Monday, 28 December 2009

लोग कराह रहे हैं पर महंगाई बढ़ती ही जा रही है

नयी दिल्लीः लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता गुरुदास दासगुप्त ने आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि पर हुई बहस में भाग लेते हुए कहाः मैं समझता हूं कि यह गंभीर बहस पटरी से नहीं उतरेगी। यह बात आर्थिक रूप से साबित नहीं हुई है और न ही यह दावा किया गया है कि उच्च वृद्धि से मुद्रास्फीति होती है। न तो सरकार ने कहा है और न ही आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि समर्थन मूल्य में वृद्धि से मुद्रास्फीति हुई है।
समावेशी विकास का अर्थ कीमत की उच्च लागत नहीं है। समावेशी विकास का अर्थ है विवेकसम्मत कीमत पर जनता को खाद्यान्न उपलब्ध कराना। मूल बात है कि क्यों कीमतें बढ़ रही हैं और सरकार को क्या करना चाहिए एवं सरकार ने क्या किया है। क्या इस बात से इन्कार किया जा सकता है कि हर सप्ताह कीमतें बढ़ती रही हैं।
हर सप्ताह कीमतों में वृद्धि की दर में बढ़ोत्तरी हो रही है। इसीलिए सरकार आज कटघरे में खड़ी है। यह राजनीति का सवाल नहीं है। यह एक समाज कल्याणकारी राज्य का सवाल है। लोगों को अवश्य ही जीवित रहने के लिए खाद्य सामग्री पाने की सुविधा होनी चाहिए। लोगों को अवश्य ही एक मकान चाहिए। लोगों को अवश्य ही एक विवेकसम्मत आय चाहिए। यह कल्याणकारी राज्य है। कांग्रेस प्रतिबद्ध है। इसीलिए सवाल है, क्यों सरकार कीमतों पर अंकुश लगाने में विफल रही है जो हाल की अवधि में एक महाविपदा हो गयी है। इसीलिए सवाल उठता है कि यह बड़ी आशंका है कि सरकार के पास उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की कोई इच्छाशक्ति ही नहीं है जो महंगाई के लिए जिम्मेदार हैं। इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर नहीं डालनी चाहिए कि यह उत्तर प्रदेश विधानसभा नहीं है, न ही यह बिहार विधानसभा है। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि कीमतें बढ़ रही हैं क्योंकि राज्य सरकार अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करने में विफल रही है।
दिल्ली, भारत की राजधानी के बारे में क्या है? हम दिल्ली में रहते हैं। दिल्ली में आलू 35 रुपये किलो बिक रहा है। केन्द्र सरकार यहां है। राज्य में भी उसी पार्टी की सरकार है। इसलिए हमें राज्य सरकारों के कामकाज के पीछे सरकार को अपनी अकर्मण्यता को नहीं छिपाना चाहिए। पूरे देश में, देश के हर हिस्से में कीमतें बढ़ रही हैं। इसके क्या कारण हैं? क्या इसीलिए क्योंकि 100 दिनों के रोजगार की मांग बढ़ रही है, क्योंकि आबादी में वृद्धि के कारण कीमतें बढ़ गयी हैं और कि अंतर्राष्ट्रीय कीमतों के कारण कीमतें बढ़ गयी है। हमें इस महान देश की बुनियादी मानवीय समस्याओं पर वास्तविक रूप से विचार करना चाहिए। हर व्यक्ति को इस दृष्टि से इस पर विचार करना चाहिए।
मेरी समझ है कि बुनियादी आर्थिक नीतियां महंगाई के लिए जिम्मेवार है। मेरी समझ है कि सट्टेबाजी अर्थव्यवस्था जिसे सरकार ने पिछले वर्षों में निर्मित किया है, इसके लिए जिम्मेवार है। मैं अमरीका में प्रधानमंत्री द्वारा दिये गये भाषण को पढ़ रहा था। वे सावधानीपूर्वक कार्पोरेट से कह रहे हैं- चिंता न करें उदारीकरण को आगे बढ़ाया जायगा। इसलिए आप आयें और भारत में निवेश करें। यह मूल प्रश्न है। बिना किसी देखरेख के बिना किसी सुरक्षा के उदारीकरण की अतिमात्रा ने देश में हर व्यक्ति को गलत संदेश दिया है कि आप जो कुछ भी चाहें कर सकते हैं क्योंकि सरकार उदारीकरण के लिए प्रतिबद्ध है और उदारीकरण का अर्थ है राज्य का अहस्तक्षेप यानी राज्य कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
यह सही है कि उत्पादन की कमी है। वित्तमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि देश में खाद्य उत्पादन में 20 प्रतिशत की कमी हो सकती है। लेकिन मुद्दा है कि कीमतों में वृद्धि उत्पादन में कमी के अनुरूप नहीं है। खाद्यान्न की कीमतों में वृद्धि खाद्यान्न उत्पादन में कमी के अनुपात में नहीं है। वह उससे काफी अधिक है। हमें तीर निशाने पर मारना चाहिए। इसलिए सवाल है कि मूल्यवृद्धि केवल मांग और आपूर्ति का बेमेल होना नहीं है। बुनियादी सुधारात्मक कदम उठाये बिना सरकार खाद्यान्न का अंधाधुंध आयात कर रही है। श्री शरद पवार जी, यह शर्म की बात है कि बीस वर्ष के बाद आप इस देश, भारत में चावल का आयात कर रहे हैं जो विश्व के चावल का कटोरा है, हरित क्रांति का स्थल है, श्री प्रताप सिंह कैरो का स्थल है, क्रांति का स्थल है जिसकी भारत ने बात की। यह एक राष्ट्रीय शर्म है कि भारत बीस वर्षों के बाद चावल का आयात कर रहा है। यह केवल सरकार के लिए नहीं बल्कि हम सबके लिए है जो इसका सामना कर रहे हैं।
हमने खाद्य सुरक्षा खो दी है। हम अपनी आर्थिक संप्रभुता खो देने के कगार पर है। मैं कोई अतिरंजित बयान नहीं दे रहा हूं। एक देश की आर्थिक संप्रभुता खाद्य में आत्म-निर्भरता पर निर्भर करती है। हम खाद्य में आत्मनिर्भरता खो रहे है तो यह आशंका भी है कि हमारी आर्थिक संप्रभुता भी अस्तव्यस्त हो सकती है। हमारी राजनीतिक संप्रभुता भी जोखिम में पड़ सकती है। आज विश्व में खाद्य में संप्रभुता किसी भी देश की राजनीतिक संप्रभुता की बुनियाद है।
महंगाई कोई पहेली नहीं है। हम चकरा देने वाली महंगाई पर बहस कर रहे हैं जो भारत के इतिहास में अभूतपूर्व है। हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना चाहिए। वास्तव में यह व्यापारियों का एक हमला है- यह एक अत्यंत उदारीकृत अर्थव्यवस्था में जहां सरकार की अकर्मण्यता, जगजाहिर हो चुकी है, भारतीय उपभोक्ताओं के खिलाफ व्यापारियों का एक हमला है। महंगाई कोई आज की परिघटना नहीं है। हमने पिछले अधिवेशन में भी इस पर चर्चा की थी। इसलिए महंगाई कोई आज की परिघटना नहीं है।
मैं आशा करता हूं कि सरकार बुरा नहीं मानेगी यदि मैं कहूं कि 2004 में जिस दिन से यूपीए सत्ता में आया, महंगाई एक संलक्षण हो गयी है। पिछले छह वर्षों में महंगाई लगातार बढ़ती रही है, इसलिए मैं समझता हूं कि बहस का विषय महंगाई नहीं है। बहसा का विषय सट्टेबाजी एवं जमाखोरी पर प्रशासनिक अंकुश लगाने में सरकार की अकर्मण्यता, उसकी असमर्थता, उसकी भयंकर विफलता है। मैं कहना चाहता हूं कि 65 प्रतिशत लोग कृषि पर निर्भर करते हैं। श्री शरद पवार हमेशा कहते है कि वे भी एक किसान हैं। पर उनके नेतृत्व में भी देश में कृषि में गिरावट को रोका नहीं जा सका है। किस गति से महंगाई बढ़ रही है। मैं आंकड़ों में नहीं जाना चाहता हूं। एक सप्ताह में, 7.11.2009 को समाप्त होने वाले सप्ताह में आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में 65 प्रतिशत वृद्धि हुई है। उसके पहले सप्ताह में वह वृद्धि 40 प्रतिशत थी। में तीन वस्तुओं चावल, गेहूं तथा आलू का उदाहरण देना चाहूंगा।
भारत 11 करोड़ टन चावल का उत्पादन करता है। अब कृषि मंत्री को इस बात की पुष्टि करनी है कि 10 करोड़ टन चावल का उत्पादन हो रहा है। यह हमारी आबादी को खिलाने के लिए पर्याप्त है। तो मूल्यवृद्धि क्यों हो रही है। एक खास किस्म का चावल कलम चावल 24 रु. प्रति किलो उपलब्ध था। आज वह 40 रु. प्रति किलो उपलब्ध है। यह कैसे हुआ? इससे चिन्ता उत्पन्न होती है। गेहूं के बारे में क्या है? शरद पवार कहते हैं कि 7.8 करोड़ टन गेहूं कर उत्पादन हुआ है। कितना उपभोग किया जाता है। 7.6 करोड़ टन। तो फिर क्यों गेहूं की कीमत प्रति किलो 6 से 8 रु. तक बढ. गयी।
मेरे मित्र जगदम्बिका बाबू बोले और चले गये। वे मांग और आपूर्ति के बीच असमानता की बात कह रहे थे। आप आलू को लें। यह प्रत्येक भारतीय के लिए महत्वपूर्ण सब्जी है। इसकी मूल्यवृद्धि कितनी हुई है? हाल की अवधि में 102.4 प्रतिशत वृद्धि हुई है। पिछले बहस में मैंने कहा था कि वह 6 रु. प्रतिकिलो से बढ़कर 20 रु. प्रति किलो हो गया। 300 प्रतिशत मूल्यवृद्धि हुई। आज फिर उसमें 100 प्रतिशत वृद्धि हुई है। यह दिखलाता है कि केवल उत्पादन में कभी इसका कारण नहीं है। वह बल्कि आपूर्ति में कमी, व्यापारियों द्वारा स्टाक को दबा रखने से इसकी कमी हुई है। वही इसके लिए जिम्मेदार है।
सरकार किसी व्यापारी, किसी जमाखोर पर या किसी भी उस व्यक्ति पर जो जनता के जीवन से खिलवाड़ करते हैं, हाथ डालने से कतराती है। मैं यह नहीं कहता कि सारा दोष केन्द्र सरकार का ही है। राज्य सरकारें भी अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर रही है। केन्द्र सरकार को बताना है कि दिल्ली में कितने बेईमान व्यापारी गिरफ्तार किये गये है। यह इस बात को साबित करता है कि मुद्रास्फीति किसी भी विवेकसम्मत दर से परे है। सरकार की नीति और जनता के महत्वपूर्ण सरोकारों के बीच काफी अंतर है। भारतीय अपनी आय का 45 प्रतिशत भोजन पर खर्च करते हैं। वह अमरीका नहीं है, ओबामा का देश नहीं है। हमारे देश में हमारी आय का 45 प्रतिशत भोजन पर खर्च होता है और एक वर्ष में खाद्य पदार्थों की कीमतों में 100 प्रतिशत वृद्धि हुई हैं तो क्या सरकार का कोई दोष नहीं है? हम उसकी नीति को जनता को दी जाने वाली सेवा की कसौट पर परखेंगे।
देश के मुख्य सांख्यिकीविद, एक सिविल सर्वेंट ने कहा है कि मूल्यवृद्धि जमाखोरी तथा स्टाक जमा करने के कारण हुई है। यह मैं नहीं, बल्कि एक नौेकरशाह कह रहा है। इसलिए वह वायदा कारोबार है जो तबाही मचा रहा है जिसकी सरकार ने इजाजत दी है। वह उदारीकृत निर्यात जिसने बर्बादी अंजाम दिया है। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ध्वस्त हो जाने से बाजार बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसलिए देश में कृषि के ढह जाने की पृष्ठभूमि में यह सब हुआ है और सरकार ने पिछले छह वर्षों में कृषि में सुधार के लिए कोई भी महत्वपूर्ण कदम नहीं उठाया है, कृषि संकट इसकी पृष्ठभूमि रहा है और उसके साथ ही सट्टेबाज तबाही मचा रहे हैं और सरकार काफी उदार एवं नरम बनी हुई हैं। सरकार को दिखाना है कि उसके पास इच्छाशक्ति है या नहीं। यह तो पूरी विफलता है। मैं सरकार के नेताओं से पूरी विनम्रता के साथ कहना चाहता हूं कि चुनावी विजय हमेशा सरकार की आपराधिक विफलता को माफ नहीं कर सकती है। आखिरकार यह एक लोकतंत्र है, मैं सरकार से आग्रह करूंगा कि वह इस पर विचार करे कि राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य के निर्वहन में उसका चूक हुई या नहीं।

नफ़स-नफ़स कदम-कदम

नफ़स-नफ़स कदम-कदम
बस एक फिक्र दम-ब-दम
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
जहां अवाम के खिलाफ साजिशें हो शान से
जहां पे बेगुनाह हाथ धो रहे हों जान से
जहां पे लफ़्ज-ए-अमन एक खौफनाक राज हो
जहां कबूतरों का सरपरस्त एक बाज हो
वहां न चुप रहेंगे हम
कहेंगे, हां, कहेंगे हम
हमारा हक! हमारा हक! हमें जवाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
यकीन आँख मूंद कर किया था जिन पर जान कर
वही हमारी राह में खड़े हैं सीना तान कर
उन्हीं सरहदों में कैद हैं हमारी बोलियां
वही हमारे थाल में परस रहे हैं गोलियां
जो इनका भेद खोल दे
हरेक बाल बोल दे
हमारे हाथ में वही खुली किताब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
वतन के नाम पर खुशी से जो हुए हैं बे-वतन
उन्हीं की आह बे-असर, उन्हीं की लाख बे-कफन
लहू पसीना बेचकर जो पेट तक न भर सके
करें तो क्या करें भले न जी सकें, न मर सकें
सियाह जिंदगी के नाम
उनकी हर सुबह ओ शाम
उनके आसमां को सुर्ख आफताब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए।
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
होशियार! कह रहा लहू के रंग का निशान
ऐ किसान होशियार! होशियार नौजवान!
होशियार! दुश्मनों की दाल अब गले नहीं
सफेदपोश रहजनों की चाल अब चले नहीं
जो इनका सर मरोड़ दे
गुरूर इनका तोड़ दे
वह सरफरोश आरजू वही जवाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!
तसल्लियों के इतने साल बाद अपने हाल पर
निगाह डाल, सोच और सोच कर सवाल कर
किधर गये वो वायदे? सुखों के ख्वाब क्या हुए?
तुझे था जिनका इन्तजार वो जवाब क्या हुए?
तू झूठी बात पर न और एकबार कर
कि तुझको सांस-सांस का सही हिसाब चाहिए!
घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए!
जवाब दर सवाल है कि इंकलाब चाहिए!
इंकलाब जिन्दाबाद!
जिन्दाबाद इंकलाब!

-शलभ श्रीराम सिंह

Thursday, 24 December 2009

संघ का अंतर्द्वंद्व - भाजपा का अस्तित्व

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) दावा तो सांस्कृतिक संगठन होने का करता है परन्तु उसने भारत की बहुलतावादी संस्कृति एवं सहअस्तित्व की भावना से हमेशा परहेज ही किया। उसके गैर-राजनीतिक होने के दावे की हकीकत से देश का बच्चा-बच्चा वाकिफ है। बाजपेई और आडवाणी 85 वर्ष के करीब हो गये, वे अपनी उम्र और भूमिका दोनों का सफर तय कर चुके हैं। उनके शरीर नश्वर हैं..... समाप्ति की ओर अग्रसर। लेकिन भाजपा की आत्मा - ”राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ“ भी 85 साल की होने के बावजूद न तो स्वयं को मृतप्रायः स्वीकार करने को तैयार और न ही अपने राजनीतिक संस्करण भाजपा को ही।
सत्ता में आने के लिए भाजपा बार-बार अपनी आत्मा यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोषित सोच के साथ समझौता करने के बावजूद राजनीतिक क्षितिज पर पराभव की ओर अग्रसर है। अपने राजनीतिक संस्करण की इस दुर्दशा पर बहुत चिन्तित है संघ। बड़ी कुलबुलाहट, बड़ी छटपटाहट का शिकार है संघ। पूर्व संघ प्रमुख के.सी.सुदर्शन भाजपा नेतृत्व से शिकायतें करते ही रह गये कि भाजपा सत्ता के नशे में परिवार के योगदान को भुला बैठी। भागवत संघ परिवार के मुखिया बनने के बाद लोकसभा चुनावों में पार्टी की पराजय को बर्दाश्त नहीं कर सके। अपनी 60वीं वर्षगांठ की ओर अग्रसर भागवत चीख उठे - ”बदलाव जरूरी है।“ समाचार माध्यमों एवम् राजनीतिक हल्कों में भाजपा ने कुलबुलाहट को शान्त करने का प्रयास किया। राजनाथ सिंह पार्टी में आन्तरिक लोकतंत्र के नाम पर मामले को शान्त करते नजर आये। वे पार्टी के जिस आंतरिक लोकतंत्र की दुहाई दे रहे थे, पूरा देश उसके अस्तित्वहीन होने से परिचित है।
आखिर 18 दिसम्बर को वह घड़ी आ ही गयी जब संघ के प्रतिनिधि के तौर पर गडकरी ने भाजपा की शीर्षसत्ता यानी उसके अध्यक्ष पद पर आसीन हो गये। भागवत के निर्देशन में ‘हेडगेवार भवन’ में भाजपा को एक बार फिर जिन्दा रखने के लिए जो ब्लूप्रिन्ट तैयार किया गया था, उसको अगली जामा पहनाया जाने लगा।
गडकरी की क्या पहचान होगी? उनके सामने पार्टी की लगभग वही स्थिति है तो सन 1984 में भाजपा की थी। संघ का स्वास्थ्य हमेशा जन-मानस के रूधिर से ही पनपता रहा है। तब संघ को अयोध्या में एक प्रतीक नजर आ गया। उस प्रतीक के झुनझुने को लाल कृष्ण आडवाणी को एक रथ पर बैठा कर पकड़ा दिया गया। वे पूरे देश में उस झुनझुने को बजा-बजाकर आवाम की शान्ति-चैन छीनने निकल पड़े क्योंकि फासिस्ट संघ के राजनीतिक संस्करण भाजपा को जीने के लिए तमाम लाशों की जरूरत थी। उधर संघ परिवार अपने अन्य अनुषांगिक संगठनों के साथ मिलकर अयोध्या के प्रतीक को ध्वंस करने के ब्लूप्रिन्ट को अमली जामा पहनाने की तैयारी करता रहा। उस दौर में पूरे देश में काफी लाशें गिराने में संघ और भाजपा सफल रहे। उन लाशों से गुजर कर आखिरकार भाजपा को एक नया जीवन मिल गया। केन्द्र में सत्तासीन होने का उसका रास्ता प्रशस्त हुआ था परन्तु वह 24 पार्टियों का सर्वमान्य नेता कथित उदारमना अटल बिहारी बाजपेई के नाम पर सहमत होने पर ही सम्भव हो सका था।
उस दौर ने जनता के सामने संघ परिवार की सोच को साफ-साफ पेश कर दिया था। उसके इस चेहरे से भी जनता अब परिचित हो गयी है।
अब देखना होगा कि गडकरी के हाथ में भागवत ”हेडगेवार भवन“ से कौन सा झुनझुना और कैसा रथ भेजते हैं। हमें सतर्क रहना होगा क्योंकि मृतप्रायः भाजपा को नया जीवनदान देने के लिए संघ फिर लाशों की राजनीति करने से नहीं हिचकेगा। हम जनता से यही गुजारिश कर सकते हैं कि जागते रहो और फासिस्ट संघ की नई चाल से सतर्क रहो।
ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अयोध्या के प्रतीक रूपी झुनझुने की अवधारणा तैयार करने के पहले संघ परिवार ने सत्तर के दशक से अस्सी के दशक के मध्य तक कई पैतरों का इस्तेमाल किया था। पहले उन्होंने स्वामी विवेकानन्द को अपनाने का प्रयास किया परन्तु स्वामी विवेकानन्द के शिकागो के ऐतिहासिक भाषण की यह लाईनें कि ”भूखों को धर्म की नहीं रोटी की जरूरत होती है“ भाजपा के रास्ते पर आकर खड़ी हो गईं। फिर उन्होंने शहीदे-आजम भगत सिंह को अपना प्रतीक बनाने का प्रयास किया तो भगत सिंह का खुद को नास्तिक घोषित करने का मामला भाजपा के आड़े आ गया। तब उन्होंने ”गांधीवादी समाजवाद“ का प्रलाप शुरू किया तो जनता ने गांधी के हत्यारे के रूप में भाजपा को चित्रित कर उसे लोकसभा में दो सीटों तक पहुंचा दिया। सम्भव है शुरूआती दौर में संघ एक बार फिर इस तरह के प्रतीकों का इस्तेमाल करने की असफल कोशिश करे परन्तु अन्तोगत्वा उसे जिन्दा रहने के लिए लाशों की ही जरूरत पड़ेगी। उसका इतिहास तो यही बताता है।

प्रदीप तिवारी

Wednesday, 23 December 2009

स्मरण कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज

भारत का राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम अपने अन्दर प्रवाहित अनेकानेक विरोधी धाराओं को समेटे और उनकी प्रहार क्षमताओं को एक साथ जोड़े एक महानद के विराट स्वरूप में तूफानी गति से आगे बढ़ा था। इस समन्वित शक्तिशाली राष्ट्रीय संघर्ष ने देश में दो सौ साल से अपनी गहरी जड़े जमाये ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ कर सात समुन्दर पार फेंक दिया था। इस राष्ट्रीय आन्दोलन के ही गर्भ में पनपी, पली और बढ़ी एक धारा थी - कम्युनिस्ट आन्दोलन की मानवतावादी धारा जिसका अपना विशिष्ट महत्व है और जिसे समझे बिना भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के सारतत्व को सही अर्थों में समझा नहीं जा सकता।
भारत के कम्युनिस्ट आन्दोलन ने राष्ट्रीय स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए और फिर इस स्वाधीनता को गरीबों के झोंपडों तक पहुंचाने के लक्ष्य के लिये अपना सर्वस्व होम कर देने वाली ऐसी अनेक विभूतियां पैदा की हैं जिन पर संसार की कोई भी कौम गर्व कर सकती है। ऐसी ही अमर विभूतियों में थे - कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज उत्तर भारत में - खासतौर पर उत्तर प्रदेश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जन्मदाताओं और संस्थापकों में से एक प्रमुख हस्ती थे। वे अल्प आयु में ही पार्टी की केन्द्रीय कमेटी और इसक पोलिट ब्यूरो के सदस्य बन कर शीर्ष नेतृत्व के बीच उभरे और गहन माक्र्सवादी अध्ययन, जनता के बीच सघन कार्य तथा जन संघर्षों की आग में तप कर कुन्दन बने। अपने क्रान्तिकारी व्यक्तित्व से उन्होंने सम-सामयिक राजनीति को न केवल गहराई से प्रभावित किया वरन उसे एक निश्चित दिशा देने में भी समर्थ हुये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट आन्दोलन का इतिहास, उसकी इमारत की एक-एक ईंट कामरेड भारद्वाज के बलिदानी जीवन, उनकी विद्वता, गहन चिन्तन-मनन तथा राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक प्रश्नों पर चले घनघोर जन संघर्षों में उनके जनूनी जुझारूपन की गवाह है।
मेरठ षडयंत्र केस में जब भारत के मजदूर नेता चुन-चुन कर जेलों में बन्द कर दिये गये थे, तो जिन तीन-चार तरूणों ने भारत में मजदूर किसान पार्टी (कम्युनिस्ट पार्टी) के काम को जारी रखा और उसे आगे बढ़ाने के लिए बहुत काम किया, उनमें कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का नाम सबसे पहले आता है।
कामरेड भारद्वाज का जन्म मेरठ जिले की बागपत तहसील के बूड़पुर गांव में दिसम्बर 1908 में हुआ था। उनके पिता पं. रामानन्द शर्मा संस्कृत के अच्छे पण्डित थे लेकिन उन्होंने यजमानी या पंडिताई को अपने जीविकोपार्जन का साधन नहीं बनाना चाहा। वैसे इस गांव के अधिकांश ब्राम्हण परिवार यजमानी के धंधे से ही अपनी जीविका चलाते थे। उन्होंने महाजनी और अनाज की खरीद-फरोख्त के कारोबार को अपना कर अपने परिवार का भरण-पोषण किया। आर्य समाजी आन्दोलन के प्रसार में अपने गांव से शर्मा जी पहले आर्य समाजी बने और इसके लिए बहुत काम भी किया। तत्कालीन आर्य समाज आन्दोलन और इसमें पिता द्वारा निभाई गई भूमिका का निश्चित ही कामरेड भारद्वाज के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा था।
कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज की आरंभिक शिक्षा अपने गांव और पड़ोसी गांवों के स्कूलों में ही हुई थी। बाद में बड़ौत के हाई स्कूल में पढ़ते हुए वे घनघोर आर्य समाजी और फिर राष्ट्रीय आन्दोलन के जनूनी सिपाही बन गये। उस दौरान उन्होंने गांधी जी के अनशन पर तथा तिलक की गिरफ्तारी पर अपने स्कूल में हड़तालों का नेतृत्व किया। यह समय और उनका स्कूली जीवन राजनीति में प्रवेश और इसके लिए अपने को तैयार करने हेतु एक महत्वपूर्ण पाठशाला बन गया था।
असहयोग आन्दोलन के भरपूर प्रभाव के कारण पिता के विरोध के बावजूद उन्होंने अपना स्कूल छोड़ दिया था। बगैर पैसे के वे चालीस मील पैदल चलकर अपने साथियों के साथ दिल्ली भाग गये और गांधी जी के आदेश के अनुसार चर्खा चलाना शुरू कर दिया। बाद में रोहतक के राष्ट्रीय स्कूल में दाखिला लेकर उन्होंने वहां दो साल की पढ़ाई एक साल में ही पूरी की और मैट्रिक की परीक्षा पास की। अब आगे की पढ़ाई के लिए वे लाहौर के कौमी विद्यालय में दाखिल हो गये। वहीं पर यशपाल, मोहन लाल गौतम और हरनाम दास (भदन्त आनन्द कौसल्यायन) से सहपाठी के रूप में उनका परिचय हुआ।
1924 की जनवरी में कामरेड भारद्वाज 16 वर्ष की आयु में बनारस जाकर वहां के सेण्टल हाई स्कूल में दाखिल हुए। यहां भी दो वर्ष की पढ़ाई एक वर्ष में पूरी कर यहां की मैट्रिक परीक्षा पास की। इस दौरान स्कूली पढ़ाई के साथ वे राष्ट्रीय आन्दोलन से भी गहरा सम्बंध बनाये रखे। साथ ही साहित्यिक पत्र पत्रिकाओं और प्रेम चन्द्र की कहानियों की नियमित पढ़ाई से उनमें गहरी साहित्यिक अभिरूचि जाग्रत हुई। उन दिनों वे कांग्रेस के अनन्य भक्त थे। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश ले कर वे इतिहास, अर्थशास्त्र और तर्क शास्त्र गहरी दिलचस्पी के साथ पढ़ने लगे। उन्होंने इस दौरान अर्थशास्त्र पर तो अनेकानेक बाहरी पुस्तकें भी गहराई के साथ पढ़ डालीं। वे घोर राष्ट्रवादी युवक थे, इसलिए 1926 में कानपुर कांग्रेस अधिवेशन के लिये स्वयंसेवक बन कर गये थे। उन्हीं दिनों कामरेड भारद्वाज ने रूसी क्रान्ति के बारे में चर्चा सुनी थी जिससे वे उसके प्रति आकर्षित हुए थे।
बनारस से इंटर पास करने के बाद वे प्रयाग विश्वविद्यालय में दाखिल हुये और यहां भी अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र विषय थे। यहां छात्र जीवन के दौरान कामरेड भारद्वाज स्वराजी देश भक्त से विकास कर धीरे-धीरे अपने अनुभव और सम्पर्क सूत्रों के सहारे कट्टर कम्युनिस्ट क्रांतिकारी बन गये। यहां पर छात्र संघ की एकसभा में उन्होंने कामरेड पूरन चन्द्र जोशी का विद्वतापूर्ण और प्रेरणाप्रद भाषण सुना और उनके गहरे सम्पर्क में आकर धीरे-धीरे राजनैतिक कार्यों में उनके दाहिने हाथ बन गये। ज्ञातव्य हो कि कामरेड पूरन चन्द्र जोशी बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बने और भारतीय राजनीति में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कामरेड जोशी का जन्म शताब्दी वर्ष इस समय चल रहा है। इलाहाबाद में छात्र के रूप में ही कामरेड भारद्वाज ने माक्र्स की ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ और लेनिन की ‘राज्य और क्रान्ति’ तथा ‘साम्राज्यवाद’ आदि पुस्तकों का अध्ययन किया। वह प्रयाग तरूण संघ के सचिव भी थे जबकि पं. जवाहर लाल नेहरू उसके अध्यक्ष थे।
कामरेड भारद्वाज के गंभीर अध्ययन ने जहां राजनीति में उन्हें कम्युनिज्म पर पहुंचाया वही धर्म और ईश्वर के फन्दे से छुड़ा कर एकदम कट्टर अनीश्वरवादी बना डाला। उन्होंने अब बी.ए. पास कर लिया था। इसी साल मार्च में कामरेड पूरन चन्द्र जोशी मेरठ षडयंत्र केस में गिरफ्तार कर लिये गये।
मेरठ षडयंत्र केस में बड़े पैमाने पर मजदूर नेताओं की गिरफ्तारी के बाद कामरेड भारद्वाज के ऊपर राजनैतिक कार्यों का अकेले ही सारा बोझ आ पड़ा। उन्हें माक्र्सवाद पर क्लास लेने के लिए प्रयाग से बाहर भी जाना पड़ता। जब वे एम.ए. में राजनीति शास्त्र पढ़ रहे थे। साथ ही घर वालों के जोर देने के कारण कानून की पढ़ाई भी मजबूरन पढ़ रहे थे। 1930-31 का समय कामरेड भारद्वाज के लिए माक्र्सवाद का गहन अध्ययन का समय था। राष्ट्रीय आन्दोलन के लिए यह उथल पुथल का समय था जब एक ओर लाहौर षडयंत्र केस तथा असेम्बली बम केस मके अभियुक्त के रूप में जेल में बन्द सरदार भगत सिंह, राजगुरू तथा सुखदेव की फांसी ने सम्पूर्ण देश के युवा रक्त में उबाल पैदा कर दिया था तो उधर दूसरी ओर गांधी जी द्वारा छेड़े गये आन्दोलन ग्रामीण अंचल की किसान मजदूर जनता को भी राजनीति में आने के लिए प्रेरणा प्रदान कर रहे थे। देश के राजनैतिक घटनाक्रम का यह तूफान भी कामरेड भारद्वाज को गम्भीर रूप से प्रभावित कर रहा था। 1931 में एम.ए. उत्तीर्ण कर उन्होंने विश्वविद्यालय में दूसरा नम्बर पाया था। कानून का पहला वर्ष पास करके ही उन्हें इसकी पढ़ाई छोड़ देनी पड़ी थी। उस समय पैदा हो गये घरेलू और राजनैतिक हालात का यही तकाजा था।
जेल में बन्द साथियों से मिलकर उनके परामर्श और निर्देश के आधार पर कामरेड ेभारद्वाज परीक्षाफल आते ही 23 वर्ष की आयु में बम्बई में मजदूरों के बीच काम करने के लिए चले गये। वहां पर उन्होंने कामरेड गंगाधर अधिकारी, का. सरदेसाई तथा का. बी.टी.रणदिवे के साथ काम करना शुरू किया।
बम्बई में कामरेड भारद्वाज ने रेलवे मजदूरों की यूनियन कपड़ा मिल मजदूरों की गिरनी कामगार यूनियन और तरूण कामगार लीग को अपना कार्य क्षेत्र बना कर सघन कार्य किया। वे विभिन्न क्षेत्रों के मजदूरों में व्याख्यान देते और उनका क्लास लेते तथा कामरेड सरदेसाई के साथ मिल कर रेलवे मजदूरों के लिए हिन्दी व अंग्रेजी में दो अखबार निकालते। इसी साल गिरनी कामगारों के एक जुलूस का नेतृत्व करने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर तीन माह की सजा दी यी। वे रेलवे मजदूरों में अपने सघन कार्य की वजह से बीबीसीआई (बम्बई से अजमेर) के मजदूरों की यूनियन के महामंत्री चुन लिये गये। 1934 में बम्बई में हुई कपड़ा मिल मजदूर कांफ्रेंस के अन्दर मालिकों के जुल्म के खिलाफ मजदूर हड़ताल का निर्णय लिया गया। कामरेड भारद्वाज की हड़ताल की तैयार के लिये बम्बई और अहमदाबाद में भी भारी परिश्रम करना पड़ा। इसी तैयारी के लिये अजमेर जाने पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वहां के रेलवे वर्कशाॅप में उसी समय हड़ताल हो गयी थी। कामरेड भारद्वाज को छः सप्ताह की सजा देकर जेल में डाल दिया गया। इसी बीच अहमदाबाद के वारंट पर उन्हें दो साल की सजा हुई और वह पूरा जेल जीवन साबरमती और हैदराबाद (सिंध) की जेलों में सी क्लास के अन्दर बिताना पड़ा।
सन 1936 के अप्रैल महीने में वे जेल से छूटे तो उततर प्रदेश पुलिस ने हिरासत में लेकर प्रयाग में जाकर छोड़ा। इससे पहले ही भारद्वाज के जेल में रहते ही नागपुर में सम्पन्न पार्टी की केन्द्रीय समिति की बैठक में उन्हें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय समिति और पोलिट ब्यूरो का सदस्य चुन लिया गया था।
प्रयाग आने पर कामरेड भारद्वाज की कामरेड पूरन चन्द्र जोशी से भेट हुई थी। उन दिनों पार्टी का केन्द्रीय कार्यालय लखनऊ पहुंच गया था। कामरेड भारद्वाज को अब लखनऊ को केन्द्र बना कर काम करना था। पार्टी के गैर कानूनी होने के कारण साथियों को अधिकतर फरारी की हालत में ही काम करना पड़ता था। पार्टी के निर्णय से कामरेड भारद्वाज कानपुर के मजदूरों में काम करने के लिये गये और वहां सालों रह कर भरपूर शक्ति से काम किया।
फरारी की हालत में ही वे पार्टी के काम से लाहौर गये। वहां के लाजपतराय भवन में जब वे मीटिंग कर रहे थे, तभी अचानक पुलिस ने हाल को चारों तरफ से घेर लिया। आस-पास के सभी घर पुलिस के घेरे में थे फिर भी कामरेड भारद्वाज पकड़ में नहीं आये, खिड़की से कूद कर एक के बाद दूसरे घरों में छलांग लगाते हुये पुलिस की आंखों में धूल झोक कर गायब हो गये। दूसरे दिन फिर से उसी हाल में उन्होंने सफलतापूर्वक मीटिंग की जिसकी पुलिस को भनक भी न लग सकी।
फैजपुर कांग्रेस में भी वे फरारी की हालत में ही गये थे। 1942 में रामगढ़ कांग्रेस में भी वे पहुंचे थे। कामरेड भारद्वाज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशनों में कम्युनिस्ट साथियों के पथ प्रदर्शन का दायित्व निभा रहे थे। रामगढ़ कांग्रेस की विषय निर्वाचनी समिति में उन्होंने प्रस्तावित दस्तावेज पर अपना संशोधन भेजा था। निश्चित समय पर गुप्त रूप से चादर ओढ़े वे मंच पर गये थे और संशोधन पेश कर उस पर जम कर बोले थे। पुलिस की भरपूर चैकसी और नाकेबंदी को धता बता कर कामरेड भारद्वाज भाषण के बाद नौ दो ग्यारह हो गये थे। पुलिस उन्हें खोजती ही रह गई थी किन्तु उसके हाथ कुछ भी न लगा था।
सन 1931 की बात है। पूना की एक सभा में कामरेड भारद्वाज बोलना चाहते थे परन्तु सभापति उन्हें इजाजत देने को तैयार न थे क्योंकि वे अपने सीने पर हंसिया और हथोड़ा का बैज लगाये हुये थे। जनता उन्हें सुनने को तत्पर थी। यह भांप कर वे अचानक जबरन मंच पर चढ़कर अध्यक्षत की इजाजत के बगैर धुआंधार भाषण करने लगे थे। तालियों की गड़गड़ाहट में भयभीत होकर सभापति मंच छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था। ऐसे थे क्रान्तिकारी और जुझारू तरूण कामरेड भारद्वाज।
कामरेड भारद्वाज एक सुन्दर वक्ता थे। 1930 में प्रयाग विश्वविद्यालय में भाषणकला में गोल्ड मेडल उन्हें ही मिला था। छात्र जीवन के दौरान भाषण प्रतियोगिताओं में उन्हें समय-समय पर अनेक पुरस्कार मिलते रहे थे। फरारी के जीवन में भाषण कला से तो काम चलता नहीं। उन्होंने अपनी योग्यता और क्षमता को माक्र्सवादी तरूणों की शिक्षा में बड़ी सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया। वे बहुत ही अच्छे पार्टी शिक्षक थे। उनकी इस क्षमता का उपयोग देवली जेल में नजरबंद साथियों ने भली प्रकार किया था।
उनके अन्दर मात्र सैद्धान्तिक विश्वलेषण की गहरी क्षमता ही नहीं थी वरन वे साथ ही साथ व्यवहारिक विश्लेषण में भी पारंगत थे। कानपुर का मजदूर आन्दोलन उस समय में इतना शक्तिशाली बना था उसमें यदि कामरेड मौलाना संत सिंह यूसुफ के काम और परिश्रम का बड़ा हाथ था तो कामरेड भारद्वाज की बुद्धि का भी इसमें सबसे ज्यादा योगदान था।
रामगढ़ कांग्रेस में पुलिस की चकमा देकर फरार होने के बाद पुलिस करीब सवा लाल के बाद जनवरी 1941 में ही उन्हें गिरफ्तार कर सकी। कानपुर, आगरा आदि की जेलों में कुछ समय उन्हें रखने के बाद उन्हे देवली कैम्प जेल में भेज दिया गया था। दिन रात बरसों तक पार्टी कार्यों से जूझते रहने और फरारी जीवन और जेल की कठिनाईयों के उनके स्वास्थ्य को बुरी तरह से तोड़ कर रख दिया था फिर भी पार्टी कार्य और संगठन निर्माण को दृष्टि में रखकर जेल में साथियों का पार्टी क्लास लेना उनकी जिम्मेदारी थी। बीमारी के दौरान भी वे अपनी इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाते रहे।
जेल के बन्दियों के कष्टों और परेशानियों के खिलाफ देवली कैम्प जेल में जो संघर्ष भूख हड़ताल के रूप में चलाया गया था, उसके नेतृत्व का भार कामरेड भारद्वाज के ऊपर ही था। कम्युनिस्ट पार्टी के कानूनी करार दे दिये जाने के बाद जब काफी बड़ी संख्या में कम्युनिस्ट जेलों से रिहा कर दिये गये तब भी कामरेड भारद्वाज को नहीं छोड़ागया। डाक्टरों की इस घोषणा के बाद भी कि उन पर टी.बी. का भारी आक्रमण है, उन्हें सुल्तानपुर जेल में ले जाकर बन्द कर दिया गया। कुछ समय बाद यह समझ कर कि वे अब मौत के मुंह में जा रहे है, केवल तभी, बेबसी में 24 जनवरी 1943 को उन्हें जेल से रिहा किया गया।
कामरेड भारद्वाज जेल से बाहर तो आ गये थे किन्तु टी.बी. की गंभीर बीमारी उन्हें मौत के मुंह में ढकेलने के लिए अमादा थी। पार्टी के लिये उनका जीवन अमूल्य था। उन्हें कुछ समय के बाद ही भुवाली सेनीटोरियम में भेज दिया गया। वहां रह कर उनके स्वास्थ्य में कुछ सुधार तो हुआ किन्तु मौत का खतरा निरन्तर उनका पीछा करता रहा। फिर भी वे अपनी रही सही क्षमता और शक्ति पार्टी कार्य तथा जनता के आन्दोलनों को समर्पित करते रहे। इसी स्थिति में उनके अगले पांच साल बीमारी के दौरान भी आंधी तूफानों के बीच गुजरे।
उत्तर प्रदेश में उन दिनों इसके विभिन्न स्थानों को केन्द्र बना कर अनेक कम्युनिस्ट नेताओं के अलग-अलग ग्रुप काम कर रहे थे। प्रांतीय स्तर का कोई सांगठनिक ढांचा बनना अभी शेष था। यह स्थिति 1933 से 1937 तक चलती रही। इस दौरान इन अलग-अलग ग्रुपों के कामों में समन्वय स्थापित कर पार्टी के केन्द्रीय प्रतिनिधि के रूप में कामरेड भारद्वाज इनका नेतृत्व और पथ प्रदर्शन करते रहे थे। उन्होंने कामरेड पी.सी.जोशी ओर कामरेड अजय घोष आदि के साथ मिल कर सन 1938 में पार्टी का एक राज्य स्तरीय सम्मेलन गुप्त रूप से लखनऊ में करया और पहली बार एक प्रांतीय कमेटी का निर्माण किया जिसके प्रांतीय मंत्री कामरेड अर्जुन अरोड़ा बनाये गये। उत्तर प्रदेश में कम्युनिस्ट पार्टी के निर्माण की प्रारम्भिक प्रक्रिया और इसका इतिहास कामरेड भारद्वाज की अप्रतिम कुरबानियों की लाल स्याही से लिखा गया है। वे ही इसके संस्थापक और निर्माता थे।
देश को राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त हो जाने और केन्द्र एवं राज्यों में कांग्रेस सरकारें बन जाने के बाद भी कामरेड भारद्वाज के संघर्षमय जीवन में कोई फर्क नहीं आया। मजदूरों-किसानों के संघर्षों और सरकारी दमन चक्र ने उनका दामन नहीं छोड़ा। 4 अप्रैल 1948 को 104 डिग्री बुखार की हालत में गिरफ्तार कर उन्हें देहरादून की जेल में डाल दिया गया जहां चार दिन के बाद ही 8 अप्रैल 1948 को उनका दुःखद निधन हो गया।
इस प्रकार चालीस वर्ष से भी कम आयु में ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के एक शीर्ष नेता की हैसियत में राष्ट्रीय स्वाधीनता एवं समाजवाद के संघर्ष में जनता का नेतृत्व करते हुए अनुकरणीय बलिदान की मिसाल बन कर हमारे बीच से चले गये। वे शहीद हो गये।
देश में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मजदूर आन्दोलन के निर्माण तथा विकास पर सरसरी नजर डालने पर भी - खास तौर पर उत्तर प्रदेश में कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज का माक्र्सीय बौद्विकता और क्रान्तिकारी कार्यकलाप से तराश गया गंभीर तथा मुस्कराता हुआ मोहक चेहरा हमारी स्मृतियों के बीच प्रेरक झांकी के रूप में उभर आता है।
कामरेड भारद्वाज की मौत पार्टी के लिए ऐसी शहादत है जो उसकी नींव पत्थर बनी हुई है।
(कामरेड रूद्र दत्त भारद्वाज के जीवन और कृतित्व से संबंधित तथ्य महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा लिखित ‘नये भारत के नये नेता’ नामक पुस्तक से साभार लिये गये हैं।)

(का. जगदीश नारायण त्रिपाठी)

कामरेड पूरन चन्द्र जोशी: निहित बुद्धिजीवी एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रणेता

महान इटालियन कम्युनिस्ट नेता कामरेड अंतोनियो ग्राम्शी ने इस शब्द का व्यापक प्रयोग किया है - ‘निहित बुद्धिजीवी’ (आर्गनिक इंटेलेक्युअल)। उन्होंने बताया कि मेहनतकश आन्दोलन परिपक्वता हासिल कर ऐसे बुद्धिजीवियों को जन्म देता है जो उसके ऐतिहासिक उद्देश्यों को एकाकार होते हैं, भले ही वे उसी वर्ग के न भी हों। ग्राम्शी स्वयं इसका उदाहरण थे। वे इटालियन कम्युनिस्ट पार्टी के महामंत्री थे जिन्हें मुसोलिनी ने गिरफ्तार कर जेल में सड़ने के लिए छोड़ दिया। गंभीर बीमारी के बाद ही उन्हें 1936 में रिहा करना पड़ा और कुछ ही दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गयी।
जब हम अपने देश के कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास पर नजर डालते हैं तो एक बार उश्भर आती है। कामरेड पूरन चन्द्र जोशी या कामरेड पीसीजे के नेतृत्व में कम्युनिस्ट आंदोलन में बड़ी ही निहित संभावनाएं पैदा हो गईं। जोशी के रूप में आंदोलन को एक ऐसा नेता मिल गया जो सच्चे मानों में ‘निहित बुद्धिजीवी’ था। वे सिर्फ मजदूरों और किसानों की फौरी समस्याओं तक नहीं, और सिर्फ मजदूरों और किसानों तक ही सीमित नहीं रहे। जोशी ने आंदोलन के दूरगामी उद्देश्यों की गहराई में जाकर उसका सार समझने की कोशिश की।
फासिज्म, संस्कृति और साहित्य
प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्धों के बीच के काल का मुसोलिनी और हिटलर के रूप में फासिज्म के उभार का समय था। साथ ही फासिज्म और नाजीवाद के विरोध का भी। उस काल में यूरोप में तथा भारत में भी ‘पापुलर फ्रंट’ तथा संयुक्त मोर्चे संबंधी दिमित्रोव थीसिस पर घनघोर बहस चल रही थी।
रूसी क्रांति के विचारों ने भारत के राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन को गहराई और व्यापकता से प्रभावित किया। सारे विश्व के पैमाने पर बुद्धिजीवियों का काफी बड़ा तबका फासिज्म-विरोध पर उतर पड़ा। लेकिन बात सिर्फ फासिज्म-विरोध तक सीमित नहीं थी।
बुद्धिजीवियों में आशावादी आंदोलन बहुत बड़े पैमाने पर चल पड़ा। फासिज्म से न सिर्फ लड़ना था बल्कि एक नए समाज का निर्माण करना हमारी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है, बुद्धिजीवियों में इस जिम्मेदारी का अहसास गहराता गया और इस भावना ने एक विशाल आंदोलन का रूप ले लिया। सोवियत संघ में अपनी सारी कमियों के बावजूद औद्योगिक विकास की सफलताओं ने समाजवाद के प्रति आकर्षण बढ़ा दिया।
भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण
आजादी का आंदोलन सांस्कृतिक एवं साहित्य बहसों, आंदोलनों एवं संग्इनों के लिए अनुकूल परिस्थिति थी। यह वह काल था जब रोम्यां रोलां, मक्सिम गोर्की, राल्फ फाॅक, क्रिस्टोफर काॅडवेल सरीखे दिग्गज सांस्कृतिक-साहित्यिक पटल पर नक्षत्रों के समान उभर रहे थे। भारत में भी सज्जाद जहीर, मुल्क राज आनन्द, मखदूम मोहिउद्दीन सरीखे साहित्यकार तक सांस्कृतिक क्षेत्र में अनेकानेक नाम उभर रहे थे। आजादी का आंदोलन बुद्धिजीवी को आम जनता, किसानों, मजदूरों एवं मध्यवर्ग से जोड़े दे रहा था। दोनों में अंतरसंबंध निर्मित हो रहे थे। पुनर्जागरण की प्रक्रिया तेज हो रही थी और सांस्कृतिक आशावाद का संचार हो रहा था।
फ्रांस में बढ़ते प्रगतिशील साहित्यक आंदोलन ने नए आयाम जोड़े। रोम्यां रोलां, आंद्रे माल्रो और हेलरी बारब्यूस ने जो विचार-प्रवाह निर्मित किया उसने फासिज्म विरोधी संयुक्त मोर्चा आंदोलन में जान फूंक दी। परिणामस्वरूप 1935 में पेरिस में ‘संस्कृति की रक्षा के लिए लेखकों का विश्व सम्मेलन’ आयोजित किया गया जो एक मील का पत्थर साबित हुआ। 1936-39 का स्पेनी गृह-युद्ध फासिज्म के समर्थकों और फासिज्म के विरोधी प्रगतिशील शक्तियों के बीच विभाजन रेखा बन गई।
कामरेड पूरन चन्द्र जोशी - निहित बुद्धिजीवी की भूमिका में
भारत में साहित्य एवं संस्कृति भी भूमिका और उद्देश्यों के बारे में बहस छिड़ गई। भाषा और संस्कृति को अब अधिकाधिक साधन के रूप में देखा जाने लगा, न कि सिर्फ उद्देश्य के रूप में। साहित्य एवं संस्कृति जीवन की आलोचना का माध्यम भी हो सकते हैं और युग का प्रतिबिम्ब भी। संस्कृति, साहित्य, कला इत्यादि जनगण को प्रेरित एवं आंदोलन कर विशाल मूलगामी पुनर्जागरण का रूप धारण कर सकते हैं।
इस सच्चाई को कामरेड जोशी तथा अन्य साथियों ने पहचाना। इसका एक परिणाम हुआ 1936 में प्रगतिशील लेखक संघ का गठन।
दूसरा परिणाम था 1943 में इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) का गठन।
ये दोनों ही घटनाएं भारत के सांस्कृतिक एवं साहित्यिक पुनर्जागरण की महत्वपूर्ण कड़िया थीं।
कामरेड पी.सी. जोशी ने कला, साहित्य एवं संस्कृति की भूमिका पहचानी; मात्र राजनैतिक दृष्टि से नहीं, मात्र संगठन की दृष्टि से नहीं। उन्होंने इन माध्यमों को जन आंदोलनों एवं जनशिक्षा का साधन बनाया। जनता जब इन माध्यमों को बड़े पैमाने पर अपना लेती है तो जनमानस तथा जनचेतना के परिवर्तन का वे साधन बन जाते हैं।
पार्टी की देख-रेख में सांस्कृतिक मंच के गठन पर काफी समय से विचार हो रहा था। बम्बई में पहले ही इप्टा का गठन किया जा चुका था। कुछ स्थानों में किसी न किसी रूप में सांस्कृतिक गतिविधियां जोर पकड़ रहीं थीं और संगठन बनाए जा रहे थे।
भाकपा की प्रथम कांग्रेस और सांस्कृतिक गतिविधि
मई 1943 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की पहली अखिल भारतीय कांग्रेस बम्बई में आयोजित की गयी। इस अवसर पर अत्यंत ही समृद्ध, विकसित एवं विविध सांस्कृतिक गतिविधि आयोजित की गई - शायद फिर कभी ऐसा आयोजन न हो पाया। आंध्र प्रदेश, केरल, हैदराबाद, बंगाल, पंजाब, गुजरात, बम्बई, महाराष्ट्र इत्यादि प्रांतों एवं इलाकों की सांस्कृतिक मंडलियों एवं संगठनों ने अत्यंत ही आकर्षक संस्कृतिक कार्यक्रम पेश किये। इसमें 150 से अधिक कलाकारों ने भाग लिया। दामोदर हाल, कामगार मैदान तथा अन्य स्थानों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए गए। गीतों, नाटकों, नृत्यों, सम्पूर्ण प्रहसनों इत्यादि के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलू प्रस्तुत किए गए और राष्ट्र के पुनरूत्थान और पुनर्जागरण का चित्र खींचा। जनता के कलारूप प्रस्तुत गये। उदाहरण के लिए आंध्र की ‘बर्रकथा’ ‘बर्र’ नामक बाजे के सहारे गीत की प्रस्तृति, ‘पिचीकुन्तला’: आल्हा की तरह सामूहिक गायन का रूप; बहुरूपिया नृत्य, हरिजन नृत्य, फासिस्ट विरोधी लोरी इत्यादि।
इन कार्यक्रमों को हजारों लोगों ने बड़ी ही दिलचस्पी से देखा। जनता की चेतना विकसित करने के वे अत्यंत ही प्रभावशाली माध्यम थे।
उन्हें प्रेरित व विकसित करने का अधिकतर श्रेय कामरेड पी.सी. जोशी को जाता है।
इप्टा एवं सांस्कृतिक आन्दोलन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की प्रथम कांग्रेस के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम आकस्मिक नहीं था।
विभिन्न प्रदेशों में काफी पहले से प्रगतिशील, राष्ट्रवादी और कम्युनिस्ट शक्तियों की पहल पर जन संस्कृति मंच एवं आंदोलन संगठित हो रहे थे। उनका अपना-अपना अलग इतिहास है।
बम्बई इप्टा की हम चर्चा कर आये हैं। आंध्र क्षेत्र तथा देश के कई अन्य इलाकों में प्रभावशाली सांस्कृतिक आंदोलन विकसित हो रहा था। जिसका पार्टी के केन्द्र से सक्रिय संबंध था। इस बीच बंगाल में यूथ कल्चरल इंस्टीट्यूट (युवा सांस्कृतिक संस्थान) (1940-42) का गठन किया गया।
1939 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुछ छात्रों ने एक शोध संस्थान बनाने का प्रस्ताव रखा जो किन्हीं कारणवश सम्भव नहीं हो पाया। इनमें से कई विद्यार्थी ड्रामे इत्यादि लिखा करते थे और उनका मंचन किया करते थे। इसी वक्त प्रगतिशील लेखक संघ नामक संस्था का निर्माण किया गया था जिसका नाम बाद में बदलकर प्रगतिशील लेखक एवं कलाकार संघ कर दिया गया। इससे तथा अन्य से संबंधित विद्यार्थियों ने 1940 के मध्य में युवा सांस्कृतिक संस्थान की स्थापना की। वह 1942 तक सक्रिय रहा।
इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) की स्थापना में उपर्युक्त संस्थान की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसने कई प्रकार के प्रयोग किये, गीत लिखे, उन्हें धुनें दीं, साहित्यक एवं सांस्कृतिक रचनाएं तैयार कीं। उनमें एक नाटक जापानी फासिस्टों के बढ़ते के सम्बंध में ”एक हाओ“ कामरेड पी.सी. जोशी को भी दिखाया गया।
केन्द्रीय सांस्कृतिक दल और कामरेड जोशी
इप्टा के अलावा कम्युनिस्ट पार्टी की देखरेख में एक केन्द्रीय सांस्कृतिक दल (सेन्ट्रल कल्चरल स्क्वाड) की स्थापना भी की गई। इसका निर्माण 1944 के मध्य में किया गया। यह पार्टी द्वारा सांस्कृतिक मोर्चे पर बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम था। इसे ‘सेन्ट्रल ट्रूप’ भी कहते थे। शांतिवर्धन और उदय शंकर जैसे महान कलाकार कला की खोज में बम्बई तथा अन्य स्थानों में सांस्कृतिक दलों एवं कार्यक्रमों का गठन तथा आयोजन कर रहे थे। शांतिवर्धन तथा अन्य कलाकार जैसे रेखा जैन इत्यादि की मुलाकात इस सिलसिले में कामरेड पी.सी.जोशी से हुई। कामरेड जोशी उदय शंकर की आधुनिक शैली से बड़े ही प्रभावित हुए और जन-माध्यम का रूप देने पर जोर देने लगे। सेन्ट्रल स्क्वाड बनाने में कामरेड पी.सी.जोशी की सक्रिय भूमिका रही। 1944-46 के दौरान इस स्क्वाड ने सारे देश में जगह-जगह कार्यक्रम आयोजित कर धूम मचा दी। इसके साथ कई फिल्मी और गैर-फिल्मी हस्तियां जुड़ गईं।
सुप्रसिद्ध भाषाविद एवं साहित्यकार तथा कला के पारखी गोपाल हालदार के अनुसार चालीस के दशक में बंगाल के महा अकाल, फासिज्म विरोधी युद्ध तथा आजादी के आंदोलन की पृष्ठभूमि में कम्युनिस्टों के इर्द-गिर्द संस्कृति भी दुनिया के दिग्गज इकट्ठा हो गए। वह कविता, कहानी, नाटक, गीत, चित्रकला इत्यादि के अभूतपूर्व सृजन का युग था। उनके अनुसार संस्कृति में आए इस उफान को कामरेड पी.सी. जोशी ने मुख्यतः प्रोत्साहित और संगठित किया।
1943-44 का बंगाल तथा अन्य क्षेत्रों के महा अकाल को पार्टी के नेतृत्व में प्रगतिशील और क्रांतिकारी आंदोलन ने एक सृजनशील शक्ति में बदल दिया। संस्कृति और कला अकाल तथा निराशा से संघर्ष का साधन बन गए। यह नोट करने लायक तथ्य है कि इप्टा का जन्म इसी दुर्भिक्ष के दौरान हुआ जब साहित्य, कला, कहानी, कविता, गीतों के जरिए सृजनशीलता फूट पड़ी और जनगण को एक बेहतर कल के लिए गोलबंद किया जा सका।
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान कामरेड पी.सी.जोशी क्रांतिकारी जनांदोलन के निहित बुद्धिजीवी के रूप में उभर आए।

(का. अनिल राजिमवाले)

बाबरी मस्जिद का ध्वंस एक राष्ट्रीय विश्वासघात

नयी दिल्लीः लोकसभा में भाकपा के नेता गुरुदास दासगुप्त ने लिब्रहान अयोध्या जांच आयोग की रिपोर्ट तथा सरकार द्वारा की गयी कार्रवाई के मेमोरंेडम पर हुई बहस में भाग लेते हुए कहा:
मैं समझता हूं कि बहस को नियंत्रित होना चाहिए और हमें उस विपदा पर जो घटित हुई, एक सामान्य दृष्टिकोण प्रतिबिंबित करना चाहिए जो 17 वर्ष पहले घटित हुई। मैं इसे बहस नहीं कहता हूं। मैं इसे इस बात पर विचार करने के लिए एक आत्मनिरीक्षण कहता हूं कि क्यों ऐसी विपदा ने 6 दिसम्बर 1992 को देश पर भारी आघात किया जैसा भारत के इतिहास में कभी नहीं हुआ। हम विचार करें कि ऐसा क्यों हुआ। संसद का सत्र चल रहा था, बहुमत के साथ एक सरकार मौजूद थी जिसका नेतृत्व एक धर्मनिरेपक्ष पार्टी कर रही थी। सुप्रीम कोर्ट भी था। मेरा सवाल है कि एक ऐसी स्थिति में क्यों एक कट्टरतावादी राजनीतिक ताकत राष्ट्र पर अपनी इच्छा थोप सकी जबकि जनता का विशाल बहुमत उस खास धारा की राजनीतिक विचारधारा का विरोध करता था। क्यों उस महाविपदा को रोका नहीं जा सका? क्यों राजनीतिक व्यवस्था विफल हो गयी? व्यवस्था में अंतर्निहित कमजोरी क्या है जिसके चलते यह विफलता हुई और राजनीतिक महाविपदा आयी जिसने देश को प्रभावित किया?
हमें बड़ी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ी, हमारी राष्ट्रीय नीतियां प्रभावित हुई। इस सदन में बोलते हुए मैं काफी आहत महसूस कर रहा हूं क्योंकि मुझे उस घातक घटना को संक्षेप में दोहराना पड़ रहा है जो 6 दिसम्बर 1992 को घटित हुई थी।
मुझे काफी दुख है कि बाद की अवधि में पूरा देश महासंकट में फंस गया। देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे पर गंभीर हमला किया गया। यह अत्यधिक अफसोस की बात है कि राष्ट्र को दिये गये आश्वासन का घोर उल्लंघन किया गया। न्यायपालिका को गुमराह किया गया, सरकार के साथ जो उस समय सत्ता में थी, छल किया गया। लेकिन सवाल है कि क्यों उस समय की सत्तासीन सरकार ने अपने को छलने दिया। मैं समझता हूं कि उस समय केन्द्र में सत्तासीन सरकार ने वह काम नहीं किया जो उसे पूर्व प्रहारक कार्रवाई के रूप में करना चाहिए था। दुर्भाग्य से, रिपोर्ट में केन्द्र सरकार की भूमिका के बारे में कोई उल्लेख नहीं किया गया है। इसलिए यह रिपोर्ट व्यापक नहीं है और एक तरह से आंशिक है। मुझे यह कहते हुए शर्म हो रही है कि बाबरी मस्जिद का ध्वंस गंुंडागर्दी की स्वतःस्फूर्त अभिव्यक्ति की कार्रवाई नहीं थी। यह एक धूर्ततापूर्ण योजना का परिणाम था जिसका एक घृणित राजनीतिक एजेंडा था। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि बाबरी मस्जिद, रामजन्मभूमि एक मसला नहीं था, 1975 तक तो वह कोई मसला नहीं था। उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा की कार्यवाहियों में उसका कोई उल्लेख नहीं है। किसी तरह कुछ खास राजनीतिक इरादे के लिए इस मसले को उठाया गया। अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा कर ने के लिए देश की एक बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ साठगांठ करके कट्टरतावादी ताकतों की मंडली द्वारा उसे ध्वस्त कर दिया गया। दुर्भाग्य से, मुझे क्षमा करेंगे, उस घातक नाटक के कुछ खिलाड़ी आज इस सदन में हमारे सहयोगी हैं। 1992 में मैं राज्यसभा का एक सदस्य था। मैं 1985 में संसद में आया। मैं यह देखते बूढ़ा हो गया हूं कि राजनीति को प्रदूषित किया जा रहा है। मैं यह भी पा रहा हूं कि कैसे राष्ट्रीय हित को सांप्रदायिक विभाजन के दर्शन, घृणा के मत तथा हिंसा के सिद्धांतों के अधीनस्त किया जा रहा है। मैंने 1992 में राज्यसभा में बहस में हिस्सा लिया था। मैंने वरिष्ठ सहयोगी श्री आडवाणी जी से साफ पूछा था कि क्या उन्होंने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त करना चाहा था। जहां तक मुझे याद है, उनका जवाब था नहीं। उन्होंने कहा कि वे ढांचे को स्थानांतरित करना चाहेंगे ताकि राम मंदिर स्थापित किया जा सके।
मुझे याद है कि मैं किसी भी सांसद से पहले अयोध्या गया था। वह बुधवार का दिन था। रविवार को वह त्रासदी हुई थी और मैं बुधवार को गया था। मैंने पाया कि न केवल ढांचे को ध्वस्त किया गया बल्कि उस ढांचे यानी बाबरी मस्जिद के हर चिन्ह को मिटा दिया गया। मलबे तक को हटा दिया गया। फिर कामचलाऊ मंदिर तक निर्मित कर दिया गया, हो सकता है, राम मंदिर। मैं नहीं जानता। मैंने स्थानीय लोगों से भेंट की। दोनों समुदायों के लोग थे। उन्होंने मुझसे कहा कि ढांचे ध्वंस में उनका कोई हाथ नहीं था, बाहरी लोगों ने यह दुष्कृत्य किया, वे गाड़ियों से आये थे। मुझे तीन पैराग्राफ को उद्धृत करने दें जो उस घटना के बारे में बताता है। इसे मैंने एक प्रमुख पत्र में 17 वर्ष पहले लिखा था। ‘उस दिन रविवार की सुबह करीब 11 बजे सुबह मस्जिद के गिर्द बैरिकेेड पर हमला हुआ। कुछ घंटे के भीतर भीड़ ने कुछ आंसू के गैस के गोले तथा हल्के लाठीचार्ज पर भी काबू पा लिया जब वे ढांचे के अंदर घुसे और गुम्बद पर प्रहार करना एवं तोड़ना शुरू कर दिया जो ढांचा 400 वर्षों से खड़ा था। वह टुकड़े-टुकड़े होने लगा क्योंकि वे हाथ जो हमला कर रहे थे, वे सभी ध्वंस के लिए प्रशिक्षित थे।’
मैंने 17 वर्ष पहले लिखे जो आयोग ने आज कहा। मैं उद्धृत करता हूं।
”12 बजे दोपहर तथा 1 बजे दोपहर के बीच स्थानीय प्रशासन ने राज्य मुख्यालय से निर्देश मांगा और पैनिक संदेश लखनऊ भेजा गया। जिला मजिस्ट्रेट को सीआरपीएफ को लामबंद करने की सलाह दी गयी। क्योंकि व्यापक रोडब्लाक ने अतिरिक्त कर्मियों की आवाजाही पर रोक दी। किसी भी समय बाबरी मस्जिद पर हमले को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
जबकि तथाकथित कारसेवाकों का बड़ा दस्ता धार्मिक शो चलाता रहा। दूसरे दस्ते ने मस्जिद पर हमला किया और तीसरे दस्ते ने जो अत्यधिक दुखद है, उस क्षेत्र में अल्पसंख्यक समुदाय के घरों पर हमला किया। मस्जिद ध्वस्त कर दी गयी, मंदिर निर्मित किया गया तथा मुसलमालनों के सभी मकानों को ध्वस्त कर दिया गया। इनमें किसी ने भी कारसेवकों का प्रतिरोध नहीं किया।“
यह तस्वीर रिपोर्ट नहीं है। रिपोर्ट में घृणित कहानी दफना दी गयी है कि कैसे एक स्थानीय मसला देश के राष्ट्रीय विवेक पर एक धब्बा हो गया। स्थानीय विवाद वक्फ बोर्ड और रामचन्द्र दास तथा उनके अखाड़ा के बीच था। विश्व हिन्दू परिषद द्वारा अपने हाथ में लेने के पहले वह कोई मसला नहीं था। 1980 में विश्व हिन्दू परिषद ने उसे अपने हाथ में लिया। 1982 में विश्व हिन्दू परिषद ने उसे मुक्त करने की अपील की। किसे मुक्त किया जाये? एक मस्जिद के विध्वंस पर मंदिर को मुक्त किया जाये। 1984 में विश्व हिन्दू परिषद के युवा संगठन ने जो बजरंग दल के रूप में सामने आ चुका था, आंदोलन को एक नयी गति प्रदान की। 1985 में विश्व हिन्दू परिषद ने पचास लाख कैडर बनाने का निर्णय लिया जिसे रामभक्त का नाम दिया गया।
देश में एक मिलिटेंट ढांचा निर्मित करने का इरादा व्यक्त किया गया जो राष्ट्र की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद को चुनौती देगा।
1989 में भाजपा की एक बैठक पालमपुर में हुई। वह एक सुंदर जगह थी। उन्होंने क्या निर्णय लिया? उन्होंने उस लड़ाई में कूदने तथा आंदोलन में भाग लेने का निर्णय लिया। उस समय दो मुहावरे ईजाद किये गये। एक मुहावरा है ”अल्पसंख्यक तुष्टीकरण“ और दूसरा है ”छद्म धर्मनिरपेक्षतावाद“। इस तरह से देश का ध्रुवीकरण करने के निश्चित उद्देश्य से एक राजनीतिक आंदोलन का जन्म हुआ।
दो अन्य कारकें को ध्यान में रखा जाना चाहिए। फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला कोर्ट ने यह व्यवस्था दी कि द्वार को खोल देना चाहिए ताकि पूजा की जा सके। यह अभी तक रहस्य ही बना हुआ है कि उस समय सरकार क्यों नहीं द्वारा पर खोलने पर रोक लगाने के लिए हायर कोर्ट गयी। क्या उसके पीछे कोई राजनीतिक इरादा था? क्या कट्टरतावादी तबके को रिआयत देने के लिए ऐसा किया गया या क्या कुछ अन्य राजनीतिक पार्टी को निरुत्तर करने के इरादे से ऐसा किया गया?
शिलान्यास किया गया। यह कैसे किया गया। यह सुविदित है। इसने मुक्ति आंदोलन को गति प्रदान की। जनवरी 1986 में धर्मसंसद ने शिलापूजा के लिए एक योजना बनायी। इस तरह से एक सांप्रदायिक टकराव की जानबूझकर योजना बनायी गयी। एक राजनीतिक दल के साथ मिलकर राजनीतिक ताकतों के एक ग्रुप ने इसे संगठित किया और भाजपा की भागीदारी ने आंदोलन को ताकतवर तथा प्रभावी बना दिया। रिपोर्ट क्या कहती है? रिपोर्ट कहती है: एक आंदोलन के लिए भी इसकी कल्पना नहीं की जा सकती है? ”मुझे एक व्यक्ति का नाम लेना है जो सदन में उपस्थित नहीं है। मैं रिपोर्ट को उद्धृत कर रहा हूं।“
रिपोर्ट कहती है: ”एक आंदोलन के लिए इस बात की कल्पना नहीं की जा सकती है कि मेरे वरिष्ठ सम्मानित भारत के नेता जिनका मैं सम्मान करता हूं, अटल बिहारी वाजपेयी, मेरे वरिष्ठ सहयोगी श्री आडवाणी, श्री जोशी संघ परिवार के इरादे को नहीं जानते थे।“ रिपोर्ट कहती है कि यह विश्वास नहीं किया जा सकता है? इसका अर्थ है? आंदोलन का राजनीतिक नेतृत्व इस बात से अवगत था कि उनका गंतव्य कहां है। वे सभी अपने लक्ष्स से अवगत थे, अपने उद्देश्य से अवगत थे जो उनके दिमाग में था। इसे सार्वजनिक नहीं बनाया गया बल्कि वह उनके दिमाग में था।
रिपोर्ट के अनुसार, ”यह एक संयुक्त आम उद्यम था“ मैं उनके मुहावरे का इस्तेमाल कर रहा हूं। कौन साझेदार थे? वे थे आर.एस.एस., विहिप, शिवसेना, भाजपा तथा बजरंग दल। यह सुविदित है। अब यह रिपोर्ट में है जो विलंब से पेश की गयी और दूसरे सदन में किसी ने कहा कि इस आयोग पर पैसा बर्बाद किया गया। यह राजनीतिक मसले को कम करके आंकने का एक तरीका है।
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री की इसमें सांठगांठ थी। वे इस बात के लिए मुस्तैद थे कि केन्द्र सरकार द्वारा या सुप्रीम कोर्ट द्वारा कोई पूर्व प्रहारक कार्रवाई न हो। इसका अर्थ है? कानून प्रवर्तन एजेंसी का कैप्टन स्वयं एक धर्मयोद्धा हो गया और स्वयं उस अपराध का सहभागी हो गया। एक सभ्य विश्व में इससे अधिक भयावह और क्या हो सकता है? इसे हमारे विवेक को झकझोर देना चाहिए। आंसू बहने चाहिए। हमें अवश्य ही इस त्रासदी की गहराई तथा उसके आयाम में जाना चाहिए। यह बाबरी मस्जिद के खिलाफ धर्मयुद्ध नहीं है, यह कानून प्रवर्तन ऐजेंसियों की साठगांठ है, यह केन्द्र सरकार की विफलता है। यह सुप्रीम कोर्ट की विफलता है। यह राष्ट्र की विफलता है कि हम उसे रोक नहीं पाये। जब यह घटना घटी तो मैं उस समय सदन में था। हम प्रधानमंत्री के पास गये। हम चाहते थे कि सेना को भेजा जाये। भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि किसी संवैधानिक मर्यादा से अधिक महत्वपूर्ण है। दुर्भाग्य से कोई पूर्व प्रहारक कार्रवाई नहीं की गयी।
आंदोलन की तैयारी के लिए रथयात्रा संगठित की गयी। श्री आडवाणी उसके सूत्रधार थ। जानबूझकर कट्टरतावादी ताकतों, अंधराष्ट्रवादी ताकतों को मजबूत करने के लिए ऐसा किया गया। ऐसा एक अपराध को अंजाम देने के इरादे से किया गया। एक उन्माद पैदा करने के लिए ऐसा किया गया। रथयात्रा एक उन्माद था। अयोध्या में रास्ता को आसान बनाने के लिए ऐसा किया गया।
बाबरी मस्जिद पर हमले के पूर्व वहां एक तथाकथित धर्मानुष्ठान, धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। भजन गाये गये। क्या त्रासदी है? भारतीय संस्कृति द्वारा रचे गये महान भजन का अपने नारों तथा धर्मनिरपेक्ष भारत के खिलाफ मुहिम को छिपाने के लिए इस्तेमाल किया गया। वहां नेता उपस्थित थे। वे बोेले भाषण क्या थे? मस्जिद के ध्वंस के बचाव के लिए सभी भाषण दिये गये। यह कहा गया, उनके वहां राम का जन्म हुआ था। वहां मुस्लिम संप्रदायवादियों द्वारा मस्जिद की स्थापना की गयी। हमें अवश्य ही एक खास धर्म की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए उसे ध्वस्त करना चाहिए।
एक धार्मिक उन्माद फैलाया गया और पुलिस के साथ सांठगंाठ करके कायराना अपराध किया गया। आज विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं द्वारा इस कायराना कार्रवाई के वीरता की कार्रवाई कहा जा रहा है। इस तरह बड़ी ही धूर्तता से मस्जिद को ध्वस्त करने की योजना बनायी गयी। घृणित राजनीतिक प्रचार अभियान चलाया गया। शिला पूजा की गयी। रथयात्रा निकाली गयी और हजारों कारसेवक संगठित किया गये जिन्हें ध्वस्त करने के काम में प्रशिक्षित किया गया। उन सबों को गाड़ियों से, बसों से वहां लाया गया। राज्य सरकार ने अपनी आंखे मूंदी थी तो केन्द्र सरकार ने क्यों नहीं अपनी आंखे खोली?
इसलिए मैं इस सदन में सीधा सवाल करना चाहता हूं। 6 दिसम्बर 1992 को जो कुछ हुआ उनकी जिम्मेवारी एवं दोष को भी अपने ऊपर लें। उन लोगों के राजनीतिक साहस को भी देखें जिन्होंने चुनावी लाभ के लिए पुलिस तथा प्रशासन की साठगंाठ से कायराना ढंग से यह काम किया। दुर्भाग्य से भारतीय इतिहास यह दिखलाता है कि बाबरी मस्जिद के ध्वंस से उन्होंने अपनी चुनावी संभावना बढ़ायी। यह इतिहास का एक दुर्भाग्यपूर्ण हिस्सा है। या तो आप सभ्य जीवन के सभी मानदंडो के उल्लंघन की जिम्मेवारी लें और उसका बचाव करें या 1992 में जो कुछ हुआ, उसे अस्वीकार करें और राष्ट्र से क्षमा मांगे। यह सीमित विकल्प उपलब्ध है। कोई बीच का रास्ता नहीं हो सकता। या तो 6 दिसम्बर राष्ट्रीय विश्वासघात का दिन, ब्लैकमेल की कार्रवाई का दिन था या वीरता का दिन। देश को निर्णय करने दें। हम कब्र को नहीं खोद रहे हैं, किसी पुरानी चीज पर बहस नहीं कर रहे हैं। हम एक सबक लेने के लिए बहस कर रहे हैं। मैं उन नेताओं के खिलाफ किसी दंडात्मक कार्रवाई की वकालत नहीं कर रहा हूं जिन पर रिपोर्ट में दोषारोपण किया गया है। मैं समझता हूं कि राजनीतिक अलगाव एकमात्र उपाय है। यह समय है कि देश की सभी धर्मनिरेपक्ष ताकतें एकताबद्ध होने के लिए सबक लें। कांग्रेस पार्टी की एक जिम्मेवारी है यदि वह समझती है कि वह देश की एक सबसे बड़ी पार्टी है। पर एक चीज है। संप्रदायवाद के खिलाफ संघर्ष फलदायी नहीं हो सकता है यदि भूख के खिलाफ संघर्ष, बेकारी के खिलाफ संघर्ष को संयुक्त नहीं किया जाये।
इसीलिए देश को चैकस करने का यह समय है। देश को आयोग की रिपोर्ट के आधार पर चैकस किया जाना है। यह कट्टरतावाद क्या है और आज यह किससे संबंधित है? कट्टरतावाद ने महात्मा गांधी की हत्या की। वही कट्टरतावाद है जिसने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त किया जिन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की वे उसी राजनीतिक श्रेणी या दर्शन से संबद्ध है जो बाबरी मस्जिद के ध्वंस के लिए जिम्मेदार है, उसी कट्टरतावाद के ब्रांड से संबंद्ध है जिन्होंने गुजरात में हजारों लोगों का कत्ल किया।
मैं यहां कहना चाहता हूं कि कट्टरतावाद का खतरा खत्म नहीं हुआ है। यह एक बड़ा खतरा बना हुआ है। इसलिए कार्रवाईगत एकता की जरुरत है। रिपोर्ट एक चेतावनी देती है और इस चेतावनी से एक बोध होना चाहिए और इस बोध को कार्रवाई में परिणत होना चाहिए। रिपोर्ट के बाद एकताबद्ध होने एवं ऐसी ताकतों को पराजित करने की चिन्ता होनी चाहिए। यह चिन्ता की बात है कि ध्वंस करके तथा अपराधिक कार्रवाई करके राजनीतिक ताकतों ने अपनी शक्ति बढ़ायी।
हमें अवश्य ही पीछे की ओर देखना चाहिए, हमें अवश्य ही विचार करना चाहिए। हमें एक आलोचनात्मक विश्लेषण करना चाहिए कि क्यों मस्जिद को ध्वस्त किया गया, राजनीतिक पार्टियों की क्या भूमिका थी, केन्द्र सरकार की क्या भूमिका थी। देश को आगे बढ़ना चाहिए एवं पूरी गरिमा तथा निष्ठा के साथ हर कीमत पर देश की धर्मनिरपेक्ष छवि की रक्षा की जानी चाहिए।

Thursday, 17 December 2009

बैंक कर्मचारियों द्वारा प्रतिगामी आर्थिक नीतियों के खिलाफ संसद पर जुझारू प्रदर्शन


दिल्ली: देश के बैंक कर्मचारी आन्दोलन की यह परिपाटी रही है कि इस क्षेत्र में काम करने वाले हमारे साथी न केवल अपने वेतन और सेवाशर्तों के लिए जुझारू कार्रवाईयों में उतरते रहे हैं बल्कि देश की आम जनता से संबंधित मुद्दों पर भी उनके तेवर उतने ही जुझारू रहते हैं। जब उनके वेतन पुनरीक्षण पर सहमति पत्र पर हस्ताक्षर हो चुके थे, कुछ इन्हीं जुझारू तेवरों के साथ बैंकों के राष्ट्रीयकरण की रक्षा के लिए 3 दिसम्बर को सुबह से ही तमाम राज्यों से आ रहे एआईबीईए और एआईबीओए के साथियों का राम लीला मैदान पहुंचना शुरू हो गया था। साढ़े दस बजे तक हजारों की संख्या में बैंक कर्मचारी राम लीला मैदान पहुंच चुके थे। हर प्रदर्शनकारी के चेहरे पर जोश एवं उत्साह तथा निष्ठा एवं विश्वास झलक रहा था जोकि बैंक कर्मचारी आन्दोलन का ट्रेडमार्क है। वे राज्यवार अपने-अपने संगठनों के बैनर के पीछे कतारबद्ध होकर संसद की ओर कूच के लिए तैयार हो रहे थे। वे देश के कोने-कोने से और सभी राज्यों से आये थे। देश के सुदूर पूर्व - इंफाल एवं गंगटोक से लेकर पश्चिम - राजकोट एवं जामनगर तक तथा उत्तर में कश्मीर की पहाड़ियों से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक का वे वास्तविक प्रतिनिधित्व कर रहे थे। जुलूस में अंशकालिक सफाईकर्मी, चपरासी, लिपिक एवं अधिकारी सभी एक दूसरे के कंधे से कंधा मिला कर गगनभेदी नारे लगाते हुए रामलीला ग्राउन्ड से कूच किए। जुलूस में ऐसे प्रदर्शनकारी भी थे जिन्हें दिखाई नहीं देता लेकिन संगठन के आह्वान पर तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए वे दिल्ली पहुंचे थे। जुलूस का पहला हिस्सा जब सभा स्थल पार्लियामेन्ट स्ट्रीट पर दाखिल हो चुका था, उस समय उत्तर प्रदेश एवं दिल्ली के साथी रामलीला ग्राउन्ड पर अपनी बारी की प्रतीक्षा कर रहे थे। जुलूस से विशालकाय दृश्य से ही दिल्ली पहुंचे प्रदर्शनकारियों की संख्या का पता चलता है।
संसद मार्ग पहुंच कर जुलूस आम सभा में परिवर्तित हो गया। आमसभा को बैंक कर्मचारियों के नेताओं के अलावा सम्बोधित करने वालों में प्रमुख थे - भाकपा के उप महासचिव का. सुधाकर रेधी, भाकपा के राष्ट्रीय सचिव का. गुरूदास दासगुप्ता, का. डी. राजा तथा का. अमरजीत कौर, भाकपा के राज्य सभा सांसद का. आर.सी. सिंह, डब्लूएफटीयू के उप महासचिव का. एस. महादेवन, एटक के एचिवगण का. जी.एल.धर एवं का. डी.एल. सचदेवा एवं उपाध्यक्ष का. एस.एस.त्यागराजन, इंटक के अध्यक्ष डा. संजीव रेधी, माकपा नेता का. सीता राम येचुरी तथा बासुदेव आचार्य, बीएमएस के उपाध्यक्ष सुब्बाराॅव, सीटू के सचिव का. तपन सेन, एआईयूटीयूसी के महासचिव आर.के.शर्मा, टीयूसीसी के महासचिव एस.पी.तिवारी आदि। वक्ताओं ने एआईबीईए और एआईबीओए के नेतृत्व एवं सदस्यों को बैंकों के राष्ट्रीयकरण की रक्षा के लिए संघर्ष करने के लिए बधाई दी और सहयोग का वायदा किया।

सायंकाल एक प्रतिनिधिमंडल वित्तमंत्री से मिला और उन्हें एक ज्ञापन दिया। इस मुलाकात के दौरान भाकपा के सचिव का. गुरूदास दासगुप्ता एवं का. डी. राजा भी मौजूद थे। प्रतिनिधि मंडल में का. सी.एच.वेंकटाचलम, का. राजेन नागर, का. आलोक खरे, का. एस. नागराजन, का. विश्वास उतंगी तथा का. पी. बालाकृष्णन शामिल थे। प्रतिनिधि मंडल ने सरकार द्वारा चलाये जा रहे तथाकथित बैंकिंग रिफार्म के कदमों के खिलाफ अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया तथा इन प्रतिगामी कदमों को वापस लेने की जोरदार मांग की।

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट