Saturday, 21 April, 2018

देश के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ और वामपंथ


   देश आजादी के बाद के सबसे जटिल संकट से गुजर रहा है। देश और अधिकतर राज्यों की सत्ता ऐसे समूह के हाथों में केन्द्रित है जो संपूर्णतः देश के मेहनतकशों के हितों पर डाका डाल कर पूँजीपतियों की तिजौरियाँ भरने को प्रतिबद्ध हैं, पर चोरी और सीनाजोरी साथ साथ नहीं चल सकते, अतएव सत्तारूढ़ गिरोह ने धर्म का लबादा ओढ़ लिया है। भेड़ों के शिकार के लिए भेड़िए ने भेड़ों की ही खाल ओढ़ ली है। देश की आबादी का लगभग 70 प्रतिशत भाग आज भी ग्रामों में रहता है। यह ग्रामीण भारत खेती और खेती से जुड़े लघु उद्यमों पर आश्रित है। वहीं ग्रामीण आबादी का एक भाग मजदूरी दस्तकारी करने को शहरों को जाता है और फसलों की कटाई-बोआई के समय गाँव लौट आता है। आज यह ग्रामीण समुदाय आर्थिक रूप से सबसे अधिक असुरक्षित और विपन्न है। कारण-खेती बेहद घाटे का सौदा बन चुकी है। पूँजीवादी अर्थतंत्र खेती के बल पर टिका हुआ है पर खेती किसान की लागत और मेहनत को निगल रही है। खेती बदहाल है तो उससे जुड़े लघु और कुटीर उद्योग भी बरबाद हैं। खेती और उसकी बदहाली के कई प्रमुख कारण हैं। कृषि उत्पादों की कीमतें तय करने का अधिकार किसान के पास नहीं है। कुछेक खाद्यान्नों की कीमतें सरकार तय करती है तो फल सब्जी और कई अन्य की कीमतें मंडी में माँग-आपूर्ति के आधार पर तय होती हैं। यह लागत, जमीन के किराए और किसान के परिश्रम की तुलना में काफी कम होती हैं। इसके अलावा खेती में काम आने वाली हर वस्तु की कीमत मुनाफे पर आधारित बाजार निर्धारित करता है। इससे खेत्ती का लागत मूल्य बढ़ जाता है। प्राकृतिक आपदाओं की मार भी किसानों के ऊपर ही पड़ती है।
    ऐसी ही अन्य कई वजहों से किसान निरंतर घाटे के चलते कर्जदार होता जा रहा है। बैंक ऋण हासिल करने में आने वाली कठिनाइयाँ उसे सूदखोरों से कर्ज लेने को बाध्य करती हैं। यही वजह है कि कर्ज में डूबे पीड़ित किसानों द्वारा आत्महत्याएँ करने का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। भाजपा और मोदी ने गत लोकसभा चुनावों के दौरान किसानों की आमदनी दोगुना करने का वादा किया था। पर अन्य वादों की तरह यह भी जुमला ही साबित हुआ। वस्तुतः किसान तथा अन्य ग्रामीण श्रमिक ठगा महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण श्रमिकों की जीवनरेखा- मनरेगा को भी सीमित कर दिया गया है।
    यद्यपि गत शताब्दी के सातवें दशक से ही मन्दी और उद्योग बन्दी शुरू होगयी थी लेकिन 1991 में शुरू हुए आर्थिक नवउदारवाद के दौर में मंदी और बंदी की यह रफ्तार और तेज हो गयी। मोदी सरकार के कतिपय कदमों जिनमें नोटबन्दी और जीएसटी का लागू किया जाना प्रमुख हैं, ने हालात को और संगीन बना दिया है। फलतः हमारी अर्थव्यवस्था में चहुँतरफा गिरावट स्पष्ट दिखाई दे रही है। डालर के मुकाबले रूपये की कीमत निरंतर गिर रही है। आयात बढ़ा है और निर्यात घटा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीएसटी) की दर हो या औद्योगिक उत्पादन की दर, लगातार क्षरण की ओर है। इसके परिणाम स्वरूप बेरोजगारी में बेतहाशा वृद्धि हुई है। मोदीजी ने दो करोड़ नौजवानों को हर वर्ष रोजगार देने का वादा किया था पर उन्हें रोजगार देने के बजाए सिर्फ मुद्रा, स्टार्टअप, स्किल इंडिया और डिजिटल इंडिया आदि नारों से बहलाने की कोशिश की जा रही है। देश की युवा पीढ़ी भाजपा की गलत नीतियों का खामियाजा भुगत रही है। पूँजीपतियों, जिनके कतिपय हिस्से आज कारपोरेट घराने बन चुके हैं, को लाभ पहुँचाने को जनता की गाढ़े पसीने की कमाई से स्थापित हुए व स्वदेशी बुद्धिमत्ता और परिश्रम से विकसित हुए सार्वजनिक उद्यमों को उनके हाथों बेचा जा रहा है। बैंकों में आम जनता के जमा धन को जबरिया धनिक वर्ग को दिलाया जा रहा है जिसे वे वापस करने के बजाय बट्टे खाते में डलवा रहे हैं या फिर बैंकों से भारी रकमें लेकर विदेशों को भाग रहे हैं। बैंकों से लगातार हो रही इन अवैध निकासियों का भार सामान्य निवेशकों पर डाला जा रहा है। जितने घपले घोटाले संप्रग सरकार के दो कार्यकालों में हुए थे उससे कहीं ज्यादा राजग/भाजपा के चार सालों में हो चुके हैं। सार्वजनिक शिक्षा प्रणाली को बरबाद करने की प्रक्रिया दशकों से जारी थी लेकिन मोदी राज में वह और तेज हुई है। शिक्षा का बजट निम्नतम् स्तर पर ला दिया गया है। अब चुनिंदा और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को निजीकरण की दिशा में धकेला जा रहा है। नीति यह है कि इसे इतना महँगा बना दिया जाए कि समाज के सामान्य हिस्से इससे वंचित हो जाएँ और वे लुटेरी और शोषक पूँजीवादी व्यवस्था की भट्टी में जलने वाले सस्ते ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होते रहें। इस उद्देश्य से श्रम कानूनों को भी नख-दन्त विहीन बनाया जा रहा है। शिक्षा को धर्मान्धता, पाखण्ड, पोंगापंथ और सांप्रदायिकता फैलाने का औजार बनाने के लिए इसके पाठ्यक्रमों में प्रतिगामी बदलाव किये जा रहे हैं। इतिहास, कला और संस्कृति की व्याख्या नागपुरी दृष्टिकोण से की जा रही है।
   शिक्षा की तरह स्वास्थ्य सेवाएँ भी सरकार के निशाने पर हैं और वे भी बेहद महँगी, छलपूर्ण और आम आदमी की पहुँच से बाहर होती चली जा रही हैं। महँगाई ने निरंतर पाँव पसारे हैं और सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पंगु बना कर गरीबों के मुहँ का निवाला छीना जा रहा है। हर तरह की सब्सिडी पर कुल्हाड़ी चलाई जा रही है। आतंकवाद को समाप्त करने और सीमा पार के दुश्मनों का खात्मा करने के मोदी और भाजपा के दावों का खोखलापन इसी से जाहिर हो जाता है कि गत चार सालों में पूर्व के भारत-पाक युद्धों से भी अधिक संख्या में हमारे सैनिक और अन्य सुरक्षा बलों के जवान शहीद हो चुके हैं। मोदी, भाजपा और आरएसएस की काकटेल और कारपोरेट हितों की पोषक इस सरकार के प्रति जनता का मोहभंग तेजी से बढ़ रहा है। हाल में कई राज्यों में हुए उपचुनावों, निकाय और अन्य चुनावों के परिणामों ने भाजपा के पैरों तले से जमीन के खिसकने का संकेत दे दिया है। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और फूलपुर की लोकसभा सीटें, जिन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री  जीते थे, पर भाजपा की करारी हार ने साबित कर दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की पराजय का रास्ता तैयार हो रहा है। उनका दावा कि “मोदी का कोई विकल्प नहीं”, उत्तर प्रदेश में ही जमींदोज होने जा रहा है।
    जाहिर है संपूर्ण सत्ता का स्वाद चख चुकी भाजपा और उसका रिंग मास्टर आरएसएस इसे इतनी आसानी से छोड़ने वाला नहीं। बेनकाबी जितनी तेजी से बढ़ रही है उसको नकाब पहनाने के प्रयास भी उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं। अतएव हर वह हथकंडा जो जनता को गुमराह और विभाजित कर सके अपनाया जा रहा है। सभी जानते हैं कि मंदिर-मस्जिद विवाद सर्वोच्च न्यायालय के
विचाराधीन है और उसका फैसला आने पर ही हल की ओर बढ़ सकता है। फिर भी मंदिर निर्माण के लिए अलग-अलग मुखों से तीखे बोल बोले जा रहे हैं। कथित लव जिहाद, गोरक्षा और तीन तलाक जैसे मुद्दों की आड़ में अल्पसंख्यकों और दलितों को निशाना बनाया जा रहा है। दंगे कराये जा रहे हैं और दंगों तथा हत्याओं में संलिप्त संघी अपराधियों को आरोपों से मुक्त किया जा रहा है। विभाजनकारी यह एजेंडा दिन ब दिन धारदार बनाया जाना है। संविधान और न्यायिक प्रणाली तक को बदलने का प्रयास जारी है।
    कारपोरेट हितों की पोषक और फासिस्टी रुझानों से सराबोर इस सरकार को सत्ताच्युत करना आज हर लोकतंत्रवादी ताकत का सबसे प्रमुख लक्ष्य बन गया है। वामपंथ ने तो इस सरकार के पदारूढ़ होते ही संकल्प व्यक्त किया था कि वह इस जन विरोधी और लोकतंत्र विरोधी सरकार को उखाड़ फैंकने को कोई कोर कसर बाकी नहीं रखेगी। तदनुसार वामदलों और उनके सहयोगी संगठनों ने इन चार सालों में अनेक जन प्रश्नों पर आन्दोलन खड़े किए हैं। परन्तु परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए ये नाकाफी हैं। अतएव समय की माँग है कि
जनविरोधी, लोकतंत्र और संविधान विरोधी इस सरकार को अपदस्थ करने को एक व्यापक और व्यावहारिक रणनीति बनाई जाए। सभी लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी ताकतों का एक प्लेटफार्म तैयार कर संघर्षों को नई ऊँचाइयों तक ले जाया जाए। बरबादी की जड़ आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों का एक आर्थिक-सामजिक विकल्प पेश किया जाए। सांप्रदायिकता, धर्मान्धता और रूढ़िवादिता के खिलाफ वैचारिक मुहिम छेड़ी जाए। इसके लिए संकीर्णताओं से मुक्त और कार्यक्रम
आधारित वामपंथी एकता बेहद जरूरी है। वामपंथी दलों को इस दिशा में तत्काल ठोस पहल करनी चाहिए। पूर्व की भाँति ढील-ढाल और हीला-हवाली नकारात्मक परिणाम दे सकती है। अच्छी बात है कि देश की दो प्रमुख पार्टियों-भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राष्ट्रीय
महाधिवेशन इसी अप्रैल माह में होने जारहे हैं। एक अन्य कम्युनिस्ट पार्टी माले का महाधिवेशन भी हो रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन महाधिवेशनों से अभूतपूर्व वाम एकता और उसके इर्द-गिर्द व्यापक जनवादी ताकतों की एकता का मार्ग अवश्य ही प्रशस्त होगा।             
    
-डॉ. गिरीश
मोबाइल : 09412173664
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

उत्तर-सत्य के इस काल में कम्युनिस्टों की मुक्तिकामी राजनीति को स्थापित करना होगा


यह समय भारत की राजनीति में एक नये प्रकार के उथल-पुथल का समय है, जिसमें भाजपा-आरएसएस सत्ता के मद में अपने सारे कपड़े उतार कर निपट नंगे रूप में सरे बाजार सीना फुलाये घूम रहे हैं और पूरा देश उनकी सारी उदंडताओं को देखते हुए 2019 के चुनाव की अधीरता से प्रतीक्षा कर रहा है। मोदी के स्वेच्छाचारी शासन के खिलाफ जनता के तमाम हिस्से लामबंद हो रहे हैं। दूसरी ओर यही समय भारत के कम्युनिस्ट आंदोलन के लिए एक प्रकार के अस्तित्वीय संकट का समय भी जान पड़ता है जिसमें उसे पूरी तरह से दीवार से सटा दिए जाने की स्थिति से अपनी पूरी ताकत लगा कर पलट कर खड़ा होने की ताकत का परिचय देना है। संयोग से अभी भारत की दो प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों की पार्टी कांग्रेस की प्रक्रिया का भी समय है, उनकी सर्वोच्च नीति नियामक सभा के आयोजन का समय।
    इसलिए देश और दुनिया के सामने आज के समय की बिल्कुल नई प्रकार की चुनौतियों के वक्त कम्युनिस्ट पार्टियों की कांग्रेस के ये आयोजन बहुत ही अर्थपूर्ण और संभावनापूर्ण साबित हो सकते हैं। समय और राजनीति का पूरा परिदृश्य तेजी से बदल चुका है और कम्युनिस्ट पार्टियों को इन नई परिस्थितियों के संदर्भ में खुद को रखते हुए यदि राजनीति की अपनी समझ को विकसित और समीचीन नहीं बनाती है, व्यापक मेहनतकश जनता के हितों से जुड़े अपने मूल तत्व की शक्ति को नये सिरे से अर्जित नहीं करती है तो भारत में वामपंथ की गिरावट के इसी बीच जो सभी संकेत सामने आ चुके हैं, उनसे आगे उबर पाना असंभव हो जाएगा। ये पार्टी कांग्रेस ही एक प्रकार से ऐसे बचे हुए अवसरों में से एक सबसे प्रमुख अवसर हैं जब हर प्रकार की कोरी गुटबाजी से ऊपर उठते हुए पार्टी एक गंभीर बहस और समकालीन परिस्थिति का सटीक विश्लेषण करके नये सिरे से भारत की राजनीति में मेहनतकशों के संगठित हस्तक्षेप की संभावनाओं को बनाये रख सकती है।
    सारी दुनिया में कम्युनिस्ट राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता क्या है? कम्युनिस्ट राजनीति का मूल तत्व है जनता की मुक्ति, उसके जीवन को तमाम बंधनों से मुक्त करके उसकी सर्जनात्मक शक्ति को उन्मोचित करना। कम्युनिस्ट राजनीति का लक्ष्य कभी भी शुद्ध रूप में किसी राजसत्ता के दमनकारी तंत्र का निर्माण नहीं हो सकता है। समाजवादी क्रांति के बाद निर्मित समाजवादी व्यवस्था और राजसत्ता का लक्ष्य भी सभी प्रकार की राजसत्ता को खत्म करने की दिशा में ही चरितार्थ हो सकता है। जब भी समाजवादी राज्य अपनी उस भूमिका को भूल कर सिर्फ जनता पर शासन करने के एक तंत्र के रूप में काम करने लगता है, उसमें वे सारी विकृतियाँ उत्पन्न होने लगती हैं, जो समाजवाद के मुक्तिदायी चरित्र को उससे छीन लेती हैं। सोवियत संघ में समाजवाद के पराभव के मूल में यही सच्चाई काम कर रही थी जहाँ किसी भी वजह से क्यों न हो, समाजवादी व्यवस्था ने भी एक दमनकारी नौकरशाही व्यवस्था का रूप ले लिया था और इसलिए समाजवाद को मुक्तिकामी चरित्र और पूँजीवाद-सामंतवाद के शोषणकारी चरित्र के बीच का फर्क ओझल होने लगा जो अंत में समाजवाद के पूरी तरह से पराभव का कारण बना।
    इसी मानदंड पर भारत में कम्युनिस्ट पार्टियों को भी अपनी राजनीति की बार-बार समीक्षा-पुनर्समीक्षा करने की जरूरत है। भारत में आजादी के इन सत्तर सालों में एकाधिक राज्यों में कम्युनिस्ट पार्टियों को राज्य सरकारें बनाने का मौका मिला है और केरल, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा की इन सरकारों ने खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भूमि सुधार और पंचायती राज के कामों के जरिए गाँव के गरीबों के जीवन को जिस प्रकार से शोषण के जुए से मुक्त किया, वह भारतीय राजनीति के इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय कहलाएगा। इसीका परिणाम रहा कि पश्चिम बंगाल में तो रिकर्ड 34 सालों तक लगातार वाम मोर्चा सरकार का शासन कायम रहा, लेकिन भूमि सुधार के इन कामों के अलावा शहरी और औद्योगिक क्षेत्र में वामपंथी सरकारें अपनी भूमिका को दूसरी पूँजीवादी पार्टियों से अलग रूप में दिखाने में असमर्थ रहीं। उल्टे तंत्र पर उसकी निर्भरशीलता ने मौके-बेमौके इन सरकारों को अपनी ही जनता की आकांक्षाओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया। शहरी विकास के लिए जमीन के
अधिग्रहण के मामले में इसका नजरिया गरीब जनता के हित में होने के बजाए उनके खिलाफ तक देखा गया, और भारतीय वामपंथ को इससे एक भारी राजनैतिक खामियाजा भुगतना पड़ा है। इसके कारण वामपंथ अपने मुक्तिकामी चरित्र के साथ समझौता करता हुआ दिखाई देने लगता है।
    पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और सिंगुर के बाद अभी हाल में केरल के कन्नूर जिले के एक छोटे से गाँव में एक बाईपास बनाने के लिए जमीन के अधिग्रहण के मामले में विवाद ने जो रूप लिया, वह भी कुछ ऐसा ही मामला था, लेकिन सौभाग्य की बात है कि अंततः केरल की सरकार के वामपंथी नेतृत्व में शुभ बुद्धि का उदय हुआ और उन्होंने इस समस्या के समाधान का एक वैकल्पिक रास्ता खोज लिया-जमीन के अधिग्रहण के बिना फ्लाई ओवर के जरिए काम को आगे बढ़ाने का रास्ता।
    यह विवाद इसी बीच इतना बढ़ गया था कि वह राष्ट्रीय खबरों में शामिल हो गया था। वहाँ की एलडीएफ सरकार और पार्टी गाँव के अंदर से ही सड़क को ले जाने पर तुले हुए थे और किसान अपनी जमीन को न देने पर आमादा थे। जाहिर है कि यह हमें अनायास ही बंगाल की नंदीग्राम और सिंगुर की घटनाओं की याद दिला रहा था। सत्ता पर आकर राजनीति को भूल सिर्फ अर्थनीतिक ‘विकास’ के प्रति मोहांधता सचमुच एक कथित क्रांतिकारी पार्टी के द्वारा जनता के अराजनीतिकरण का काम करने की तरह है। समाज में कोई भी परिवर्तन सर्व-मान्य धारणाओं से चिपके रह कर संभव नहीं है, बल्कि नया कुछ करने के लिए प्रचलित सोच से अपने को काटना पड़ता है। वही राज्य की अपनी जड़ता को भी तोड़ने का कारक बन सकता है और इस प्रक्रिया में जनता के साथ वैर की कोई जगह नहीं हो सकती है। पार्टी का नौकरशाही ढाँचा अक्सर अपने को जनता की इस प्रकार की अन्दुरूनी सक्रियता, उसके आंदोलन के खिलाफ खड़ा कर लेता है।
    इसलिए वामपंथ के लिए प्रमुख बात यह है कि जनता के जो भी हिस्से अपने जीवन की समस्याओं के लिए जो भी आंदोलन कर रहे हो, वामपंथी ताकतों को उन आंदोलनों में अपनी मौजूदगी और उनके साथ हमेशा अपनी एकजुटता के लिए हमेशा तत्पर रहना चाहिए। क्रांतिकारी राजनीति का दायित्व शासन की समस्याओं का समाधान नहीं है, जनता की समस्याओं का समाधान है और अपने इसी दायित्व के तहत उन्हें  अपने शासन को भी संचालित करना चाहिए। फिर यह समस्या आम लोगों की अपनी राष्ट्रीय-जातीय पहचान से जुड़ी हुई भी हो सकती है, वर्ण-वैषम्य से मुक्ति की भी हो सकती है, गाँव के किसानों के उत्पाद के वाजिब मूल्य की माँग की हो सकती है या संगठित-असंगठित क्षेत्र के मजदूरों, कर्मचारियों और विभिन्न पेशेवरों की जीविका के सवालों से भी जुड़ी हो सकती है। 
    आज सामान्य तौर पर देखा जाए तो भारत की राजनीति के लिए भारतीय गणतंत्र की रक्षा का सवाल एक सबसे प्रमुख सवाल है। मोदी-आरएसएस सरकार के रूप में एक ऐसी शक्ति ने यहाँ राजसत्ता पर अपना कब्जा कर रखा है जो इस देश के धर्म-निरपेक्ष और जनतांत्रिक
संविधान पर, नागरिकों के मूलभूत अधिकारों पर विश्वास नहीं करती है। हिटलर की प्रेरणा से निर्मित इस संगठन का एकमात्र लक्ष्य है सारी सत्ता को केंद्रीभूत करके एक अधिनायकवादी शासन-व्यवस्था कायम करना। नागरिकों की हैसियत इनकी नजर में गुलामों से बेहतर नहीं है। पिछले चार सालों में अपने अनेक कदमों से इसने अपने इन इरादों को पूरी नंगई के साथ प्रकट किया है। नोटबंदी और जीएसटी की तरह के कदम एक वही स्वेच्छाचारी सरकार उठा सकती है जो जनता को अपना गुलाम मानती है। इसी प्रकार जिस धृष्टता के साथ ये न्यायपालिका के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जज की हत्या तक के मसलों को दबाने की कोशिशों से बाज नहीं आ रहे हैं, उसने जनतांत्रिक राजनीति के सभी रूपों के सामने संकट पैदा कर दिया है। पूरी अर्थ-व्यवस्था ठप है।
    इन सबके साथ ही आज के समय में मीडिया के विभिन्न रूपों के प्रयोग से जिस प्रकार झूठ को ही राजनीति का आधार बना दिया जा रहा है, वह आज के समय का एक बेहद खतरनाक पहलू है। इसी वजह से आज के युग को ही उत्तर-सत्य का युग कहा जाने लगा है। हम जानते हैं कि हर जगह बुर्जुआ राजनीतिज्ञ झूठ बोलते रहे हैं, लेकिन यहाँ समस्या यह है कि राजनीतिज्ञों की इस नई पौध का सच से जैसे कोई नाता ही नहीं है! और इससे भी बड़ी समस्या यह है कि इतनी नंगई के साथ झूठ बोलने वाला भी राजनीति में जनता के द्वारा पुरस्कृत हो जाता है। साधारण लोगों को उसकी उटपटांग बातों से कुछ इस प्रकार का अहसास होने लगता है कि देखो, यह एक शेर आया है जो अब तक के सारे बुद्धिमानों, कुलीनों की अक्ल ठिकाने लगा सकता है।
    दुनिया में डोनाल्ड ट्रंप को इस पोस्ट ट्रुथ का प्रवर्तक माना जाता है। लेकिन राजनीति के इस रूप का हमारा अनुभव तो ट्रंप से भी दो साल पुराना है, केंद्र की राजनीति में मोदी के उदय के समय से ही। हमने तो देखा था कि मोदी कैसे धड़ल्ले से तक्षशिला को बिहार में ले आए थे और सिकंदर की लड़ाई बिहारियों से करवा दी थी। उन्होंने जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी को क्रांतिकारी बताने के लिए उन्हें लंदन में श्याम कृष्ण वर्मा बता दिया। यहाँ तक कि धारा 370 के बारे में कह दिया कि वह तो सिर्फ औरतों के अधिकारों से जुड़ी एक धारा है। ऐतिहासिक तथ्यों की मनमानी व्याख्या में भी उनकी कोई बराबरी नहीं थी। भारत को वे 1000-1200 साल से गुलाम बताने से नहीं हिचकते। सामाजिक समरसता नामक पुस्तक का विमोचन करते हुए उन्होंने कह दिया कि “दलित मंद बुद्धि बच्चों की तरह होते हैं।” वाल्मीकि समुदाय के लोगों के बारे में कहा कि वे आध्यात्मिक अनुभव लेने के लिए मैला ढोया करते हैं और गटर साफ करते हैं। सोहराबुद्दीन शेख के फर्जी इनकाउंटर के बारे में भरी सभा में कहा कि वह इसी प्रकार के व्यवहार का हकदार था, और उस पर सभा में शामिल लोगों का अनुमोदन भी हासिल किया। हांकने में वे इतने उस्ताद रहे कि पश्चिमी सीमाओं पर डटे हुए सैनिकों के प्रति अपने प्रेम को जताने के लिए कह दिया कि वे 700 किलोमीटर की पाइप लाईन बैठा कर उनके लिये नर्मदा का पानी लाये हैं। इसके पहले अपनी एक सभा में उन्होंने फैला दिया था कि 15 दिसंबर 2012 के दिन भारत गुजरात और
सिंध को समुद्र में अलग करने वाले सर क्रीक मुहाने को पाकिस्तान को सौंप देगा, जबकि इस विषय पर कभी किसी की किसी के साथ कोई चर्चा तक नहीं हुई थी। सन् 2002 में मुसलमानों के बारे में कहा कि उनका उसूल है हम पाँच और हमारे पच्चीस। जबकि गुजरात में मुसलमानों की आबादी के अनुपात में पचास साल में कोई वृद्धि नहीं हुई है। सोनिया गांधी के इलाज पर सरकार ने 1800 करोड़ रुपये खर्च कर दिए, यह भी उनका फैलाया हुआ ही एक झूठ था। मोदी शुरू से लेकर आज तक ऐसी न जाने कितनी बेतुकी, तथ्यहीन बातें कहते रहे हैं, इसका कोई हिसाब नहीं है। नोटबंदी के समय तो वे हर रोज एक नया झूठ गढ़ा करते थे। अभी वे डावोस में अपने भाषण में कितनी झूठी बातें बोल रहे थे, भारत में शांति और समृद्धि के बारे में, लाल फीताशाही के खात्मे और इनक्लुसिव ग्रोथ के बारे में। इन बातों को हम सब जानते हैं। जिस समय वे भारत में सबका साथ सबका विकास की बात कह रहे थे, उसी समय यहाँ  पर इन तथ्यों पर चर्चा चल रही थी कि देश की 73 प्रतिशत संपदा पर 1 प्रतिशत लोगों का कब्जा है। देश में अपने को सुखी और समृद्ध समझने वालों की संख्या घटते-घटते अब आबादी का सिर्फ तीन प्रतिशत रह गई है और प्रधानमंत्री डावोस में बड़े लोगों के अपने टोले के साथ बेपनाह मौज में लगे हुए थे।
    इसके अतिरिक्त मीडिया का विस्फोट भी उत्तर-सत्य की इन परिस्थितियों में अपनी भूमिका अदा कर रहा है। सूचना केंद्रों के बिखराव से झूठ और अफवाहों के केंद्रों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। व्हाट्स अप इंडस्ट्री तो झूठ की फैक्ट्री है। इसके ग्रुप के सदस्य आपस में ही एक-दूसरे पर विश्वास करते हैं, और किसी पर नहीं। इस प्रकार के केंद्रों से फैलाये जाने वाले झूठ की काट भी मुश्किल होती है। इन सब चक्कर में अक्सर जिसका नुकसान होता है वह है सच का नुकसान। बहसें सच पर नहीं, झूठ पर केंद्रित हो जाती हैं। जीवन के असली विषय पीछे छूट जाते हैं। भारत के टीवी मीडिया पर जब मोदी के आईटी सेल का छोड़ा हुआ दूसरा कोई मुद्दा नहीं होता है तब किम जोंग उन या सीरिया, इराक की कहानियां छाई रहती हैं। इन हालात का इसके अलावा हमें दूसरा कोई उत्तर नहीं दिखाई देता है कि परिस्थितियाँ जितनी भी प्रतिकूल क्यों न हो, सत्य की लड़ाई लड़ने वालों को पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपने सत्य पर अडिग रहना होगा। झूठ से मुकाबले के नाम पर उसी के जाल में फंसने से बचना होगा। सत्य की ताकत पर भरोसा रखना होगा। आज मीडिया के विस्फोट के इस काल का एक सच यह भी है इसमें झूठी बातों पर से बहुत जल्द ही पर्दा भी उठ जाता है। फैलाए गए झूठ का तत्काल सही काट भी व्हाट्सअप, फेसबुक आदि पर आ जाता है। हर षड्यंत्र के बेनकाब होने की संभावना भी बनी रहती है। यह सोशल मीडिया का ही दबाव है कि जज लोया के मामले की तलवार आज भी अभियुक्त अमित शाह पर लटक रही है। कानून की दुनिया को अगर इस उत्तर सत्य ने प्रभावित किया है, तो उसमें विद्रोह के बीज भी सत्य की लड़ाई के जरिए देखने को मिल रहे हैं। आज उत्तर-सत्य के मोदी-शाह जैसे नायकों को भी इसी के औजारों का डर सता रहा है। कहना न होगा इससे राज्य के और ज्यादा दमनकारी होने का खतरा है, तो आम लोगों में विद्रोह की संभावना भी बन रही है। मोटे तौर पर यह एक राजनैतिक परिस्थितियों का संदर्भ है जिसमें भारत के कम्युनिस्टों को अपनी मुक्तिकामी राजनीति को नए सिरे से अर्जित करना है। यह काम सभी जनतंत्र-प्रेमी और धर्म-निरपेक्ष ताकतों को लामबंद करने की एक व्यापक राजनैतिक दृष्टि के जरिये ही किया जा सकता है। भविष्य सिर्फ और सिर्फ जनता को बंधनों से मुक्त करने वाली राजनीति पर विश्वास करने वाली ताकतों का ही है।  
-अरुण माहेश्वरी
मो-09831097219
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

कार्ल मार्क्स के अनमोल विचार


  
दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास खोने को कुछ भी नहीं है सिवाय अपनी जंजीरों के। हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार, हर किसी को उसकी जरूरत के अनुसार-
  • इतिहास खुद को दोहराता है, पहले एक त्रासदी की तरह, दूसरे एक मजाक की तरह।                     
  • कोई भी जो इतिहास की कुछ जानकारी रखता है वह ये जानता है कि महान सामाजिक  बदलाव बिना महिलाओं के उत्थान के असंभव हैं। सामाजिक प्रगति, महिलाओं की सामजिक स्थिति, जिसमें बुरी दिखने वाली महिलाएं भी शामिल हैं, को देखकर मापी जा सकती है।                 
  • लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है।         
  • पूँजी मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह केवल जीवित श्रमिकों का खून चूस कर जिंदा रहता है, और जितना अधिक ये जिंदा रहता है उतना ही अधिक श्रमिकों को चूसता है।दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ, तुम्हारे पास  खोने को कुछ भी नहीं हैए सिवाय अपनी जंजीरों के। कार्ल मार्क्स धर्म मानव मस्तिष्क जो न समझ सके उससे निपटने की नपुंसकता है। 
  • शासक वर्ग को कम्युनिस्ट क्रांति के डर से कांपने दो। मजदूरों के पास अपनी जंजीरों के आलावा और कुछ भी खोने को नहीं है। उनके पास जीतने को एक दुनिया है। सभी देश के कामगारों एकजुट हो जाओ।    
  • मेरा भी मालिकाना होगा कब्जा होगा हम सबका- बार्सिलोना हाबिक मोसान मैनचेस्टर के कपड़ा मिलों पर अगर नहीं, तो नहीं!       
    (अनुवाद-दिगम्बर)

-गोपाल मिश्रा
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित 

वन्दे जम्हूरियत


   त्रिपुरा में ढाई दशकों के शासन के बाद मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता के पतन को वाम विचारधारा के अंत के रूप में देखना-प्रचारित करना सरासर इतिहास विरोधी दृष्टि होगी। त्रिपुरा में  हार को वाम शक्तियों की राज सत्ता के पराभव के रूप में देखा जा सकता है, न कि वामवादी वैचारिक सत्ता की पराजय।
    फिर भी ठोस राजनैतिक यथार्थ को नजरंदाज करना भी इतिहास से मुँह मोड़ना होगा। यकीनन यह समय दक्षिणपंथ की आक्रमकता का है, जिसके आलम हमलावर हैं नरेन्द्र मोदी, डोनाल्ड ट्रम्प जैसे लोग अमरीका, यूरोप ,एशिया समेत विश्व के दूसरे भागों में कॉर्पोरेट-याराना पूँजीवाद के राकेट पर सवार होकर  दक्षिणपंथी शक्तियाँ चारों दिशाओं में हमले कर रही हैं। इस नक्शे को दिमाग में रख कर त्रिपुरा-हार और  संघ-भाजपा उभार को देखा जाना चाहिए।
    प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने त्रिपुरा चुनाव प्रचार में हुंकार भरी थी कि राज्य में वामपंथ के गढ़ को ध्वस्त करके रहेंगे। उन्हें माणिक-सरकार से कहीं ज्यादा नफरत थी ‘वामपंथ ‘ से। अतः मोदी-सेना ने जैविक  घृणा से लैस होकर त्रिपुरा पर धावा बोल दिया। कामयाबी भी मिली, लेकिन इसका श्रेय वैश्विक दक्षिण पंथी ताकतों को भी जाता है। हालाँकि, जन-फैसले का आदर किया जाना चाहिए, लेकिन, सच यह भी है कि अकूत संसाधनों से लैस संघ-परिवार ने त्रिपुरा चुनावों में अपनी पूरी शक्ति झांक दी थी। त्रिपुरा-विजय का सबब-सन्देश है निरंकुश पूँजीवाद का विस्तार, कट्टरवादी-अंधराष्ट्रवादी-युद्ध उन्मादी प्रवृतियों का फैलाव : फियर-सायकोसिस से प्रगतिशीलों-अल्पसंख्यकों की सामजिक व राजनैतिक घेराबंदी। भाजपा एक सामान्य व प्रोफेशनल राजनैतिक पार्टी नहीं है। यह पूरी तरह से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर आश्रित है। संघ का सुदूरगामी  एजेंडा  है भारत को ‘धार्मिक उर्फ हिन्दू राष्ट्र‘ बनाना। इसके लिए संविधान में संशोधन अनिवार्य है। यह तभी मुमकिन है जब संसद और विधान सभाओं में अनिवार्य सस्दस्य संख्या रहे। इसलिए त्रिपुरा-जीत या उत्तर-पूर्व विजय अभियान पर वैचारिक दूरबीन से नजर रखनी होगी।
    प्रधानमंत्री मोदी कहते हैं कि वास्तु शास्त्र की दृष्टि से  उत्तर-पूर्व दिशा अच्छी होती है। उन्होंने  इस चुनावी सफलता को तुरंत ही मध्ययुगीन मानसिकता के साथ नत्थी कर दिया। दूसरे शब्दों में इसे धार्मिक-सांस्कृतिक रंग दे डाला। एक ‘अखिल भारतीय हिन्दुत्त्व मानसिकता’ को चुनावी राजनीति के केंद्र में ले आए, यह खतरनाक संकेत है। संघ परिवार की कोशिश यही है कि पूरा देश ‘संघ मय‘ व ‘हिन्दू’ मय बन जाए। इस सन्दर्भ में संघ-सुप्रीमो मोहन भागवत के दम्भ भरे उवाच को याद रखना चाहिए। उन्होंने 25 फरवरी को मेरठ में आह्वान किया था कि  ‘सारा समाज संघ बने।’ वे कहते हैं कि हिन्दुओं को एकताबद्ध होना पड़ेगा। उनके ही काँधों पर भारत की जिम्मेदारी है। इन शब्दों का सीधा अर्थ यह है कि भाजपा राजनैतिक  सफलताओं तक ही सीमित नहीं रहेगी, न ही संतुष्ट होगी। यह तो उसका छद्म एजेंडा है। असली एजेंडा है देश के धर्मनिरपेक्षवादी चरित्र को ध्वस्त कर देना। उसके स्थान पर गुरु गोलवरकर जी के सपनों को साकार करना। उनके ‘बंच ऑफ थॉट्स‘ के मार्ग दर्शन में आगे बढ़ना। इसलिए उत्तर-पूर्व में संघ-परिवार के उभार को हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। इसके दूरगामी परिणामों पर नजर गड़ाए रखना होगा।
    मोदीजी कहते हैं कि मुसलमानों के एक हाथ में कुरान, दूसरे हाथ में कंप्यूटर होना चाहिए। इससे असहमति किसी की नहीं है। लेकिन वे यही बात तथाकथित लव जेहादियों, गौरक्षकों जैसों पर भी लागू करेंगे? उनके सौ खून माफ। यह कैसी आधुनिकता है, यह कैसा ‘सबका साथ-सबका विकास’ है! वास्तव में संघ परिवार उत्तर-पूर्व को अपनी नई सांस्कृतिक-धार्मिक प्रयोगशाला बनाने के उपक्रम में है जहाँ पिछली सदियों में पादरियों ने इस क्षेत्र का ईसाईकरण किया था, अब इस सदी में संघ जनजातियों का ‘हिन्दूकरण‘ करना चाहता है। जनजाति संस्कृति पर वर्चस्ववादी संस्कृति आरोपित करना चाहता है। मुख्य भारत के क्षेत्रों में इसने यही किया है। (लेखक की पुस्तक देखें-यादों का लाल गलियारा-दंतेवाड़ा) सारांश में, मोदी जी अल्पसंख्यकों का तो आधुनिकीकरण करना चाहते हैं, लेकिन अपने तथाकथित सांस्कृतिक सेना को मध्ययुगीनता के अस्तबल में ही बाँधे रखना चाहते हैं। कैसी है यह दोगली मानसिकता! क्या उत्तर-पूर्व की भी यही नियति रहेगी?
    जरूरत इस बात की है कि मोदी-शाह जुगलबंदी का राग कर्णाटक और अन्य प्रदेशों में सुनायी न दे, इसके लिए सभी सच्चे लोकतान्त्रिक राष्ट्रवादियों, धर्मनिरपेक्षवादियों, संविधानवादियों और नस्ल-जात विरोधियों को गोलबंद होने का समय है।          
 -रामशरण जोशी
मोबाइल : 09810525019
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

बदली हुई स्थितियों में वाम आन्दोलन के नये पाठ के प्रयास के जरूरी सन्दर्भ


दुनिया भर में औद्योगिक क्रान्तियों ने सर्वहारा मजदूर वर्ग को जन्म दिया। इसके साथ ही मजदूर वर्ग की मुक्ति के विचारए विचारक तथा योद्धा पैदा हुए। मजदूर वर्ग के विस्तार तथा उसके शोषण ने उस बुनियादी संघर्ष को तेज किया जिसे ष्वर्ग संघर्षष् कहा जाता है। मार्क्स और ऐंगेल्स ने व्यवस्थित रूप से दर्शनए समाजए इतिहासए विज्ञान के अध्ययन और विश्लेषण द्वारा शोषण.उत्पीड़न के औजारों को चिह्नित किया। प्रत्येक तरह के शोषण से मुक्ति का विचार ष्क्रान्तिष् की अवधारणा पेश की। अपने अध्ययन क्रम में उन्होंने अपना प्रस्थान बिन्दू तय किया कि ष्ष्अब तक दार्शनिकों ने दुनिया को समझने का प्रयास किया है सवाल इसके बदलने का है। इसी क्रम में कम्युनिस्ट घोषणापत्र दुनिया भर के मजदूरों तथा उनके साथियों के लिए मार्गदर्शक सिद्धान्त बन गया। मार्क्स ने साफ किया कि चली आ रही व्यवस्था में शोषण.उत्पीड़न का अन्त देखना गलत होगा। हमें एक नई व्यवस्था का निर्माण करना होगा। शोषण.उत्पीड़न का आधार उत्पादन के साधनों की इजारेदारी को अर्थात निजी सम्पत्ति खत्म कर एक सहकार की व्यवस्था बनायी जाएए तभी शोषण का अन्त सम्भव है। इस अवधारणा तथा विचार दर्शन को क्रान्ति का दर्शन कहा जाता है।
    अपने अध्ययन विश्लेषण में मार्क्स.ऐंगेल्स ने साफ किया कि किसी भी समाज व्यवस्था का आधार उत्पादन के साधनए उस पर मालिकाना हकए उजरती श्रम और वितरण प्रणाली ही होती है। अब तक प्राचीन सामन्ती समाज से पूँजीवादी समाज में हुए रूपान्तरण में पुराने शोषण के रूप थोड़े परिवर्तन के साथ बने रहे बल्कि और निर्मम हो गये। इसलिए न्यायपूर्ण समाज निर्माण के लिए सम्पूर्ण व्यवस्था को ही बदलना होगा। इस सन्दर्भ में उन्होंने वर्गए वर्ग समाजए वर्ग संघर्ष तथा क्रान्ति की पूरी रूपरेखा प्रस्तुत किया। कम्युनिस्ट घोषणा पत्र से लेकर बहुत सारी महत्वपूर्ण कृतियाँ उनके क्रान्तिकारी कार्यक्रम का मसौदा हैं। लेकिन जहाँ दुनिया भर के मजदूर आन्दोलन से जुड़े लोगोंए पार्टियोंए संगठनों ने कम्युनिस्ट घोषणा.पत्र को अपना मार्गदर्शक सिद्धांत बनाकर कार्य किया वहीं घोषणा.पत्र की अन्तिम पंक्ति को हमेशा भुला दिया जाता रहा। वहीं पहली पंक्ति अब तक प्राप्त इतिहास वर्ग संघर्षों का हैए याद रहाए वहीं अन्तिम पंक्ति ष्ष्निःसन्देह भिन्न.भिन्न देशों में ये उपाय भिन्न.भिन्न होगेष्ष्।ए भुला दिया या भूलते रहेए जिन्होंने इसे याद रखा उन्होंने अपने देश में क्रान्तियाँ कीं और नये समाज की नींव रखी। जिन्होंने भुला दिया वे समाज परिवर्तन की लड़ाई में पिछड़ते गये।
    20वीं शताब्दी के महान सर्वहारा क्रान्तियों का अध्ययन किया जाये तो यह बात बहुत ही साफ है कि प्रत्येक देश में होने वाली क्रान्तियाँ अलग.अलग तरीके से सम्पन्न हुईं। रूसए चीनए वियतनामए क्यूबा के संघर्ष और क्रान्ति बिल्कुल अलग.अलग हैं। कोई किसी की कापी नहीं है। यहाँ यह भी साफ तौर पर देखा जा सकता है कि अपने.अपने देश.समाज के ठोस आर्थिक.सामाजिक.सांस्कृतिक स्थितियों के अनुसार रणनीति तथा कार्यक्रम बनाने तथा उस पर अमल करने से ही वहाँ क्रान्तियां सम्भव हुइंर् या हो सकीं।
    उपर्युक्त बातें कोई नई नहीं हैं लेकिन आज बहुत ही जरूरी हैं। क्योंकि दुनिया भर में तथा अपने देश में हम सर्वाधिक कठिन समय.दौर से गुजर रहे हैं। इस सचाई से मुँह मोड़ना बेहत आत्मघाती होगा कि आज हम इतिहास में सबसे कमजोर स्थिति में हैं या पहुँच गए हैं। वामपंथ की सभी तरह की धाराएँ आज धीमी व बचाव मुद्रा में हैं। लेकिन इसके उलट भारी संख्या में जनान्दोलन खासकर किसान.मजदूर.दलित.छात्र आन्दोलन के बाढ़ का भी यह समय है। अमरीका से लेकर भारत तक छात्र.नौजवान सड़कों पर हैं और संकट ग्रस्त पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ रहे हैं। या इसे इस रूप में कहें कि वित्तीय पूँजी तथा कारपोरेट लूट से पैदा होने वाले संकटों के विरुद्ध संघर्षरत हैं। ऐसे में कमजोर आत्मगत शक्तियों और विस्फोटक वस्तुगत परिस्थितियों के बीच एक फॉक सी दिखलाई पड़ रही है। ऐसे में विस्फोटक वस्तुगत परिस्थितियों का विश्लेषण तथा आत्मगत शक्तियों की वैचारिक तैयारी का यह जरूरी समय है। इसे व्यापक स्तर पर वामपंथ की प्रत्येक धारा तक जमीनी स्तर के बहस में बदलना आज की आवश्यकता है। यह भी यहाँ साफ होना चाहिए कि कोई एक सूत्र.एक बिन्दु.एक रणनीति.कार्यक्रम नहीं है जो दुनियाभर के लिए बन जाय और हम उस रास्ते क्रान्ति तक पहुँच जाएँ। बल्कि प्रत्येक देश.क्षेत्र आदि के लिए वस्तुगत परिस्थितियों के अनुसार सृजनात्मक संघर्षों और नये सिरे से पार्टी बिल्डिंग का लाभ हाथ में लेकर ही हम महान सर्वहारा की सेवा कर सकते हैं जो हमारा ऐतिहासिक कार्यभार है। जरूरी नहीं और कत्तई जरूरी नहीं कि हमारा रास्ता रूसए चीनए क्यूबा का रास्ता होगा या है। हमें अपने लिए नये औजारों की तलाश करनी होगी और उसे सृजनात्मक तरीके से लागू करना होगा। कई सारी पुरानी अवस्थितियों का निर्मम मूल्यांकन करना होगा। आत्मावलोकन के पीड़ादायी दौर से गुजरना होगा।ष्ष् निचली कतारों तक मार्क्सवाद और क्रान्ति के दर्शन को पहुँचाना होगा। ऊपर से नीचे नहीं बल्कि नीचे से ऊपर की तरफ अनुभव संगत ज्ञान का अलग.अलग क्षेत्रों के अनुसार सूत्रीकरण करना होगा जिससे नये नेतृत्व का विकास.अवकाश सम्भ्व हो सकेगा।
    सबसे पहले वस्तुगत परिस्थितियों का विश्लेषण जरूरी है। अपने पुराने सूत्रीकरण पर विचार करने की जरूरत है। जरूरत तो विचारधारा स्तर पर स्टालिन.माओ के वैचारिकी को भी समझने की हैए खासकर खुश्चेव.माओं त्सेतुंग के बीच की बहस को। लेकिन वह ऐसा क्षेत्र है जहाँ भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन के बहुत सारे विभाजक.विवाद मौजूद हैं जबकि आज जरूरत एकता तथा संयुक्त मोर्चा बनाने की है। ऐसे में इन वैचारिक अवस्थितियों को थोड़ा विराम देकर बात की जानी चाहिए। मेरा आशय.विश्लेषण भारतीय समाज के ष्अर्द्धसामन्ती.अर्द्धऔपनिवेशिकष् स्वरूप के सूत्रीकरण से है। क्या भारतीय समाज में विगत 70 वर्षों में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यदि सन् 1990 के बाद उदारीकरण.बाजारीकरण ने पूँजी के पुराने वित्तीय लूट से अलग कारपोरेट विशाल बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के माध्यम से आरम्भ हुआ है। पूँजी का प्रभाव मात्र स्वदेशी.विदेशी के शास्त्रीय रूप में नहीं बल्कि विचलन और आवारा पूँजी के रूप में बदल जाने से हैं। उपनिवेशवाद अपना रूप.चेहरा खो चुका है और उसकी जगह पर भयावह शोषण का नंगा रूप आज नमूदार है। लूट के वितरण में नये पुराने सारे नियम और कम्पनियों का एक विशाल सहकार बना है और यह बहुत ही अमूर्त होने के बावजूद अलग.अलग क्षेत्रों में श्रम की लूट को ऐड्रेस करते समय इसे ध्यान में रखकर प्रभावशाली परिणाम निष्कर्ष हम प्राप्त कर सकते हैं।
    इसी प्रकार ग्रामीण तथा खेतिहार क्षेत्र की समस्याएँ हैं जो अधिकतर पूँजी के भयानक रूपोंए कारपोरेट लूट से जुड़ी हैं। बैंकए बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँए अर्थात पूरी तरह वित्तीय और कारपोरेट लूट का हमला पुराने सामन्ती स्वरूप से भिन्न है। क्योंकि यह पूर्व स्थितियों में एक वर्गीय संरचना मौजूद थी लेकिन वर्ग शत्रु अभूत हैं और ज्यादातर शोषित हैं। जिन्हें हमें अपने पहले की भाषा में भूस्वामी और सामन्त कहते रहे हैं ज्यादातर आत्महत्या करने वालों की जमात इसी में से आती है। एक अजीब सा पसमन्जर जिसे सूत्रीकरण करना अपने पुराने रूपों में अब सम्भव नहीं है इसलिए हमें जनता को ऐड्रेस करने के लिए नये सूत्रोंए नारां की आवश्यकता होगी।
    मेरा इस सन्दर्भ में निवेदन है कि वस्तुगत यथार्थ का विस्तृत निवेदन-विश्लेषण की जरूरत है। खासकर अपने पुराने सूत्रीकरण को नये सिरे से मार्क्सवाद की रौशनी में जांचने परखने की आवश्यकता है। खासकर वर्तमान पूँजीवाद की स्थितियों को जो सामन्ती-मूल्यों से गठजोड़ कर फासिज्म का रूप अख्तियार किये हैं। इतिहास के तमाम विकास क्रम को आज उसने उल्टी गति में डाल दिया है या डालने के प्रयास में संलग्न है। नये नवजागरण और नये प्रवोधन की जरूरत आज खड़ी हो गई है।
    आत्मगत शक्तियों की तैयारी की सबसे बड़ी समस्या नई पीढ़ी को मार्क्सवाद-लेनिन वाद से परिचित कराना है। आज एक तरफ युवा पीढ़ी अराजकता का शिकार है तो दूसरी तरफ रोज-रोज के संघर्षों ने शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति की वैचारिकों के प्रति आकर्षण भी पैदा किया है। धीरे.धीरे थोड़े से ही सही लेकिन युवा नेतृत्व पैदा हुआ है। उसमें चमक है और आकर्षण भी है जिसके द्वारा हम युवा पीढ़ी को अपनी विरासत अपनी कुर्बानियों संघर्षों के इतिहास से परिचित करा सकते हैं।
    मीडिया के वैकल्पिक रूपों का विकास आज हमारी सर्वाधिक जरूरत है जिसमें नियमित रूप से वैचारिक तथा सृजनात्मक लेखन द्वारा हम आम जनता को तथा पार्टी कतारों को शिक्षित प्रशिक्षित कर सकते हैं।
    यह आत्मावलोकन.आत्मालोचन का भी समय है। इस दिशा में ईमानदार कोशिश हमें नया जीवन प्रदान करेगी। प्रेमचन्द्र के ष्रंग भूमि में सूरदास मि0 जॉन से हारने के बाद कहता है। जानते हो हम क्यों हारें हमें ठीक से खेलना नहीं आता। सबसे बड़ी बात कि हममें एका नहीं है। हम सीखेंगे और एका करेंगे। फिर एक दिन तुम्हें हरा देंगे।यह विश्वास कि षएका करेंगे और सीखेंगे। आज का हमारा केन्द्रीय नारा होना है।
 
- राजेश मल्ल
मो. 9919218089
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

यह सपना अधूरा है अब तक पूँजीवादी व्यवस्था का खात्मा चाहते थे कार्ल मार्क्स

यह सपना अधूरा है अब तक पूँजीवादी व्यवस्था का खात्मा चाहते थे कार्ल मार्क्स

कार्ल मार्क्स का नाम आते ही एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि उभरती है, जिसने पूरी दुनिया को वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन दिया। 5 मई सन 1818 को कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी के एक यहूदी परिवार में हुआ था। इनके परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था लेकिन जब कार्ल मार्क्स बड़े हुए तब उन्होंने ईसाई धर्म को त्याग कर नास्तिकता की राह अपनाई और पूरे जीवन भर अपने अर्थशास्त्रीय ज्ञान के आधार पर समाजवाद की स्थापना में लगे रहे। उनका आर्थिक-राजनैतिक चिंतन आज भी महत्वपूर्ण है और दुनिया भर के मजदूरों को एकजुट करने का उनका सपना पूरी मानवता के लिए महत्व रखता है। मार्क्स के जीवन को हम देखें, तो आश्चर्य होता है कि पूरी दुनिया में पूँजीवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले ऐसे दार्शनिक को घनघोर आर्थिक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। 14 मार्च 1883 को लंदन में कार्ल मार्क्स का निधन हुआ।
    कार्ल मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ जैसी कालजयी कृति की रचना की। कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र भी कार्ल मार्क्स ने तैयार किया था। इस घोषणा पत्र को साम्यवादी घोषणा पत्र के रूप में याद किया जाता है, जिसमें पूँजीवादी विसंगतियों के बारे में बताते हुए सर्वहारा लोगों की सत्ता कैसे स्थापित हो, इस पर गंभीर विमर्श किया गया है। कार्ल मार्क्स ने यह घोषणा पत्र फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ तैयार किया था। 1848 में पहली बार यह घोषणा पत्र जर्मन भाषा में ही तैयार हुआ। बाद में तो दुनिया के अनेक देशों की भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। मार्क्स का चिंतन आज भी पूरी दुनिया में संघर्षशील बिरादरी को लगातार हौसला प्रदान करता है। समतावादी समाज की रचना की दिशा में मार्क्स का घोषणा पत्र काबिलेगौर है। दुर्भाग्य है कि ऐसे समय में जबकि साम्यवाद पूरी दुनिया का आधार बन सकता था, तब उसकी जगह पूँजीवादी व्यवस्था ने ले ली है। यही कारण है कि पूँजीवादी व्यवस्था ने संघर्षशील मनुष्य के दमन की परिपाटी शुरू कर दी है तथा वर्ग संघर्ष की स्थिति निरंतर बनी हुई है। गरीब और गरीब होता जा रहा है, पूँजीपति और अधिकतम सम्पन्न बनता जा रहा है। विषमता की खाई बढ़ रही है और समाज में विद्वेष भी फैलता जा रहा है। जिसके कारण हिंसा भी बढ़ी है। ऐसी विषम स्थिति के बीच जब हम कार्ल मार्क्स के चिंतन को देखते हैं तो समझ में आता है कि दुनिया को इसी रास्ते से आगे बढ़ना था, लेकिन हर महान सपना बहुत जल्दी तार-तार हो जाता है। वैज्ञानिक समाजवाद भी
धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया।
    मार्क्स ने अपने घोषणा पत्र में यही चिंता व्यक्त की थी कि पूरी दुनिया में एक तरफ पूँजीवाद बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ सर्वहारा की समस्या भी बढ़ती जा रही है। दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति है। एक मालिक है और दूसरा श्रमिक है। श्रमिक जीवन भर श्रमिक ही बना रहता है। वह अपनी तरक्की नहीं कर पाता।  और दूसरी तरफ मालिक दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है। यही कारण है कि दोनों के बीच निरंतर संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। कोई भी सत्ता जब बड़े पूँजीवादियों के हाथों में चली जाती है तो समाज के छोटे-छोटे लोग प्रभावित होते हैं। ये छोटे दुकानदार भी हो सकते हैं। कास्तकार हो सकते हैं। किसान हो सकते हैं, मजदूर हो सकते हैं। ये सब अंततः शोषित पीड़ित वर्ग में शरीक हो जाते हैं। मार्क्स मजदूर संगठनों पर विशेष जोर देते हैं और उनकी एकता के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं। इस घोषणा पत्र के बाद सर्वहारा वर्ग में वैश्विक स्तर पर एक चेतना आई और लोग अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए। यही कारण है कि 1871 मैं पेरिस में संघर्ष हुआ। 70 दिनों तक मजदूरों ने सत्ता पर अपना एकाधिकार जमाए रखा। तब मार्क्स ने एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि सत्ता पर काबिज होकर ही हम अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते। सत्ता में सुधार कैसे लाया जाए, इस दिशा में चिंतन करना चाहिए। मार्क्स के दर्शन से प्रभावित होकर रूस में 1917 में मजदूर आंदोलन ने क्रांति का रुप ले लिया और उसका साम्यवादी चेहरा उभर कर पूरी दुनिया के सामने आया, लेकिन कहीं-न-कहीं आंतरिक विफलताओं और सामंजस्य के अभाव के कारण साम्यवादी  स्वप्न तार-तार हो गया। ऐसा किसलिए हुआ, इस पर आज भी मिल-जुलकर के विचार करने की जरूरत है। समाज में पूँजीवादी व्यवस्था खत्म हो, यही मार्क्स के घोषणापत्र का पवित्र लक्ष्य था। लेकिन हम देख रहे हैं इस दिशा में बहुत संतोषजनक प्रगति नहीं हो रही है और अब तो पूरी दुनिया जैसे पूँजीवादी बाजार के खूनी पंजे में ही कैद होकर रह गई है। ऐसे समय में एक बार फिर नए सिरे से मार्क्स को पढ़ने, समझने और समझाने की जरूरत है।                
 -गिरीश पंकज
मोबाइल : 09425212720
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

फ्रेड्रिक एंजिल्स

“अपने दोस्त कार्ल मार्क्स के बाद फ्रेड्रिक एंजिल्स पूरी सभ्य दुनिया में आधुनिक सर्वहारा में सबसे बड़े विद्वान और अध्यापक थे”। ऐसा कहना था आधुनिक युग के एक अन्य महापुरूष और महान क्रान्तिकारी व्लादिमीर लेनिन का। मार्क्स और एंजिल्स ने ही सबसे पहले समाजवाद की व्याख्या की और बताया कि यह कोई सपना नहीं बल्कि आधुनिक समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास का अंतिम लक्ष्य और आवश्यक परिणाम है। ऐसे महान क्रान्तिकारी और समाजवादी दार्शनिक फ्रेड्रिक एंजिल्स का जन्म 28 नवम्बर 1820 में जर्मनी के रहाइन प्रान्त में बारेन नामक स्थान पर एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के मालिक के घर में हुआ। एंजिल्स का परिवार ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट पंथ को मानने वाला था। ऐसे में अपने क्रान्तिकारी विचारों के चलते उनके रिश्ते घर से बहुत अच्छे नहीं थे। उनके पिता चाहते थे कि वे अपने पैतृक कारोबार को आगे बढ़ाएँ, इसीलिए उन्हें 18 साल की आयु में व्यापरिक अनुभव प्राप्त करने के लिए ब्रेमेन भेज दिया। ब्रेमेन में 30 साल के प्रवास के दौरान उदारवादी और क्रान्तिकारी कामों में उनकी रुचि बढ़ती गई। कई छोटे वामपंथी विचारकों ने उन्हें आकर्षित किया लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुए और हेजेल के दर्शन को अपना लिया। ईसाइयत के खिलाफ आक्रमक रुख ने एंजिल्स को अज्ञेयवादी से नास्तिक बना दिया लेकिन उनके क्रान्तिकारी संकल्प अभी किसी भी दिशा में जा सकते थे। 1842 में वह मोसेस हेस से मिले जिन्होंने उन्हें कम्युनिस्ट बना दिया। उन्होंने एंजिल्स को बताया कि हेलेजियन दर्शन का तार्किक नतीजा साम्यवाद है। एंजिल्स को कविता लिखने का शौक था और अब तक पत्रकारिता के मैदान में भी उन्होंने अपनी पहचान बना ली थी, हालाँकि उनके लेख फ्रेड्रिक ओसवाल्ड के छद्म नाम से कई जर्नलों और अखबारों में छपते थे। उनका मार्क्स से परिचय भी उनके लेखों के माध्यम से ही हुआ। मार्क्स से मुलाकात करने के मकसद से वे दस दिन के लिए पेरिस गए। उसके बाद दोनों क्रांतिकारी यात्रा में 1983 में मार्क्स की मृत्यु तक साथ रहे। अपने इंग्लैंड में प्रवास के दौरान वहाँ की चमक दमक वाली औद्योगिक क्रांति के पीछे अंधकार में डूबी मजदूरों की दुर्दशा पर ‘द कंडीशन आफ वर्किंग क्लास इन इंगलैंड’ नाम से शोध कार्य प्रकाशित किया। एंजिल्स ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मार्क्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और द होली फैमिली लिखा तो वहीं दास कैपिटल के दूसरे और तीसरे भाग का संपादन भी किया। उन्होंने द ओरिजिन आफ द फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एंड द स्टेट, आउटकम आफ क्लासिकल जर्मन फिलासफी जैसी मशहूर किताबें लिखीं।     
       
 -मसीहुद्दीन संजरी
मो0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

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