Monday 23 April 2012

अनपढ़ तो छोड़िए पढ़े लिखों को और पढ़ाने की जरूरत : काटजू

अनपढ़ तो छोड़िए पढ़े-लिखों को और पढ़ाने की जरूरत है, तब ही लोगों में वैज्ञानिक सोच विकसित होगी। केवल डिग्री हासिल कर लेने से ही कुछ नहीं होगा। जब तक वैज्ञानिक सोच नहीं होगी, तब तक देश गरीब रहेगा। अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे लोग ज्योतिष और बाबाओं में भरोसा करते हैं। मीडिया भी टीआरपी बढ़ाने के लिए वही सब दिखा रहा है। उसे तो समाज के मार्गदर्शक की भूमिका निभानी चाहिए। यह बात प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष व सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मरकडेय काटजू ने शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन में कही।

उन्होंने कहा कि यूरोप की तरह आधुनिक और विकसित बनना है तो हमें पिछड़े विचारों (जातिवाद, सांप्रदायिकता, भाई-भतीजावाद) को छोड़कर वैज्ञानिक सोच के साथ काम करना होगा। यूरोप के लोगोंे की जागरूकता और तरक्की का कारण वैज्ञानिक सोच है। इस सोच को विकसित करने में मीडिया की भूमिका भी अहम है। मीडिया का काम सिर्फ सूचना देना ही नहीं है बल्कि समाज को मार्गदर्शन देने का भी जिम्मा है। देश में प्रिंट मीडिया तो फिर भी अपनी भूमिका का सही निर्वहन कर रही है, लेकिन इलेक्ट्रोनिक मीडिया असल मुद्दों को छोड़कर ज्योतिष, बाबा और मनोरंजन कार्यक्रमों को ज्यादा तवज्जो दे रही है। देश की जनता का बौद्धिक स्तर कम है, उसे जो दिखाओगे वही देखेगी।

उन्होंने कहा कि पढ़े-लिखे लोग ही ज्योतिष और बाबाओं में ज्यादा आस्था रखते हैं। भारतीय समाज आज भी रूढ़िवादी विचारों में जकड़ा हुआ है। ज्ञान का स्तर कमजोर होने का ही नतीजा है कि चपरासी के एक पद के लिए ग्रेज्युएट और पोस्ट ग्रेज्युएट भी लाइन में लगे रहते हैं। यदि इनके ज्ञान का स्तर ऊंचा होता तो ऐसी नौबत नहीं आती। अपनी फील्ड में एक्सपर्ट लोगों को इस तरह की दिक्कतें नहीं आती हैं। पत्रकारों का बौद्धिक स्तर आम आदमी से ऊंचा होना चाहिए। तभी तो हम समाज को सही दिशा में ले जा पाएंगे। कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिक सेवा संस्थान के संस्थापक भूपेंद्र जैन भी उपस्थित थे।

न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार गहराया

श्री काटजू ने कहा कि न्यायपालिका में भी भ्रष्टाचार बढ़ गया है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि सभी जज भ्रष्ट हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के संबंध में अपनी चर्चित टिप्पणी ‘यहां कुछ सड़ांध आती है’ करते हुए मुझे खुशी नहीं हुई थी, बल्कि पीड़ा हुई थी। लेकिन मुझे जो सही लगा मैंने वही किया। श्री काटजू ने वर्तमान सीजेआई एचएस कपाड़िया को तो ईमानदार बताया लेकिन इससे पहले के सीजेआई के बारे में कहा की उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा।

वे चाहते हैं हम लड़ते रहें और देश कमजोर हो

भारत विविधताओं का देश है। यहां सभी धर्मो का समान आदर किया जाता है, यही हमारी एकता है। तमाम बड़ी ताकतें इस कोशिश में लगी हैं कि इस देश में हिन्दू-मुस्लिम आपस में लड़ते रहें, ताकि देश कमजोर होता रहे। हम आपस में लड़ते रहेंगे तो देश तरक्की कैसे करेगा? तरक्की के लिए जरूरी है धर्मनिरपेक्षता। यह बात प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मरकडेय काटजू ने शुक्रवार को चेंबर ऑफ कॉमर्स सभागार में धर्म निरपेक्षता क्यों जरूरी है, विषय पर बोलते हुए कही। आयोजन वरिष्ठ नागरिक सेवा संस्थान और रहनुमा वेलफेयर फाउंडेशन ने रखा था।

इतिहास के तमाम संदर्भो का हवाला देते हुए श्री काटजू ने कहा कि इस देश में 1857 से पहले सांप्रदायिकता की भावना इतनी नहीं थी, जितनी आज है। सांप्रदायिकता का जहर अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के कारण फैला, जिसका नतीजा 1947 में भारत विभाजन के रूप में सामने आया। सांप्रदायिकता की भावना हिन्दू में भी है और मुसलमान में भी, इसीलिए जब भी कहीं कोई बम विस्फोट होता है, झट से किसी मुस्लिम का नाम आ जाता है। ये हमारी विविधता को कमजोर करने की कोशिश भी है। उन्होंने आगाह किया कि अगर धर्म के नाम पर राज्य बनाए जाएंगे तो आप अपनी जड़ों से भी कटते जाएंगे। हमें यह भी समझना होगी कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ नास्तिक होना नहीं है।

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