Wednesday 23 December 2009

स्मरण कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज

भारत का राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम अपने अन्दर प्रवाहित अनेकानेक विरोधी धाराओं को समेटे और उनकी प्रहार क्षमताओं को एक साथ जोड़े एक महानद के विराट स्वरूप में तूफानी गति से आगे बढ़ा था। इस समन्वित शक्तिशाली राष्ट्रीय संघर्ष ने देश में दो सौ साल से अपनी गहरी जड़े जमाये ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ कर सात समुन्दर पार फेंक दिया था। इस राष्ट्रीय आन्दोलन के ही गर्भ में पनपी, पली और बढ़ी एक धारा थी - कम्युनिस्ट आन्दोलन की मानवतावादी धारा जिसका अपना विशिष्ट महत्व है और जिसे समझे बिना भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के सारतत्व को सही अर्थों में समझा नहीं जा सकता।
भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन ने राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए और फिर इस स्वाधीनता को गरीबों के झोंपडों तक पहुंचाने के लक्ष्य के लिये अपना सर्वस्व होम कर देने वाली ऐसी अनेक विभूतियां पैदा की हैं जिन पर संसार की कोई भी कौम गर्व कर सकती है। ऐसी ही अमर विभूतियों में थे - कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज उत्तर भारत में - खासतौर पर उत्तर प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जन्मदाताओं और संस्थापकों में से एक प्रमुख हस्ती थे। वे अल्प आयु में ही पार्टी की केन्द्रीय कमेटी और इसक पोलिट ब्यूरो के सदस्य बन कर शीर्ष नेतृत्व के बीच उभरे और गहन माक्र्सवादी अध्ययन, जनता के बीच सघन कार्य तथा जन संघर्षों की आग में तप कर कुन्दन बने। अपने क्रान्तिकारी व्यक्तित्व से उन्होंने सम-सामयिक राजनीति को न केवल गहराई से प्रभावित किया वरन उसे एक निश्चित दिशा देने में भी समर्थ हुये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास, उसकी इमारत की एक-एक ईंट कामरेड भारद्वाज के बलिदानी जीवन, उनकी विद्वता, गहन चिन्तन-मनन तथा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर चले घनघोर जन संघर्षों में उनके जनूनी जुझारूपन की गवाह है।
मेरठ षडयंत्र केस में जब भारत के मजदूर नेता चुन-चुन कर जेलों में बन्द कर दिये गये थे, तो जिन तीन-चार तरूणों ने भारत में मजदूर किसान पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) के काम को जारी रखा और उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुत काम किया, उनमें कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का नाम सबसे पहले आता है।
कामरेड भारद्वाज का जन्म मेरठ जिले की बागपत तहसील के बूड़पुर गांव में दिसम्बर 1908 में हुआ था। उनके पिता पं. रामानन्द शर्मा संस्कृत के अच्छे पण्डित थे लेकिन उन्होंने यजमानी या पंडिताई को अपने जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनाना चाहा। वैसे इस गांव के अधिकांश ब्राम्हण परिवार यजमानी के धंधे से ही अपनी जीविका चलाते थे। उन्होंने महाजनी और अनाज की खरीद-फरोख्त के कारोबार को अपना कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। आर्य समाजी आन्दोलन के प्रसार में अपने गांव से शर्मा जी पहले आर्य समाजी बने और इसके लिए बहुत काम भी किया। तत्कालीन आर्य समाज आन्दोलन और इसमें पिता द्वारा निभाई गई भूमिका का निश्चित ही कामरेड भारद्वाज के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था।
कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज की आरंभिक शिक्षा अपने गांव और पड़ोसी गांवों के स्कूलों में ही हुई थी। बाद में बड़ौत के हाई स्कूल में पढ़ते हुए वे घनघोर आर्य समाजी और फिर राष्ट्रीय आन्दोलन के जनूनी सिपाही बन गये। उस दौरान उन्होंने गांधी जी के अनशन पर तथा तिलक की गिरफ्तारी पर अपने स्कूल में हड़तालों का नेतृत्व किया। यह समय और उनका स्कूली जीवन राजनीति में प्रवेश और इसके लिए अपने को तैयार करने हेतु एक महत्वपूर्ण पाठशाला बन गया था।
असहयोग आन्दोलन के भरपूर प्रभाव के कारण पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया था। बगैर पैसे के वे चालीस मील पैदल चलकर अपने साथियों के साथ दिल्ली भाग गये और गांधी जी के आदेश के अनुसार चर्खा चलाना शुरू कर दिया। बाद में रोहतक के राष्ट्रीय स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने वहां दो साल की पढ़ाई एक साल में ही पूरी की और मैट्रिक की परीक्षा पास की। अब आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर के कौमी विद्यालय में दाखिल हो गये। वहीं पर यशपाल, मोहन लाल गौतम और हरनाम दास (भदन्त आनन्द कौसल्यायन) से सहपाठी के रूप में उनका परिचय हुआ।
1924 की जनवरी में कामरेड भारद्वाज 16 वर्ष की आयु में बनारस जाकर वहां के सेण्टल हाई स्कूल में दाखिल हुए। यहां भी दो वर्ष की पढ़ाई एक वर्ष में पूरी कर यहां की मैट्रिक परीक्षा पास की। इस दौरान स्कूली पढ़ाई के साथ वे राष्ट्रीय आन्दोलन से भी गहरा सम्बंध बनाये रखे। साथ ही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं और प्रेम चन्द्र की कहानियों की नियमित पढ़ाई से उनमें गहरी साहित्यिक अभिरूचि जाग्रत हुई। उन दिनों वे कांग्रेस के अनन्य भक्त थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश ले कर वे इतिहास, अर्थशास्त्र और तर्क शास्त्र गहरी दिलचस्पी के साथ पढ़ने लगे। उन्होंने इस दौरान अर्थशास्त्र पर तो अनेकानेक बाहरी पुस्तकें भी गहराई के साथ पढ़ डालीं। वे घोर राष्ट्रवादी युवक थे, इसलिए 1926 में कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के लिये स्वयंसेवक बन कर गये थे। उन्हीं दिनों कामरेड भारद्वाज ने रूसी क्रान्ति के बारे में चर्चा सुनी थी जिससे वे उसके प्रति आकर्षित हुए थे।
बनारस से इंटर पास करने के बाद वे प्रयाग विश्वविद्यालय में दाखिल हुये और यहां भी अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र विषय थे। यहां छात्र जीवन के दौरान कामरेड भारद्वाज स्वराजी देश भक्त से विकास कर धीरे-धीरे अपने अनुभव और सम्पर्क सूत्रों के सहारे कट्टर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन गये। यहां पर छात्र संघ की एकसभा में उन्होंने कामरेड पूरन चन्द्र जोशी का विद्वतापूर्ण और प्रेरणाप्रद भाषण सुना और उनके गहरे सम्पर्क में आकर धीरे-धीरे राजनैतिक कार्यों में उनके दाहिने हाथ बन गये। ज्ञातव्य हो कि कामरेड पूरन चन्द्र जोशी बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और भारतीय राजनीति में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कामरेड जोशी का जन्म शताब्दी वर्ष इस समय चल रहा है। इलाहाबाद में छात्र के रूप में ही कामरेड भारद्वाज ने माक्र्स की ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रान्ति’ तथा ‘साम्राज्यवाद’ आदि पुस्तकों का अध्ययन किया। वह प्रयाग तरूण संघ के सचिव भी थे जबकि पं. जवाहर लाल नेहरू उसके अध्यक्ष थे।
कामरेड भारद्वाज के गंभीर अध्ययन ने जहां राजनीति में उन्हें कम्युनिज्म पर पहुंचाया वही धर्म और ईश्वर के फन्दे से छुड़ा कर एकदम कट्टर अनीश्वरवादी बना डाला। उन्होंने अब बी.ए. पास कर लिया था। इसी साल मार्च में कामरेड पूरन चन्द्र जोशी मेरठ षडयंत्र केस में गिरफ्तार कर लिये गये।
मेरठ षडयंत्र केस में बड़े पैमाने पर मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कामरेड भारद्वाज के ऊपर राजनैतिक कार्यों का अकेले ही सारा बोझ आ पड़ा। उन्हें माक्र्सवाद पर क्लास लेने के लिए प्रयाग से बाहर भी जाना पड़ता। जब वे एम.ए. में राजनीति शास्त्र पढ़ रहे थे। साथ ही घर वालों के जोर देने के कारण कानून की पढ़ाई भी मजबूरन पढ़ रहे थे। 1930-31 का समय कामरेड भारद्वाज के लिए माक्र्सवाद का गहन अध्ययन का समय था। राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए यह उथल पुथल का समय था जब एक ओर लाहौर षडयंत्र केस तथा असेम्बली बम केस मके अभियुक्त के रूप में जेल में बन्द सरदार भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव की फांसी ने सम्पूर्ण देश के युवा रक्त में उबाल पैदा कर दिया था तो उधर दूसरी ओर गांधी जी द्वारा छेड़े गये आन्दोलन ग्रामीण अंचल की किसान मजदूर जनता को भी राजनीति में आने के लिए प्रेरणा प्रदान कर रहे थे। देश के राजनैतिक घटनाक्रम का यह तूफान भी कामरेड भारद्वाज को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहा था। 1931 में एम.ए. उत्तीर्ण कर उन्होंने विश्वविद्यालय में दूसरा नम्बर पाया था। कानून का पहला वर्ष पास करके ही उन्हें इसकी पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी। उस समय पैदा हो गये घरेलू और राजनैतिक हालात का यही तकाजा था।
जेल में बन्द साथियों से मिलकर उनके परामर्श और निर्देश के आधार पर कामरेड ेभारद्वाज परीक्षाफल आते ही 23 वर्ष की आयु में बम्बई में मजदूरों के बीच काम करने के लिए चले गये। वहां पर उन्होंने कामरेड गंगाधर अधिकारी, का. सरदेसाई तथा का. बी.टी.रणदिवे के साथ काम करना शुरू किया।
बम्बई में कामरेड भारद्वाज ने रेलवे मजदूरों की यूनियन कपड़ा मिल मजदूरों की गिरनी कामगार यूनियन और तरूण कामगार लीग को अपना कार्य क्षेत्र बना कर सघन कार्य किया। वे विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों में व्याख्यान देते और उनका क्लास लेते तथा कामरेड सरदेसाई के साथ मिल कर रेलवे मजदूरों के लिए हिन्दी व अंग्रेजी में दो अखबार निकालते। इसी साल गिरनी कामगारों के एक जुलूस का नेतृत्व करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर तीन माह की सजा दी यी। वे रेलवे मजदूरों में अपने सघन कार्य की वजह से बीबीसीआई (बम्बई से अजमेर) के मजदूरों की यूनियन के महामंत्री चुन लिये गये। 1934 में बम्बई में हुई कपड़ा मिल मजदूर कांफ्रेंस के अन्दर मालिकों के जुल्म के खिलाफ मजदूर हड़ताल का निर्णय लिया गया। कामरेड भारद्वाज की हड़ताल की तैयार के लिये बम्बई और अहमदाबाद में भी भारी परिश्रम करना पड़ा। इसी तैयारी के लिये अजमेर जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वहां के रेलवे वर्कशाॅप में उसी समय हड़ताल हो गयी थी। कामरेड भारद्वाज को छः सप्ताह की सजा देकर जेल में डाल दिया गया। इसी बीच अहमदाबाद के वारंट पर उन्हें दो साल की सजा हुई और वह पूरा जेल जीवन साबरमती और हैदराबाद (सिंध) की जेलों में सी क्लास के अन्दर बिताना पड़ा।
सन 1936 के अप्रैल महीने में वे जेल से छूटे तो उततर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में लेकर प्रयाग में जाकर छोड़ा। इससे पहले ही भारद्वाज के जेल में रहते ही नागपुर में सम्पन्न पार्टी की केन्द्रीय समिति की बैठक में उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति और पोलिट ब्यूरो का सदस्य चुन लिया गया था।
प्रयाग आने पर कामरेड भारद्वाज की कामरेड पूरन चन्द्र जोशी से भेट हुई थी। उन दिनों पार्टी का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ पहुंच गया था। कामरेड भारद्वाज को अब लखनऊ को केन्द्र बना कर काम करना था। पार्टी के गैर कानूनी होने के कारण साथियों को अधिकतर फरारी की हालत में ही काम करना पड़ता था। पार्टी के निर्णय से कामरेड भारद्वाज कानपुर के मजदूरों में काम करने के लिये गये और वहां सालों रह कर भरपूर शक्ति से काम किया।
फरारी की हालत में ही वे पार्टी के काम से लाहौर गये। वहां के लाजपतराय भवन में जब वे मीटिंग कर रहे थे, तभी अचानक पुलिस ने हाल को चारों तरफ से घेर लिया। आस-पास के सभी घर पुलिस के घेरे में थे फिर भी कामरेड भारद्वाज पकड़ में नहीं आये, खिड़की से कूद कर एक के बाद दूसरे घरों में छलांग लगाते हुये पुलिस की आंखों में धूल झोक कर गायब हो गये। दूसरे दिन फिर से उसी हाल में उन्होंने सफलतापूर्वक मीटिंग की जिसकी पुलिस को भनक भी न लग सकी।
फैजपुर कांग्रेस में भी वे फरारी की हालत में ही गये थे। 1942 में रामगढ़ कांग्रेस में भी वे पहुंचे थे। कामरेड भारद्वाज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में कम्युनिस्ट साथियों के पथ प्रदर्शन का दायित्व निभा रहे थे। रामगढ़ कांग्रेस की विषय निर्वाचनी समिति में उन्होंने प्रस्तावित दस्तावेज पर अपना संशोधन भेजा था। निश्चित समय पर गुप्त रूप से चादर ओढ़े वे मंच पर गये थे और संशोधन पेश कर उस पर जम कर बोले थे। पुलिस की भरपूर चैकसी और नाकेबंदी को धता बता कर कामरेड भारद्वाज भाषण के बाद नौ दो ग्यारह हो गये थे। पुलिस उन्हें खोजती ही रह गई थी किन्तु उसके हाथ कुछ भी न लगा था।
सन 1931 की बात है। पूना की एक सभा में कामरेड भारद्वाज बोलना चाहते थे परन्तु सभापति उन्हें इजाजत देने को तैयार न थे क्योंकि वे अपने सीने पर हंसिया और हथोड़ा का बैज लगाये हुये थे। जनता उन्हें सुनने को तत्पर थी। यह भांप कर वे अचानक जबरन मंच पर चढ़कर अध्यक्षत की इजाजत के बगैर धुआंधार भाषण करने लगे थे। तालियों की गड़गड़ाहट में भयभीत होकर सभापति मंच छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था। ऐसे थे क्रान्तिकारी और जुझारू तरूण कामरेड भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज एक सुन्दर वक्ता थे। 1930 में प्रयाग विश्वविद्यालय में भाषणकला में गोल्ड मेडल उन्हें ही मिला था। छात्र जीवन के दौरान भाषण प्रतियोगिताओं में उन्हें समय-समय पर अनेक पुरस्कार मिलते रहे थे। फरारी के जीवन में भाषण कला से तो काम चलता नहीं। उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता को माक्र्सवादी तरूणों की शिक्षा में बड़ी सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। वे बहुत ही अच्छे पार्टी शिक्षक थे। उनकी इस क्षमता का उपयोग देवली जेल में नजरबंद साथियों ने भली प्रकार किया था।
उनके अन्दर मात्र सैद्धान्तिक विश्वलेषण की गहरी क्षमता ही नहीं थी वरन वे साथ ही साथ व्यवहारिक विश्लेषण में भी पारंगत थे। कानपुर का मजदूर आन्दोलन उस समय में इतना शक्तिशाली बना था उसमें यदि कामरेड मौलाना संत सिंह यूसुफ के काम और परिश्रम का बड़ा हाथ था तो कामरेड भारद्वाज की बुद्धि का भी इसमें सबसे ज्यादा योगदान था।
रामगढ़ कांग्रेस में पुलिस की चकमा देकर फरार होने के बाद पुलिस करीब सवा लाल के बाद जनवरी 1941 में ही उन्हें गिरफ्तार कर सकी। कानपुर, आगरा आदि की जेलों में कुछ समय उन्हें रखने के बाद उन्हे देवली कैम्प जेल में भेज दिया गया था। दिन रात बरसों तक पार्टी कार्यों से जूझते रहने और फरारी जीवन और जेल की कठिनाईयों के उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था फिर भी पार्टी कार्य और संगठन निर्माण को दृष्टि में रखकर जेल में साथियों का पार्टी क्लास लेना उनकी जिम्मेदारी थी। बीमारी के दौरान भी वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे।
जेल के बन्दियों के कष्टों और परेशानियों के खिलाफ देवली कैम्प जेल में जो संघर्ष भूख हड़ताल के रूप में चलाया गया था, उसके नेतृत्व का भार कामरेड भारद्वाज के ऊपर ही था। कम्युनिस्ट पार्टी के कानूनी करार दे दिये जाने के बाद जब काफी बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट जेलों से रिहा कर दिये गये तब भी कामरेड भारद्वाज को नहीं छोड़ागया। डाक्टरों की इस घोषणा के बाद भी कि उन पर टी.बी. का भारी आक्रमण है, उन्हें सुल्तानपुर जेल में ले जाकर बन्द कर दिया गया। कुछ समय बाद यह समझ कर कि वे अब मौत के मुंह में जा रहे है, केवल तभी, बेबसी में 24 जनवरी 1943 को उन्हें जेल से रिहा किया गया।
कामरेड भारद्वाज जेल से बाहर तो आ गये थे किन्तु टी.बी. की गंभीर बीमारी उन्हें मौत के मुंह में ढकेलने के लिए अमादा थी। पार्टी के लिये उनका जीवन अमूल्य था। उन्हें कुछ समय के बाद ही भुवाली सेनीटोरियम में भेज दिया गया। वहां रह कर उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार तो हुआ किन्तु मौत का खतरा निरन्तर उनका पीछा करता रहा। फिर भी वे अपनी रही सही क्षमता और शक्ति पार्टी कार्य तथा जनता के आन्दोलनों को समर्पित करते रहे। इसी स्थिति में उनके अगले पांच साल बीमारी के दौरान भी आंधी तूफानों के बीच गुजरे।
उत्तर प्रदेश में उन दिनों इसके विभिन्न स्थानों को केन्द्र बना कर अनेक कम्युनिस्ट नेताओं के अलग-अलग ग्रुप काम कर रहे थे। प्रांतीय स्तर का कोई सांगठनिक ढांचा बनना अभी शेष था। यह स्थिति 1933 से 1937 तक चलती रही। इस दौरान इन अलग-अलग ग्रुपों के कामों में समन्वय स्थापित कर पार्टी के केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में कामरेड भारद्वाज इनका नेतृत्व और पथ प्रदर्शन करते रहे थे। उन्होंने कामरेड पी.सी.जोशी ओर कामरेड अजय घोष आदि के साथ मिल कर सन 1938 में पार्टी का एक राज्य स्तरीय सम्मेलन गुप्त रूप से लखनऊ में करया और पहली बार एक प्रांतीय कमेटी का निर्माण किया जिसके प्रांतीय मंत्री कामरेड अर्जुन अरोड़ा बनाये गये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण की प्रारम्भिक प्रक्रिया और इसका इतिहास कामरेड भारद्वाज की अप्रतिम कुरबानियों की लाल स्याही से लिखा गया है। वे ही इसके संस्थापक और निर्माता थे।
देश को राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त हो जाने और केन्द्र एवं राज्यों में कांग्रेस सरकारें बन जाने के बाद भी कामरेड भारद्वाज के संघर्षमय जीवन में कोई फर्क नहीं आया। मजदूरों-किसानों के संघर्षों और सरकारी दमन चक्र ने उनका दामन नहीं छोड़ा। 4 अप्रैल 1948 को 104 डिग्री बुखार की हालत में गिरफ्तार कर उन्हें देहरादून की जेल में डाल दिया गया जहां चार दिन के बाद ही 8 अप्रैल 1948 को उनका दुःखद निधन हो गया।
इस प्रकार चालीस वर्ष से भी कम आयु में ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता की हैसियत में राष्ट्रीय स्वाधीनता एवं समाजवाद के संघर्ष में जनता का नेतृत्व करते हुए अनुकरणीय बलिदान की मिसाल बन कर हमारे बीच से चले गये। वे शहीद हो गये।
देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर आन्दोलन के निर्माण तथा विकास पर सरसरी नजर डालने पर भी - खास तौर पर उत्तर प्रदेश में कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का माक्र्सीय बौद्विकता और क्रान्तिकारी कार्यकलाप से तराश गया गंभीर तथा मुस्कराता हुआ मोहक चेहरा हमारी स्मृतियों के बीच प्रेरक झांकी के रूप में उभर आता है।
कामरेड भारद्वाज की मौत पार्टी के लिए ऐसी शहादत है जो उसकी नींव पत्थर बनी हुई है।
(कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज के जीवन और कृतित्व से संबंधित तथ्य महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित ‘नये भारत के नये नेता’ नामक पुस्तक से साभार लिये गये हैं।)

(का. जगदीश नारायण त्रिपाठी)

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