उनकानाम मूक्कांडी रखा था। उन्हें सोरी मुथुभी कहा जाता था जो उनका कुलदेवताथा।जीवा की प्राथमिक शिक्षा भूथापन्डीइंगलिश मिड्ल स्कूल में हुई। वे ऐसेसमय में रह रहे थे जब जाति-आधारितकठोर  नियम  व्याप्त  थे।  उन्होंने  घोरछूआछूत अपनी आंखों से देखा जबदलित मित्रों को मंदिरों में प्रवेश नहींमिलता था।पढ़ाई  के  दौरान  ही  वे  विद्यार्थीगतिविधियों  में  शामिल  हो  चुके  थे।उन्होंने स्टूडेंट सोशल सर्विस लीग, ड्रामाग्रुप,  लाइब्रेरी  और  खेलकूद  संबध्ांगतिविधियों  में  हिस्सा  लिया।  उन्होंनेविद्यार्थी जीवन के दौरान ‘स्वतंत्र वीरन’नामक उपन्यास की रचना की। उन्होंने खादी और आजादी के आंदोलन सैंकड़ों गीतों  की  रचना  की।  उन्होंने  दलितमित्रों  को  जति-विरोधी  आंदोलनें  में उतारा।महात्मा गांधी के आंदोलन का जीवापर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने 1924के वाइकोम सत्याग्रह में सक्रिय हिस्सा लिया। यह आंदोलन भूतपूर्व त्रावणकोर राज्य में हुआ था।दलितों को वाइकोम मंदिर तक जाने से रोका जाता था।सुचिन्द्रम मंदिर में भी उन्होंने ऐसा ही किया।वे राष्ट्रीय आंदोलन के महत्वपूर्णनेता  वी.वी.उस.  अ ̧यर  के  भारद्वाज आश्रम में शामिल हो गए। आश्रम में उन्होंने पाया कि भोजन के मामले में गैर-ब्राह्मण लोगों के साथ भेदभाव होता है। जीवा ने इसका तीव्र विरोध किया।उन्होंने  ई.वी.  रामास्वामी,  डॉ.  पी.वरदराजुलु नायडु तथा अन्य के साथ मिलकर इसे खत्म करने की मांग की।परिणामस्वरूप  उच्च-जाति  केअंध-जाति वादियों ने आश्रम ही बंद करवा दिया।जीवा  तथा  उनके  साथियों  नेरामनाड जिले में कराइकुडी के नजदीक समाज सुधारक औरकम्युनिस्ट आंदोलन के निर्माता सिरूवायाल में एक नया आश्रम खोला।इसमें राष्ट्रीय शिक्षा, रात्रि स्कूल औरकताई वर्ग आरंभ किए गए। जीवा वहां रहा करते थे। जब गांधीजी वहां आएतो  उन्होंने  विशेषतौर  पर  जीवा  सेमुलाकात की।1930 में वे सी. राजगोपालाचारी के नेतृत्व में नमक सत्याग्रह में शामिलहोना चाहते थे लेकिन साथियों ने मनाकर दिया क्योंकि इससे आश्रम के काममें खलल पड़ता था।जीवा  जल्द  ही  ‘आत्म-सम्मानआंदोलन’ में शामिल हो गए जिसका नेतृत्व  पेरियार ई.वी. रामास्वामी कर रहे थे। 1930 में वे ईरोड में इसके ऐतिहासिक सम्मेलन में शामिल हो गए।वहीं सिंगारवेलु ने अपना समाजवादी कार्य  प्रस्तुत  किया।  जीवन  के  लेखविभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए जैसेकुडिअरसू  ;गणतंत्र,  पहुथारिवु;वर्कशास्त्र, समधर्म ;समाजवाद और पुराची ;क्रांति।1931  में  अंग्रेजों  ने  जीवा  को भगत सिंह की रचना ‘‘मैं नास्तिक हूं’’के अनुवाद करने के लिए गिरफ्तार कर लिया। जेल में उनकी मुलाकात बटुकेश्वर दत्त, जीवनलाल जोशी तथा अन्य क्रांतिकारियों से हुई।जेल से रिहा होने के बाद जीवा ने ईरोड में नवजीवन सम्मेलन आयोजितकिया। इसकी अध्यक्षता जतीन्द्र नाथ दास के भाई किरणदास ने की थी।मार्क्सवाद-लेनिनवाद का प्रभाव जीवा पर मार्क्सवाद-लेनिनवाद का गहरा   प्रभाव   पड़ा।   उन्होंने जमींदार-विरोधी सम्मेलन आयोजित किए  और  इस  प्रकार  आंदोलन  का मूलगामीकरण किया। वे सिंगारवेलु केनिरंतर संपर्क में थे। सिंगारवेलु और सकलतवाला ने पेरियार ई.वी. रामास्वामी को  अध्ययन  के  लिए  सोवियत  संघ भेजने की योजना बनाई।फिर भी आंदोलन में कुछ ऐसे लोग थे जो इसे आगे बढ़ने से रोकना चाहते थे। जीवा इससे बाहर निकल आए और‘आत्मसम्मान  समाजवादी  पार्टी’  कीस्थापना  की।  इसका  उद्देश्य  था समाजवाद  के  झंडे-तले  युवाओं  को गोलबंद करना। इस संगठन का प्रथम सम्मेलन1938  में  त्रिची  में  संपन्न हुआ। सम्मेलन में एस.ए. डांगे ने भाग लिया।डांगे ने सलाह दी कि पार्टी कांग्रेस में शामिल होकर काम करे। इस प्रकार उसे  समाजवादियों  का  संयुक्त  मंच बनाया जाय।1936 में भा.क.पा. की केंद्रीय समिति  ने  एस.वी.  घाटे  को  प्रदेश  में पार्टी के गठन के लिए भेजा। ए.एस.के., बी. श्रीनिवास राव और सुंदरै ̧या केसाथ मिलकर उन्होंने कार्य आरंभ करदिया।1936 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी;सी.एस.पी.का  प्रादेशिक  सम्मेलन सेलम में आयोजित किया गया जिसकी अध्यक्षता दिनकर मेहता ने की जीवा प्रादेशिक पार्टी के महासचिव बनाए गए।सी.एस.पी. के जरिये जीवा के संपर्क कम्युनिस्टों से बनने लगे। 1936 में मद्रास प्रादेशिक एटक का गठन किया गया। जीवा इसके अध्यक्ष बनाए गएऔर पी. सुंदरैया सचिव। इसी बीच जीवा भाकपा में  शामिल हो गए। इस बीच वे ए.आई.सी.सी. के सदस्य भी बनाए गए।1937 के आम चुनावों में जीवाने सारे प्रदेश की यात्रा की और जस्टिस पार्टी की साम्राज्य-परस्त नीतियों का पर्दाफाश किया। चुनावों में कांग्रेस की भारी जीत हुई।प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद मजदूरों के विशाल पैमाने पर आंदोलन फूट पड़े। जीवा को गिरफ्तारकर लिया गया।इस बीच 1937 में ‘जनशक्ति’साप्ताहिक की स्थापना की गई। इस काम में जीवा के साथ एस.वी. घाटे, ए.एस.के., श्रीनिवासन राव, पी. राममूर्ति,के मुरूगेसन तथा अन्य साथी भी सक्रिय रूप से शामिल थे।जीवा एस.वी. घाटे से मिलने मंगलौर गए। लेकिन अंग्रेज ने उन्हें मिलने नहीं दिया। उन्हें 11 जनवरी 1940 को प्रदेश  छोड़ने  का  आदेश  दिया  गया।उन्हें पांडिचेरी नहीं जाने दिया गया।जब वे बंबई आए तो उन्हें भायखला जेल में बंद कर दिया गया। कुछ महीनों बाद उन्हें वेल्लोर जेल भेज दिया गया।वेल्लोर  जेल  में  जीवा  की  मुलाकात भाकपा  के  कई  सारे  नेताओं  से  हुई जिनमें घाटे भी थे। वह मार्च 1940की  बात  है।  जेल  में  लगभग  150साथी थे। कई कांग्रेसी भी थे। जेल में‘कम्युनिस्ट कन्सॉलिडेशन’ कमिटि का गठन किया गया और साथ ही सबों कीदेखभाल  के  लिए  एक  कम्यून  कीस्थापना की गई।1942 में सभी कम्युनिस्टों कारिहा कर दिया गया। लेकिन जीवा कोपुलिस ने फिर गिरफ्तार कर त्रावणकोर भेज  दिया  जहां  उन्हें  6  महीने  रखागया।  इसके  बाद  उन्हें  अपने  गांवभूथापन्डी में नजरबंद कर दिया गया।वहां वे 1944 तक रहे। उन्हें 1945तक मद्रास प्रदेश में प्रवेश नहीं करनेदिया गया। वे 5 अक्टूबर 1945 केबाद ही ेमद्रास में प्रवेश कर पाए। वे पार्टी की प्रादेशिक कमिटि के सदस्यके तौर पर काम करते रहे।1932 से ही जीवा जन आंदोलनोंऔर जनसंगठनों में काम करते रहे हैं।उन्होंने  ए.एस.के,  वी.  सुंदरैया  तथा अन्य के साथ मिलकर लेबर प्रोटेक्शन लीग की स्थापना की। ऐसा तब जरूरी हो  गया  था  जब  1934  में  अमीर हैदर खान द्वारा गठित ‘यंग मार्क्सिक्टलीग’ पर अंग्रेजों ने पाबंदी लगा दी।लेबर  प्रोटेक्शन  लीग  की  पहल  पर1935 में मद्रास में अखिल भारतीय प्रेस मजदूर सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें घाटे तथा अन्य ने भी हिस्सालिया।1937  में  जीवा  ने  कोयम्बटूरमिल वर्कर्स यूनियन का गठन किया।यूनियन के नेतृत्व में हड़ताल संगठितकी गई जिसमें 30 हजार से भी अधिकमजदूरों ने भाग लिया।1937 में ‘सदर्न रेलवे एम्प्लाइजयूनियन’ को पुनर्गठित किया गया। इसकार्य में मुख्य पहल जीवा ने की थी।इसके सम्मेलन को जीवा के अलावामुजफ्फर अहमद, ए.एस.के. तथा अन्यने  संबोधित  किया।  जल्द  ही  इसकीसदस्य संख्या बढ़कर 35 हजार तकपहुंच  गई।  1946  में  यूनियन  केनेतृत्व में दो महीने तक लंबी हड़तालचली। इसमें कल्याण सुंदरम ने प्रमुखभूमिका अदा की।जीवानन्दम ने मदुरै के कपड़ा मिलमजदूरों, ताड़ी मजदूरों, मोटर मजदूरों,ट्रामवे और प्रेस मजदूरों के संघर्षोंं औरसंगठनों का नेतृत्व किया।फरवरी  1946  में  मद्रास  केमजदूरों ने बंबई के नौसेना विद्रोह केसमर्थन में हड़ताल की। जीवा के नेतृत्वमें विशाल जुलूस निकाला गया।जब  जुलूस  मद्रास  के  बकिंगघमएंड कर्नाटक मिल्स के नजदीक पहुंचतो पुलिस ने रोकने की कोशिश की।उसने गोली चलाने की धमकी भी दी।जीवा सामने खड़े हो गए और घोषणाकी कि हर हालत में जुलूस जाएगा,भले ही उन्हें गोली खानी पड़े। उन्होंनेपुलिस को चुनौती दी कि वह उनपरगोली  चलाए।  फलस्वरूप  पुलिए  कोपीछे हटना पड़ा और जुलूस शांतिपूर्वकआगे चल पड़ा।आजादी के बाद1948 में पार्टी पर पाबंदी लगगई। जीवा उसी वर्ष गिरफ्तार कर लिएगए। वे 1951 तक जेल में रहे। वेपार्टी   पर   उस   वक्त   हावीवाम-दुस्साहसवादी ;बी.टी.आर.द्ध लाइनसे सहमत नहीं थे और उन्होंने उसकाजमकर विरोध किया। उन्होंने नई लाइनविकसित करने पर जोर दिया।1951 में ‘जनशक्ति’ साप्ताहिकफिर प्रकाशित होने लगा। 1952 केआम चुनावों से पहले उसे दैनिक केरूप में प्रकाशित किया जाने लगा।1952  के  आम  चुनावों  में  वेमद्रास  के  वाशरमेनपेट  विधान-सभाचुनाव-क्षेत्र से चुनाव लड़े और जीतगए। विधानसभा में उन्होंने सरकार परविकास तथा सुधार-संबंधी कदमों परजोर  दिया।  वे  1957  तक  विधानसभा के सदस्य रहे।उन्होंने  1962  में  चीनी  हमलेकी कठोर निंदा की। इस हमले ने नसिर्फ भारत की सार्वभौमिकता को चोटपहुंचाई बल्कि कम्युनिस्ट आंदोलन कोभी भारी नुकसान पहुंचाया। इसे समझाने के लिए उन्होंने पूरे राज्य का दौरा कर विशाल सभाओं को संबोधित किया।भाषा और साहित्यतमिल को राजकीय भाषा बनने में पी. जीवानन्दमः समाज सुधारक और कम्युनिस्ट...जीवानन्दम की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही। उसे उन्होंने राज्य, न्यायपालिकाऔर शिक्षा में आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलवाया। वे कला और साहित्य सेगहरे रूप से जुड़े हुए थे।वे शुद्ध तमिल भाषा के समर्थक थे। उनका कहना था कि इसमें संस्कृत केप्रवेश से यह विकृत हो गई है। वे अपना नाम ‘उइरिन्वन’ बताते थे जो संस्कृत शब्द ‘जीवानन्दम’ का शब्दशः अनुवाद था। उन्होंने सुप्रसिद्ध तमिल कवि औरसाहित्यिक सुब्रमण्य भारती का व्यापक प्रचार किया।जीवा ने सांस्कृतिक राजनीति का व्यापक प्रचार किया। वे तमिल साहित्य केप्रकांड  विद्वान  थे।  वे  बहुत  ही  अच्छे  वक्ता  थे।  उन्होंने  आम  जनता  के  लिएकहानियां, लेख और कविताएं बड़ी संख्या में लिखीं। 1937 में कोयम्बटूरटेक्सटाइल मजदूरों के लिए लिखे गए तथा उनके गीत आज भी प्रचालित हैं।सुब्रमण्य  भारती  और  कम्बन  की  कविताओं  की  उनके  द्वारा  व्याख्या  कीविद्वानों ने बड़ी पसंद की है। सुब्रमण्य भारती की पुत्री के अनुसार ये जीवा ही थेजिन्होंने पहली बार उनकी कविताओं की सही व्याख्या कर पाए।1958 में जीवा ने ‘थमरई’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया जोबहुत लोकप्रिय हुई।जून 1961 में जीवानन्दम ने तमिलनाडु आर्ट एंड लिटेरिरी फेडरेशन कीस्थापना की। यह संगठन प्रगतिशील साहित्यिकों का मंच बना।जीवा  भारतीय  कम्युनिस्ट  पार्टी  की  अमृतसर  पार्टी  कांग्रेस  ;1958द्ध  मेंराष्ट्रीय परिषद के लिए चुने गए। वे 1963 में अपनी मृत्यु तक इसके सदस्यबने रहे। वे तमिलनाडु राज्य पार्टी के सचिवमंडल के सदस्य भी रहे। उनके नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ने 1960 में गोवा में पुर्तगाली शासकों द्वारा किए गए अत्याचारों के विरोध में व्यापक आंदोलन चलाया।जीवा ने कठिन परिश्रम करके अंग्रेजी भाषा पर भी महारथ हासिल कर ली।1962 में वे गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। उन्हें इलाज के लिए सोवियत संघ भेजा गया। लेकिन वापस लौटने पर वे फिर बीमार पड़ गए। उनकी मृत्यु18 जनवरी 1963 के ताम्बरम, मदास में हो गई।

-अनिल राजिमवाले.

Monday, 13 April 2020

महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व कम्युनिस्ट नेता कामरेड पी सी जोशी




कामरेड पूरन चन्द जोशी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव जिनका
जन्म 14 अप्रैल, 1907
को अल्मोड़ा में हुआ था और मृत्यु 9 नवम्बर, 1980 को दिल्ली में हुई थी। देश के प्रसिद्धि स्वतंत्रता सेनानी भी थे।  सन 1929 में 'मेरठ षड्यंत्र केस' में सज़ा भी हुई थी।
विद्यालय इलाहाबाद विश्वविद्यालय से
क़ानून की डिग्री ली थी।
कामरेड पूरनचंद जोशी सन 1936 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने थे तथा सन 1951 में इलाहाबाद से 'इण्डिया टुडे' पत्रिका निकाली थी।
कामरेड जोशी स्वाधीनता सेनानी और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य थे। वह कम्युनिस्टों के बीच पी.सी. जोशी के नाम से प्रसिद्ध थे।  वह कुछ समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय मे इतिहास के अध्यापक भी रहे थे।
विद्यार्थी जीवन में ही पी. सी. जोशी कम्युनिस्ट आंदोलन के संपर्क में आ गए थे। गोपनीय गतिविधियों में उनके संलग्न रहने की सूचना मिलने पर गिरफ्तार कर लिए गये थे। मेरठ षड़्यंत्र केस 1929 में कामरेड पूरनचंद्र जोशी पर भी मुकदमा चला और 1933 तक वे जेल में बंद रहे थे। बाहर आने पर जब कम्युनिस्ट पार्टी का भारत में केंद्रीय संगठन बना तो पी. सी. जोशी उसके महासचिव बनाए गए थे। 1935 की कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के निश्चयों की पृष्ठभूमि में, देश के स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रयत्नाशील संगठन के सहारे अपनी संगठनात्मक शक्ति में वृद्धि करने के उद्देश्य से भारत के कम्युनिस्ट भी कांग्रेस संगठन में सम्मिलित हो गए थे। साथ ही पूरनचंद्र जोशी ने श्रमिकों के किसानों के और विद्यार्थियों के भी अलग संगठन बनाए थे। कामरेड पी.सी.जोशी का इन सबमें अग्रणी योगदान था।
-रणधीर सिंह सुमन 

जलियांवाला :मुखविरों के वंशज आज भी हिन्दू -मुसलमानों को लड़ा रहे हैं


अंग्रेजों के मुखविरों के वंशज आज भी हिन्दू -मुसलमानों को लड़ा कर साम्राज्यवादियों की मदद कर रहे है .देश की आजादी के लिए हिन्दू -मुसलमानों सहित लाखों तत्कालीन नागरिकों ने प्राण दे दिए थे .अंग्रेजों के मुखविरों के वंशज आज भी समझते है कि आजादी ऐसे ही मिल गई थी .
सभी धर्मों के मतालाम्बियों की एकता इस देश की प्राणवायु है .साम्प्रदायिक एकता के कारण ही जलियांवाला बाग कांड हुआ था . आज भी मुखविरों की जमात के वंशज हिन्दू- मुस्लिम -सिख- ईसाई को लड़ा कर देश की एकता को कमजोर कर रहे है . अंग्रेज भी इसी एकता से भयभीत थे .

13 अप्रैल, 1919 सिखों का बैसाखी पर्व था।पुलिस अत्याचारों व रोलेट एक्ट के विरोध में अमृतसर स्वर्ण मंदिर के पास जलियांवाला बाग मैदान में, हजारों सिख, मुसलमान और हिंदू उस समय एकत्रित हुए। राम सरन दत्त, गोकुल चंद नारंग, सैफ़ुद्दीन किचलू, अली ख़ान सहित अंग्रेजी शासन के खिलाफ सभी एकजुट थे अंग्रेज 1857 के विद्रोह, 1870 के दशक के कूका आंदोलन और साथ ही 1914-15 के ग़दर आंदोलन देख चुके थे . हिन्दू =मुस्लिम एकता के कारण सरकार का जबरदस्त मजबूत विरोध था .हड़तालें हो रही थी .जालंधर के ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड डायर को आदेश दिया गया कि वो इन घटनाओं को संभालने के लिए फ़ौरन अमृतसर पहुंचें. नागरिक प्रशासन ढह चुका था और ऐसे में संभवत: डायर को परिस्थितियों को नियंत्रण में करने के लिए बुलाया गया था.

ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर
शाम 4 बजे के बाद, जनरल रेजिनाल्ड डायर, फिर अमृतसर के सैन्य कमांडर ने 90 सदस्यों की एक छोटी टुकड़ी के साथ स्टेडियम को घेर लिया। बल के साथ दो बख्तरबंद वाहनों को डायर के पास लाया गया। लेकिन स्टेडियम की सड़क इतनी संकरी थी कि वाहन अंदर नहीं जा सकते थे। जलियांवाला बाग स्टेडियम दीवारों से घिरा हुआ है, स्टेडियम के द्वार बहुत संकीर्ण हैं और उनमें से कई स्थायी रूप से बंद हैं। यद्यपि मुख्य द्वार अपेक्षाकृत बड़ा था, लेकिन प्रवेश द्वार को डायर सैनिकों और वाहनों द्वारा बंद कर दिया गया था।
ब्रिगेडियर जनरल रेजिनॉल्ड डायर  ने सभा छोड़ने की चेतावनी के बिना  गोलीबारी का आदेश दिया गया था। डायर ने बाद में कहा कि यह कदम भारतीयों की सभा  को समाप्त  करने के बजाय सबक सिखाने के लिए थी । गोली  समाप्त होने तक सैनिकों को गोली चलाने का आदेश दिया गया था। सैनिकों ने 1,650 बार भीड़ पर गोलीबारी की। यह आंकड़ा बाद में उन खाली कारतूसों  से पता चला था जो घटना के बाद से खाली हो गए थे। त्रासदी से बचने के लिए, लोग मैदान में एक छोटे से कुँए पर चढ़ गए। इस छोटे से कुएं से केवल 120 शव बरामद किए गए थे।
गोलीबारी में हताहतों की संख्या को लेकर अभी भी विवाद हैं। ब्रिटिश सरकार ने कहा कि गोलीबारी में 379 लोग मारे गए। इसके बारे में कांग्रेस के आंकड़ों के अनुसार, यह लगभग 1,800 था।
घटना के महीनों बाद, सरकार ने मरने वालों की संख्या का अनुमान लगाया। अधिकारियों ने जनता से आग्रह किया कि अगर उनके परिवारोंके सदस्य  मौत  या घायल  जलियांवाला बाग में गोलीबारी में हुई है तो  वे अपने नाम सरकार को प्रस्तुत करें। यह कोई प्रभावी उपाय नहीं था। बहुत से लोग स्वयंसेवक के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें लगता था  कि यदि उनके नाम सामने आते हैं तो अतिरिक्त कार्रवाई की जाएगी। प्रत्यक्षदर्शियों ने बाद में खुलासा किया कि वास्तविक मौत का आंकड़ा ब्रिटिश अधिकारियों की तुलना में बहुत अधिक था।
-रणधीर सिंह सुमन

Saturday, 21 April 2018

देश के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ और वामपंथ


   देश आजादी के बाद के सबसे जटिल संकट से गुजर रहा है। देश और अधिकतर राज्यों की सत्ता ऐसे समूह के हाथों में केन्द्रित है जो संपूर्णतः देश के मेहनतकशों के हितों पर डाका डाल कर पूँजीपतियों की तिजौरियाँ भरने को प्रतिबद्ध हैं, पर चोरी और सीनाजोरी साथ साथ नहीं चल सकते, अतएव सत्तारूढ़ गिरोह ने धर्म का लबादा ओढ़ लिया है। भेड़ों के शिकार के लिए भेड़िए ने भेड़ों की ही खाल ओढ़ ली है। देश की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत भाग आज भी ग्रामों में रहता है। यह ग्रामीण भारत खेती और खेती से जुड़े लघु उद्यमों पर आश्रित है। वहीं ग्रामीण आबादी का एक भाग मजदूरी दस्तकारी करने को शहरों को जाता है और फसलों की कटाई-बोआई के समय गाँव लौट आता है। आज यह ग्रामीण समुदाय आर्थिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित और विपन्न है। कारण-खेती बेहद घाटे का सौदा बन चुकी है। पूँजीवादी अर्थतंत्र खेती के बल पर टिका हुआ है पर खेती किसान की लागत और मेहनत को निगल रही है। खेती बदहाल है तो उससे जुड़े लघु और कुटीर उद्योग भी बरबाद हैं। खेती और उसकी बदहाली के कई प्रमुख कारण हैं। कृषि उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार किसान के पास नहीं है। कुछेक खाद्यान्नों की कीमतें सरकार तय करती है तो फल सब्जी और कई अन्य की कीमतें मंडी में माँग-आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं। यह लागत, जमीन के किराए और किसान के परिश्रम की तुलना में काफी कम होती हैं। इसके अलावा खेती में काम आने वाली हर वस्तु की कीमत मुनाफे पर आधारित बाजार निर्धारित करता है। इससे खेत्ती का लागत मूल्य बढ़ जाता है। प्राकृतिक आपदाओं की मार भी किसानों के ऊपर ही पड़ती है।
    ऐसी ही अन्य कई वजहों से किसान निरंतर घाटे के चलते कर्जदार होता जा रहा है। बैंक ऋण हासिल करने में आने वाली कठिनाइयाँ उसे सूदखोरों से कर्ज लेने को बाध्य करती हैं। यही वजह है कि कर्ज में डूबे पीड़ित किसानों द्वारा आत्महत्याएँ करने का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। भाजपा और मोदी ने गत लोकसभा चुनावों के दौरान किसानों की आमदनी दोगुना करने का वादा किया था। पर अन्य वादों की तरह यह भी जुमला ही साबित हुआ। वस्तुतः किसान तथा अन्य ग्रामीण श्रमिक ठगा महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण श्रमिकों की जीवनरेखा- मनरेगा को भी सीमित कर दिया गया है।
    यद्यपि गत शताब्दी के सातवें दशक से ही मन्दी और उद्योग बन्दी शुरू होगयी थी लेकिन 1991 में शुरू हुए आर्थिक नवउदारवाद के दौर में मंदी और बंदी की यह रफ्तार और तेज हो गयी। मोदी सरकार के कतिपय कदमों जिनमें नोटबन्दी और जीएसटी का लागू किया जाना प्रमुख हैं, ने हालात को और संगीन बना दिया है। फलतः हमारी अर्थव्यवस्था में चहुँतरफा गिरावट स्पष्ट दिखाई दे रही है। डालर के मुकाबले रूपये की कीमत निरंतर गिर रही है। आयात बढ़ा है और निर्यात घटा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीएसटी) की दर हो या औद्योगिक उत्पादन की दर, लगातार क्षरण की ओर है। इसके परिणाम स्वरूप बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मोदीजी ने दो करोड़ नौजवानों को हर वर्ष रोजगार देने का वादा किया था पर उन्हें रोजगार देने के बजाए सिर्फ मुद्रा, स्टार्टअप, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया आदि नारों से बहलाने की कोशिश की जा रही है। देश की युवा पीढ़ी भाजपा की गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रही है। पूँजीपतियों, जिनके कतिपय हिस्से आज कारपोरेट घराने बन चुके हैं, को लाभ पहुँचाने को जनता की गाढ़े पसीने की कमाई से स्थापित हुए व स्वदेशी बुद्धिमत्ता और परिश्रम से विकसित हुए सार्वजनिक उद्यमों को उनके हाथों बेचा जा रहा है। बैंकों में आम जनता के जमा धन को जबरिया धनिक वर्ग को दिलाया जा रहा है जिसे वे वापस करने के बजाय बट्टे खाते में डलवा रहे हैं या फिर बैंकों से भारी रकमें लेकर विदेशों को भाग रहे हैं। बैंकों से लगातार हो रही इन अवैध निकासियों का भार सामान्य निवेशकों पर डाला जा रहा है। जितने घपले घोटाले संप्रग सरकार के दो कार्यकालों में हुए थे उससे कहीं ज्यादा राजग/भाजपा के चार सालों में हो चुके हैं। सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बरबाद करने की प्रक्रिया दशकों से जारी थी लेकिन मोदी राज में वह और तेज हुई है। शिक्षा का बजट निम्नतम् स्तर पर ला दिया गया है। अब चुनिंदा और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को निजीकरण की दिशा में धकेला जा रहा है। नीति यह है कि इसे इतना महँगा बना दिया जाए कि समाज के सामान्य हिस्से इससे वंचित हो जाएँ और वे लुटेरी और शोषक पूँजीवादी व्यवस्था की भट्टी में जलने वाले सस्ते ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होते रहें। इस उद्देश्य से श्रम कानूनों को भी नख-दन्त विहीन बनाया जा रहा है। शिक्षा को धर्मान्धता, पाखण्ड, पोंगापंथ और सांप्रदायिकता फैलाने का औजार बनाने के लिए इसके पाठ्यक्रमों में प्रतिगामी बदलाव किये जा रहे हैं। इतिहास, कला और संस्कृति की व्याख्या नागपुरी दृष्टिकोण से की जा रही है।
   शिक्षा की तरह स्वास्थ्य सेवाएँ भी सरकार के निशाने पर हैं और वे भी बेहद महँगी, छलपूर्ण और आम आदमी की पहुँच से बाहर होती चली जा रही हैं। महँगाई ने निरंतर पाँव पसारे हैं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पंगु बना कर गरीबों के मुहँ का निवाला छीना जा रहा है। हर तरह की सब्सिडी पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। आतंकवाद को समाप्त करने और सीमा पार के दुश्मनों का खात्मा करने के मोदी और भाजपा के दावों का खोखलापन इसी से जाहिर हो जाता है कि गत चार सालों में पूर्व के भारत-पाक युद्धों से भी अधिक संख्या में हमारे सैनिक और अन्य सुरक्षा बलों के जवान शहीद हो चुके हैं। मोदी, भाजपा और आरएसएस की काकटेल और कारपोरेट हितों की पोषक इस सरकार के प्रति जनता का मोहभंग तेजी से बढ़ रहा है। हाल में कई राज्यों में हुए उपचुनावों, निकाय और अन्य चुनावों के परिणामों ने भाजपा के पैरों तले से जमीन के खिसकने का संकेत दे दिया है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर की लोकसभा सीटें, जिन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री  जीते थे, पर भाजपा की करारी हार ने साबित कर दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की पराजय का रास्ता तैयार हो रहा है। उनका दावा कि “मोदी का कोई विकल्प नहीं”, उत्तर प्रदेश में ही जमींदोज होने जा रहा है।
    जाहिर है संपूर्ण सत्ता का स्वाद चख चुकी भाजपा और उसका रिंग मास्टर आरएसएस इसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं। बेनकाबी जितनी तेजी से बढ़ रही है उसको नकाब पहनाने के प्रयास भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं। अतएव हर वह हथकंडा जो जनता को गुमराह और विभाजित कर सके अपनाया जा रहा है। सभी जानते हैं कि मंदिर-मस्जिद विवाद सर्वोच्च न्यायालय के
विचाराधीन है और उसका फैसला आने पर ही हल की ओर बढ़ सकता है। फिर भी मंदिर निर्माण के लिए अलग-अलग मुखों से तीखे बोल बोले जा रहे हैं। कथित लव जिहाद, गोरक्षा और तीन तलाक जैसे मुद्दों की आड़ में अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाया जा रहा है। दंगे कराये जा रहे हैं और दंगों तथा हत्याओं में संलिप्त संघी अपराधियों को आरोपों से मुक्त किया जा रहा है। विभाजनकारी यह एजेंडा दिन ब दिन धारदार बनाया जाना है। संविधान और न्यायिक प्रणाली तक को बदलने का प्रयास जारी है।
    कारपोरेट हितों की पोषक और फासिस्टी रुझानों से सराबोर इस सरकार को सत्ताच्युत करना आज हर लोकतंत्रवादी ताकत का सबसे प्रमुख लक्ष्य बन गया है। वामपंथ ने तो इस सरकार के पदारूढ़ होते ही संकल्प व्यक्त किया था कि वह इस जन विरोधी और लोकतंत्र विरोधी सरकार को उखाड़ फैंकने को कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगी। तदनुसार वामदलों और उनके सहयोगी संगठनों ने इन चार सालों में अनेक जन प्रश्नों पर आन्दोलन खड़े किए हैं। परन्तु परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए ये नाकाफी हैं। अतएव समय की माँग है कि
जनविरोधी, लोकतंत्र और संविधान विरोधी इस सरकार को अपदस्थ करने को एक व्यापक और व्यावहारिक रणनीति बनाई जाए। सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी ताकतों का एक प्लेटफार्म तैयार कर संघर्षों को नई ऊँचाइयों तक ले जाया जाए। बरबादी की जड़ आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों का एक आर्थिक-सामजिक विकल्प पेश किया जाए। सांप्रदायिकता, धर्मान्धता और रूढ़िवादिता के खिलाफ वैचारिक मुहिम छेड़ी जाए। इसके लिए संकीर्णताओं से मुक्त और कार्यक्रम
आधारित वामपंथी एकता बेहद जरूरी है। वामपंथी दलों को इस दिशा में तत्काल ठोस पहल करनी चाहिए। पूर्व की भाँति ढील-ढाल और हीला-हवाली नकारात्मक परिणाम दे सकती है। अच्छी बात है कि देश की दो प्रमुख पार्टियों-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राष्ट्रीय
महाधिवेशन इसी अप्रैल माह में होने जारहे हैं। एक अन्य कम्युनिस्ट पार्टी माले का महाधिवेशन भी हो रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन महाधिवेशनों से अभूतपूर्व वाम एकता और उसके इर्द-गिर्द व्यापक जनवादी ताकतों की एकता का मार्ग अवश्य ही प्रशस्त होगा।             
    
-डॉ. गिरीश
मोबाइल : 09412173664
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

उत्तर-सत्य के इस काल में कम्युनिस्टों की मुक्तिकामी राजनीति को स्थापित करना होगा


यह समय भारत की राजनीति में एक नये प्रकार के उथल-पुथल का समय है, जिसमें भाजपा-आरएसएस सत्ता के मद में अपने सारे कपड़े उतार कर निपट नंगे रूप में सरे बाजार सीना फुलाये घूम रहे हैं और पूरा देश उनकी सारी उदंडताओं को देखते हुए 2019 के चुनाव की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा है। मोदी के स्वेच्छाचारी शासन के खिलाफ जनता के तमाम हिस्से लामबंद हो रहे हैं। दूसरी ओर यही समय भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक प्रकार के अस्तित्वीय संकट का समय भी जान पड़ता है जिसमें उसे पूरी तरह से दीवार से सटा दिए जाने की स्थिति से अपनी पूरी ताकत लगा कर पलट कर खड़ा होने की ताकत का परिचय देना है। संयोग से अभी भारत की दो प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों की पार्टी कांग्रेस की प्रक्रिया का भी समय है, उनकी सर्वोच्च नीति नियामक सभा के आयोजन का समय।
    इसलिए देश और दुनिया के सामने आज के समय की बिल्कुल नई प्रकार की चुनौतियों के वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों की कांग्रेस के ये आयोजन बहुत ही अर्थपूर्ण और संभावनापूर्ण साबित हो सकते हैं। समय और राजनीति का पूरा परिदृश्य तेजी से बदल चुका है और कम्युनिस्ट पार्टियों को इन नई परिस्थितियों के संदर्भ में खुद को रखते हुए यदि राजनीति की अपनी समझ को विकसित और समीचीन नहीं बनाती है, व्यापक मेहनतकश जनता के हितों से जुड़े अपने मूल तत्व की शक्ति को नये सिरे से अर्जित नहीं करती है तो भारत में वामपंथ की गिरावट के इसी बीच जो सभी संकेत सामने आ चुके हैं, उनसे आगे उबर पाना असंभव हो जाएगा। ये पार्टी कांग्रेस ही एक प्रकार से ऐसे बचे हुए अवसरों में से एक सबसे प्रमुख अवसर हैं जब हर प्रकार की कोरी गुटबाजी से ऊपर उठते हुए पार्टी एक गंभीर बहस और समकालीन परिस्थिति का सटीक विश्लेषण करके नये सिरे से भारत की राजनीति में मेहनतकशों के संगठित हस्तक्षेप की संभावनाओं को बनाये रख सकती है।
    सारी दुनिया में कम्युनिस्ट राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? कम्युनिस्ट राजनीति का मूल तत्व है जनता की मुक्ति, उसके जीवन को तमाम बंधनों से मुक्त करके उसकी सर्जनात्मक शक्ति को उन्मोचित करना। कम्युनिस्ट राजनीति का लक्ष्य कभी भी शुद्ध रूप में किसी राजसत्ता के दमनकारी तंत्र का निर्माण नहीं हो सकता है। समाजवादी क्रांति के बाद निर्मित समाजवादी व्यवस्था और राजसत्ता का लक्ष्य भी सभी प्रकार की राजसत्ता को खत्म करने की दिशा में ही चरितार्थ हो सकता है। जब भी समाजवादी राज्य अपनी उस भूमिका को भूल कर सिर्फ जनता पर शासन करने के एक तंत्र के रूप में काम करने लगता है, उसमें वे सारी विकृतियाँ उत्पन्न होने लगती हैं, जो समाजवाद के मुक्तिदायी चरित्र को उससे छीन लेती हैं। सोवियत संघ में समाजवाद के पराभव के मूल में यही सच्चाई काम कर रही थी जहाँ किसी भी वजह से क्यों न हो, समाजवादी व्यवस्था ने भी एक दमनकारी नौकरशाही व्यवस्था का रूप ले लिया था और इसलिए समाजवाद को मुक्तिकामी चरित्र और पूँजीवाद-सामंतवाद के शोषणकारी चरित्र के बीच का फर्क ओझल होने लगा जो अंत में समाजवाद के पूरी तरह से पराभव का कारण बना।
    इसी मानदंड पर भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों को भी अपनी राजनीति की बार-बार समीक्षा-पुनर्समीक्षा करने की जरूरत है। भारत में आजादी के इन सत्तर सालों में एकाधिक राज्यों में कम्युनिस्ट पार्टियों को राज्य सरकारें बनाने का मौका मिला है और केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा की इन सरकारों ने खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार और पंचायती राज के कामों के जरिए गाँव के गरीबों के जीवन को जिस प्रकार से शोषण के जुए से मुक्त किया, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय कहलाएगा। इसीका परिणाम रहा कि पश्चिम बंगाल में तो रिकर्ड 34 सालों तक लगातार वाम मोर्चा सरकार का शासन कायम रहा, लेकिन भूमि सुधार के इन कामों के अलावा शहरी और औद्योगिक क्षेत्र में वामपंथी सरकारें अपनी भूमिका को दूसरी पूँजीवादी पार्टियों से अलग रूप में दिखाने में असमर्थ रहीं। उल्टे तंत्र पर उसकी निर्भरशीलता ने मौके-बेमौके इन सरकारों को अपनी ही जनता की आकांक्षाओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। शहरी विकास के लिए जमीन के
अधिग्रहण के मामले में इसका नजरिया गरीब जनता के हित में होने के बजाए उनके खिलाफ तक देखा गया, और भारतीय वामपंथ को इससे एक भारी राजनैतिक खामियाजा भुगतना पड़ा है। इसके कारण वामपंथ अपने मुक्तिकामी चरित्र के साथ समझौता करता हुआ दिखाई देने लगता है।
    पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर के बाद अभी हाल में केरल के कन्नूर जिले के एक छोटे से गाँव में एक बाईपास बनाने के लिए जमीन के अधिग्रहण के मामले में विवाद ने जो रूप लिया, वह भी कुछ ऐसा ही मामला था, लेकिन सौभाग्य की बात है कि अंततः केरल की सरकार के वामपंथी नेतृत्व में शुभ बुद्धि का उदय हुआ और उन्होंने इस समस्या के समाधान का एक वैकल्पिक रास्ता खोज लिया-जमीन के अधिग्रहण के बिना फ्लाई ओवर के जरिए काम को आगे बढ़ाने का रास्ता।
    यह विवाद इसी बीच इतना बढ़ गया था कि वह राष्ट्रीय खबरों में शामिल हो गया था। वहाँ की एलडीएफ सरकार और पार्टी गाँव के अंदर से ही सड़क को ले जाने पर तुले हुए थे और किसान अपनी जमीन को न देने पर आमादा थे। जाहिर है कि यह हमें अनायास ही बंगाल की नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं की याद दिला रहा था। सत्ता पर आकर राजनीति को भूल सिर्फ अर्थनीतिक ‘विकास’ के प्रति मोहांधता सचमुच एक कथित क्रांतिकारी पार्टी के द्वारा जनता के अराजनीतिकरण का काम करने की तरह है। समाज में कोई भी परिवर्तन सर्व-मान्य धारणाओं से चिपके रह कर संभव नहीं है, बल्कि नया कुछ करने के लिए प्रचलित सोच से अपने को काटना पड़ता है। वही राज्य की अपनी जड़ता को भी तोड़ने का कारक बन सकता है और इस प्रक्रिया में जनता के साथ वैर की कोई जगह नहीं हो सकती है। पार्टी का नौकरशाही ढाँचा अक्सर अपने को जनता की इस प्रकार की अन्दुरूनी सक्रियता, उसके आंदोलन के खिलाफ खड़ा कर लेता है।
    इसलिए वामपंथ के लिए प्रमुख बात यह है कि जनता के जो भी हिस्से अपने जीवन की समस्याओं के लिए जो भी आंदोलन कर रहे हो, वामपंथी ताकतों को उन आंदोलनों में अपनी मौजूदगी और उनके साथ हमेशा अपनी एकजुटता के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। क्रांतिकारी राजनीति का दायित्व शासन की समस्याओं का समाधान नहीं है, जनता की समस्याओं का समाधान है और अपने इसी दायित्व के तहत उन्हें  अपने शासन को भी संचालित करना चाहिए। फिर यह समस्या आम लोगों की अपनी राष्ट्रीय-जातीय पहचान से जुड़ी हुई भी हो सकती है, वर्ण-वैषम्य से मुक्ति की भी हो सकती है, गाँव के किसानों के उत्पाद के वाजिब मूल्य की माँग की हो सकती है या संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों और विभिन्न पेशेवरों की जीविका के सवालों से भी जुड़ी हो सकती है। 
    आज सामान्य तौर पर देखा जाए तो भारत की राजनीति के लिए भारतीय गणतंत्र की रक्षा का सवाल एक सबसे प्रमुख सवाल है। मोदी-आरएसएस सरकार के रूप में एक ऐसी शक्ति ने यहाँ राजसत्ता पर अपना कब्जा कर रखा है जो इस देश के धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक
संविधान पर, नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर विश्वास नहीं करती है। हिटलर की प्रेरणा से निर्मित इस संगठन का एकमात्र लक्ष्य है सारी सत्ता को केंद्रीभूत करके एक अधिनायकवादी शासन-व्यवस्था कायम करना। नागरिकों की हैसियत इनकी नजर में गुलामों से बेहतर नहीं है। पिछले चार सालों में अपने अनेक कदमों से इसने अपने इन इरादों को पूरी नंगई के साथ प्रकट किया है। नोटबंदी और जीएसटी की तरह के कदम एक वही स्वेच्छाचारी सरकार उठा सकती है जो जनता को अपना गुलाम मानती है। इसी प्रकार जिस धृष्टता के साथ ये न्यायपालिका के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जज की हत्या तक के मसलों को दबाने की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे हैं, उसने जनतांत्रिक राजनीति के सभी रूपों के सामने संकट पैदा कर दिया है। पूरी अर्थ-व्यवस्था ठप है।
    इन सबके साथ ही आज के समय में मीडिया के विभिन्न रूपों के प्रयोग से जिस प्रकार झूठ को ही राजनीति का आधार बना दिया जा रहा है, वह आज के समय का एक बेहद खतरनाक पहलू है। इसी वजह से आज के युग को ही उत्तर-सत्य का युग कहा जाने लगा है। हम जानते हैं कि हर जगह बुर्जुआ राजनीतिज्ञ झूठ बोलते रहे हैं, लेकिन यहाँ समस्या यह है कि राजनीतिज्ञों की इस नई पौध का सच से जैसे कोई नाता ही नहीं है! और इससे भी बड़ी समस्या यह है कि इतनी नंगई के साथ झूठ बोलने वाला भी राजनीति में जनता के द्वारा पुरस्कृत हो जाता है। साधारण लोगों को उसकी उटपटांग बातों से कुछ इस प्रकार का अहसास होने लगता है कि देखो, यह एक शेर आया है जो अब तक के सारे बुद्धिमानों, कुलीनों की अक्ल ठिकाने लगा सकता है।
    दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप को इस पोस्ट ट्रुथ का प्रवर्तक माना जाता है। लेकिन राजनीति के इस रूप का हमारा अनुभव तो ट्रंप से भी दो साल पुराना है, केंद्र की राजनीति में मोदी के उदय के समय से ही। हमने तो देखा था कि मोदी कैसे धड़ल्ले से तक्षशिला को बिहार में ले आए थे और सिकंदर की लड़ाई बिहारियों से करवा दी थी। उन्होंने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को क्रांतिकारी बताने के लिए उन्हें लंदन में श्याम कृष्ण वर्मा बता दिया। यहाँ तक कि धारा 370 के बारे में कह दिया कि वह तो सिर्फ औरतों के अधिकारों से जुड़ी एक धारा है। ऐतिहासिक तथ्यों की मनमानी व्याख्या में भी उनकी कोई बराबरी नहीं थी। भारत को वे 1000-1200 साल से गुलाम बताने से नहीं हिचकते। सामाजिक समरसता नामक पुस्तक का विमोचन करते हुए उन्होंने कह दिया कि “दलित मंद बुद्धि बच्चों की तरह होते हैं।” वाल्मीकि समुदाय के लोगों के बारे में कहा कि वे आध्यात्मिक अनुभव लेने के लिए मैला ढोया करते हैं और गटर साफ करते हैं। सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी इनकाउंटर के बारे में भरी सभा में कहा कि वह इसी प्रकार के व्यवहार का हकदार था, और उस पर सभा में शामिल लोगों का अनुमोदन भी हासिल किया। हांकने में वे इतने उस्ताद रहे कि पश्चिमी सीमाओं पर डटे हुए सैनिकों के प्रति अपने प्रेम को जताने के लिए कह दिया कि वे 700 किलोमीटर की पाइप लाईन बैठा कर उनके लिये नर्मदा का पानी लाये हैं। इसके पहले अपनी एक सभा में उन्होंने फैला दिया था कि 15 दिसंबर 2012 के दिन भारत गुजरात और
सिंध को समुद्र में अलग करने वाले सर क्रीक मुहाने को पाकिस्तान को सौंप देगा, जबकि इस विषय पर कभी किसी की किसी के साथ कोई चर्चा तक नहीं हुई थी। सन् 2002 में मुसलमानों के बारे में कहा कि उनका उसूल है हम पाँच और हमारे पच्चीस। जबकि गुजरात में मुसलमानों की आबादी के अनुपात में पचास साल में कोई वृद्धि नहीं हुई है। सोनिया गांधी के इलाज पर सरकार ने 1800 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, यह भी उनका फैलाया हुआ ही एक झूठ था। मोदी शुरू से लेकर आज तक ऐसी न जाने कितनी बेतुकी, तथ्यहीन बातें कहते रहे हैं, इसका कोई हिसाब नहीं है। नोटबंदी के समय तो वे हर रोज एक नया झूठ गढ़ा करते थे। अभी वे डावोस में अपने भाषण में कितनी झूठी बातें बोल रहे थे, भारत में शांति और समृद्धि के बारे में, लाल फीताशाही के खात्मे और इनक्लुसिव ग्रोथ के बारे में। इन बातों को हम सब जानते हैं। जिस समय वे भारत में सबका साथ सबका विकास की बात कह रहे थे, उसी समय यहाँ  पर इन तथ्यों पर चर्चा चल रही थी कि देश की 73 प्रतिशत संपदा पर 1 प्रतिशत लोगों का कब्जा है। देश में अपने को सुखी और समृद्ध समझने वालों की संख्या घटते-घटते अब आबादी का सिर्फ तीन प्रतिशत रह गई है और प्रधानमंत्री डावोस में बड़े लोगों के अपने टोले के साथ बेपनाह मौज में लगे हुए थे।
    इसके अतिरिक्त मीडिया का विस्फोट भी उत्तर-सत्य की इन परिस्थितियों में अपनी भूमिका अदा कर रहा है। सूचना केंद्रों के बिखराव से झूठ और अफवाहों के केंद्रों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। व्हाट्स अप इंडस्ट्री तो झूठ की फैक्ट्री है। इसके ग्रुप के सदस्य आपस में ही एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं, और किसी पर नहीं। इस प्रकार के केंद्रों से फैलाये जाने वाले झूठ की काट भी मुश्किल होती है। इन सब चक्कर में अक्सर जिसका नुकसान होता है वह है सच का नुकसान। बहसें सच पर नहीं, झूठ पर केंद्रित हो जाती हैं। जीवन के असली विषय पीछे छूट जाते हैं। भारत के टीवी मीडिया पर जब मोदी के आईटी सेल का छोड़ा हुआ दूसरा कोई मुद्दा नहीं होता है तब किम जोंग उन या सीरिया, इराक की कहानियां छाई रहती हैं। इन हालात का इसके अलावा हमें दूसरा कोई उत्तर नहीं दिखाई देता है कि परिस्थितियाँ जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो, सत्य की लड़ाई लड़ने वालों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपने सत्य पर अडिग रहना होगा। झूठ से मुकाबले के नाम पर उसी के जाल में फंसने से बचना होगा। सत्य की ताकत पर भरोसा रखना होगा। आज मीडिया के विस्फोट के इस काल का एक सच यह भी है इसमें झूठी बातों पर से बहुत जल्द ही पर्दा भी उठ जाता है। फैलाए गए झूठ का तत्काल सही काट भी व्हाट्सअप, फेसबुक आदि पर आ जाता है। हर षड्यंत्र के बेनकाब होने की संभावना भी बनी रहती है। यह सोशल मीडिया का ही दबाव है कि जज लोया के मामले की तलवार आज भी अभियुक्त अमित शाह पर लटक रही है। कानून की दुनिया को अगर इस उत्तर सत्य ने प्रभावित किया है, तो उसमें विद्रोह के बीज भी सत्य की लड़ाई के जरिए देखने को मिल रहे हैं। आज उत्तर-सत्य के मोदी-शाह जैसे नायकों को भी इसी के औजारों का डर सता रहा है। कहना न होगा इससे राज्य के और ज्यादा दमनकारी होने का खतरा है, तो आम लोगों में विद्रोह की संभावना भी बन रही है। मोटे तौर पर यह एक राजनैतिक परिस्थितियों का संदर्भ है जिसमें भारत के कम्युनिस्टों को अपनी मुक्तिकामी राजनीति को नए सिरे से अर्जित करना है। यह काम सभी जनतंत्र-प्रेमी और धर्म-निरपेक्ष ताकतों को लामबंद करने की एक व्यापक राजनैतिक दृष्टि के जरिये ही किया जा सकता है। भविष्य सिर्फ और सिर्फ जनता को बंधनों से मुक्त करने वाली राजनीति पर विश्वास करने वाली ताकतों का ही है।  
-अरुण माहेश्वरी
मो-09831097219
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

कार्ल मार्क्स के अनमोल विचार


  
दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ भी नहीं है सिवाय अपनी जंजीरों के। हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार, हर किसी को उसकी जरूरत के अनुसार-
  • इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी की तरह, दूसरे एक मजाक की तरह।                     
  • कोई भी जो इतिहास की कुछ जानकारी रखता है वह ये जानता है कि महान सामाजिक  बदलाव बिना महिलाओं के उत्थान के असंभव हैं। सामाजिक प्रगति, महिलाओं की सामजिक स्थिति, जिसमें बुरी दिखने वाली महिलाएं भी शामिल हैं, को देखकर मापी जा सकती है।                 
  • लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है।         
  • पूँजी मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह केवल जीवित श्रमिकों का खून चूस कर जिंदा रहता है, और जितना अधिक ये जिंदा रहता है उतना ही अधिक श्रमिकों को चूसता है।दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास  खोने को कुछ भी नहीं हैए सिवाय अपनी जंजीरों के। कार्ल मार्क्स धर्म मानव मस्तिष्क जो न समझ सके उससे निपटने की नपुंसकता है। 
  • शासक वर्ग को कम्युनिस्ट क्रांति के डर से कांपने दो। मजदूरों के पास अपनी जंजीरों के आलावा और कुछ भी खोने को नहीं है। उनके पास जीतने को एक दुनिया है। सभी देश के कामगारों एकजुट हो जाओ।    
  • मेरा भी मालिकाना होगा कब्जा होगा हम सबका- बार्सिलोना हाबिक मोसान मैनचेस्टर के कपड़ा मिलों पर अगर नहीं, तो नहीं!       
    (अनुवाद-दिगम्बर)

-गोपाल मिश्रा
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

वन्दे जम्हूरियत


   त्रिपुरा में ढाई दशकों के शासन के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता के पतन को वाम विचारधारा के अंत के रूप में देखना-प्रचारित करना सरासर इतिहास विरोधी दृष्टि होगी। त्रिपुरा में  हार को वाम शक्तियों की राज सत्ता के पराभव के रूप में देखा जा सकता है, न कि वामवादी वैचारिक सत्ता की पराजय।
    फिर भी ठोस राजनैतिक यथार्थ को नजरंदाज करना भी इतिहास से मुँह मोड़ना होगा। यकीनन यह समय दक्षिणपंथ की आक्रमकता का है, जिसके आलम हमलावर हैं नरेन्द्र मोदी, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे लोग अमरीका, यूरोप ,एशिया समेत विश्व के दूसरे भागों में कॉर्पोरेट-याराना पूँजीवाद के राकेट पर सवार होकर  दक्षिणपंथी शक्तियाँ चारों दिशाओं में हमले कर रही हैं। इस नक्शे को दिमाग में रख कर त्रिपुरा-हार और  संघ-भाजपा उभार को देखा जाना चाहिए।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने त्रिपुरा चुनाव प्रचार में हुंकार भरी थी कि राज्य में वामपंथ के गढ़ को ध्वस्त करके रहेंगे। उन्हें माणिक-सरकार से कहीं ज्यादा नफरत थी ‘वामपंथ ‘ से। अतः मोदी-सेना ने जैविक  घृणा से लैस होकर त्रिपुरा पर धावा बोल दिया। कामयाबी भी मिली, लेकिन इसका श्रेय वैश्विक दक्षिण पंथी ताकतों को भी जाता है। हालाँकि, जन-फैसले का आदर किया जाना चाहिए, लेकिन, सच यह भी है कि अकूत संसाधनों से लैस संघ-परिवार ने त्रिपुरा चुनावों में अपनी पूरी शक्ति झांक दी थी। त्रिपुरा-विजय का सबब-सन्देश है निरंकुश पूँजीवाद का विस्तार, कट्टरवादी-अंधराष्ट्रवादी-युद्ध उन्मादी प्रवृतियों का फैलाव : फियर-सायकोसिस से प्रगतिशीलों-अल्पसंख्यकों की सामजिक व राजनैतिक घेराबंदी। भाजपा एक सामान्य व प्रोफेशनल राजनैतिक पार्टी नहीं है। यह पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर आश्रित है। संघ का सुदूरगामी  एजेंडा  है भारत को ‘धार्मिक उर्फ हिन्दू राष्ट्र‘ बनाना। इसके लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य है। यह तभी मुमकिन है जब संसद और विधान सभाओं में अनिवार्य सस्दस्य संख्या रहे। इसलिए त्रिपुरा-जीत या उत्तर-पूर्व विजय अभियान पर वैचारिक दूरबीन से नजर रखनी होगी।
    प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि वास्तु शास्त्र की दृष्टि से  उत्तर-पूर्व दिशा अच्छी होती है। उन्होंने  इस चुनावी सफलता को तुरंत ही मध्ययुगीन मानसिकता के साथ नत्थी कर दिया। दूसरे शब्दों में इसे धार्मिक-सांस्कृतिक रंग दे डाला। एक ‘अखिल भारतीय हिन्दुत्त्व मानसिकता’ को चुनावी राजनीति के केंद्र में ले आए, यह खतरनाक संकेत है। संघ परिवार की कोशिश यही है कि पूरा देश ‘संघ मय‘ व ‘हिन्दू’ मय बन जाए। इस सन्दर्भ में संघ-सुप्रीमो मोहन भागवत के दम्भ भरे उवाच को याद रखना चाहिए। उन्होंने 25 फरवरी को मेरठ में आह्वान किया था कि  ‘सारा समाज संघ बने।’ वे कहते हैं कि हिन्दुओं को एकताबद्ध होना पड़ेगा। उनके ही काँधों पर भारत की जिम्मेदारी है। इन शब्दों का सीधा अर्थ यह है कि भाजपा राजनैतिक  सफलताओं तक ही सीमित नहीं रहेगी, न ही संतुष्ट होगी। यह तो उसका छद्म एजेंडा है। असली एजेंडा है देश के धर्मनिरपेक्षवादी चरित्र को ध्वस्त कर देना। उसके स्थान पर गुरु गोलवरकर जी के सपनों को साकार करना। उनके ‘बंच ऑफ थॉट्स‘ के मार्ग दर्शन में आगे बढ़ना। इसलिए उत्तर-पूर्व में संघ-परिवार के उभार को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसके दूरगामी परिणामों पर नजर गड़ाए रखना होगा।
    मोदीजी कहते हैं कि मुसलमानों के एक हाथ में कुरान, दूसरे हाथ में कंप्यूटर होना चाहिए। इससे असहमति किसी की नहीं है। लेकिन वे यही बात तथाकथित लव जेहादियों, गौरक्षकों जैसों पर भी लागू करेंगे? उनके सौ खून माफ। यह कैसी आधुनिकता है, यह कैसा ‘सबका साथ-सबका विकास’ है! वास्तव में संघ परिवार उत्तर-पूर्व को अपनी नई सांस्कृतिक-धार्मिक प्रयोगशाला बनाने के उपक्रम में है जहाँ पिछली सदियों में पादरियों ने इस क्षेत्र का ईसाईकरण किया था, अब इस सदी में संघ जनजातियों का ‘हिन्दूकरण‘ करना चाहता है। जनजाति संस्कृति पर वर्चस्ववादी संस्कृति आरोपित करना चाहता है। मुख्य भारत के क्षेत्रों में इसने यही किया है। (लेखक की पुस्तक देखें-यादों का लाल गलियारा-दंतेवाड़ा) सारांश में, मोदी जी अल्पसंख्यकों का तो आधुनिकीकरण करना चाहते हैं, लेकिन अपने तथाकथित सांस्कृतिक सेना को मध्ययुगीनता के अस्तबल में ही बाँधे रखना चाहते हैं। कैसी है यह दोगली मानसिकता! क्या उत्तर-पूर्व की भी यही नियति रहेगी?
    जरूरत इस बात की है कि मोदी-शाह जुगलबंदी का राग कर्णाटक और अन्य प्रदेशों में सुनायी न दे, इसके लिए सभी सच्चे लोकतान्त्रिक राष्ट्रवादियों, धर्मनिरपेक्षवादियों, संविधानवादियों और नस्ल-जात विरोधियों को गोलबंद होने का समय है।          
 -रामशरण जोशी
मोबाइल : 09810525019
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

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