Saturday, 16 January 2010

डाॅ. रशीद जहाँ और प्रगतिशील आन्दोलन

रशीद जहाँ और प्रगतिशील आन्दोलन एक ही तस्वीर के दो पहलू - कि दोनों को अलग करके देखा नहीं जा सकता, परन्तु यह कहना मुश्किल है कि रशीद जहाँ जो कुछ थीं, उसे प्रगतिशील आन्दोलन ने बनाया, सच यह है कि इस आन्दोलन ने उन्हें एक नया जोश और दृष्टिकोण ज़रूर दिया वर्ना तरक़्क़ीपसन्दी, रौशनख्याली और आजादी तो वह अपनी विरासत में, बल्कि खून में लेकर आयी थीं। उनके पिताा शेख़ अब्दुल्ला न सिर्फ आजाद ख्याल, बल्कि औरतों की शिक्षा के बड़े हामी थे। वह औरतों में जागृति लाने के लिए बाक़ाइदा ‘खातून’ नाम की पत्रिका निकालते थे। अलीगढ़ कालेज में औरतों का विभाग खुलवाने का सेहरा भी उन्हीं के सर जाता है। रशीद जहाँ की माँ वहीद जहाँ बेगम जो आला बी के नाम से मशहूर थीं, उन्होंने मदरसे की बुन्याद में अपने पति की बड़ी मदद की, वह भी औरतों की शिक्षा की बड़ी हामी थीं। आला बी के भी बड़े कारनामे हैं, गरज़कि रशीद जहाँ का पूरा खानदान, ता’लीम, औरतों की शिक्षा, आजादी और रौशनख्याली का बड़ा हामी था। और उनकी हिमायत केवल जबानी न थी, बल्कि अमली सतह पर इसके बड़े कारनामे हैं जिसकी एक अलग तारीख है। ऐसे ही माँ-बाप की बड़ी बेटी थीं रशीद जहाँ, जिन्होंने एक बार खुद कहा था, ”हमने तो जब से होश संभाला, हमारा तो तालीमे-निस्वाँ का ओढ़ना है और तालीमे-निस्वाँ का बिछौना।“
शिक्षा बुन्यादी शै जरूर है, लेकिन शिक्षा के साथ तबीयत और उस तबीयत को वक्त की मांग और जमाने के तकाजे के साथ मुल्क व मुआशरत और इन्सानियत के हवाले से एक विज़न और फिर मिशन का रूप दे देना बिलकुल अलग और गैरमा’मूली बात है। रशीद जहाँ के साथ और भी लड़कियाँ रही होंगी, खुद उनकी बहनें, लेकिन उनमें कोई रशीद जहाँ न बन सकी। यहीं से अकेलेपन, नाफर्मांनी और सोची-समझी सरकशी व बगावत के सिलसिले शुरू होते हैं। आखिर क्या कारण है कि अभी वह अलीगढ़ में ही थीं और उनकी उम्र चैदह साल की ही थी कि वह बकाइदा मुल्क व कौम से दिलचस्पी लेने लगी और कौमी तहरीक से आकर्षित हुईं। गाँधीजी के करीब हुईं और बाकाइदा खद्दर पहना। इन सब चीजों को उस समय और रौशनी मिली जब 1923 में अलीगढ़ छोड़कर लखनऊ आयीं जहाँ उन्होंने इज़बेला थाबर्न काॅलेज में एडमिशन लिया ताकि वह डाॅक्टरी पढ़ सकें। लखनऊ के लगभग खुले माहौल में उन्हें अलग-अलग किस्म की किताबों पढ़ने का शौक हुआ जिसमें साहित्यिकता खास विषय था। इसी उम्र और इसी जमाने में उन्होंने अंग्रेजी में एक कहानी ‘सलमा’ लिखी जो बाद में उर्दू में भी छपी। 1923 में महज अठारह साल की उम्र और प्रगतिशील आन्दोलन के लगभग तेरह साल पहले लिखी गई कहानी में केवल औरत की लाचारी ही नहीं, बल्कि जागृति का एक पैगाम था। लखनऊ से निकल कर वह देहली आ गयीं, जहाँ वह 1924 से लेकर 1929 तक लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज की छात्रा रहीं। वह केवल डाॅक्टरी की शिक्षा नहीं हासिल कर रहीं थीं, बल्कि समाज के दूसरे पहलूओं पर भी नजर रखती थीं। हमीदा सईदुज़्ज़फर कहती हैं:
”उनका रूज्हान फ़ितरी तौर पर तिब के अमली और समाजी पहलुओं की ओर ज़्यादा था। वह एक मिसाल से वाज़ेह हो जायेगा। वह मेडिकल काॅलेज के चैथे साल की तालबा थीं कि एक नौजवान लड़की अस्पताल के ‘शोबए-अमराजे़-चश्म’ में दाखिल हुई। दरअस्ल उसकी आँखों में कोई ख़राबी नहीं थी, लेकिन उसने अपनी आँखों में कुछ ऐसी चीज़ें डाल ली थीं कि जिनके सबब उसे अस्पताल में दाखिल कर लिया गया था। जल्द ही वह अच्छी हो गयी, लेकिन उसने अस्पताल छोड़ने से इन्कार कर दिया। जब उसे मज्बूर किया गया, तो वह रशीदा के पास आयी और उनसे बताया कि वह किसी तरह घर से भाग कर आयी है और बाप उसे परेशान करता रहता है। अतः उसने तै कर लिया है कि वह अब यहाँ से कहीं और चली जायेगी। उसकी दर्दनाक कहानी सुनकर रशीद इतना मुतस्सिर हुईं कि फ़ौरन ही शाम की गाड़ी में उसे लेकर अलीगढ़ चली आयीं। यहाँ आला बी ने उसे अपनी निगरानी में रखा, यहाँ तक कि वह अपने पैरों पर खड़ी होने के क़ाबिल हो गयी।“
एम.बी.बी.एस. करने के बाद उन्हें जल्द ही सरकारी नौकरी मिल गयी और वह कानपुर, बुलन्दशहर होते हुए लखनऊ में तैनात हुईं। सज्जाद ज़हीर उन दिनों शिक्षा प्राप्ति के लिए लन्दन में रहते थे और छुट्टियों में लखनऊ आये हुए थे, अतः यहीं रशीद जहाँ की मुलाकात सज्जाद ज़हीर, सईदुज़्ज़फ़र, अहमद अली आदि से हुई। यह मुलाकात ‘अंगारे’ के संस्करण और उसके बाद के हादिसात महज इत्तिफाकात न थे, बल्कि इन सब के पीछे नौजवानों के जेहन में परवरिश पाए हुए वे ख्यालात थे जो बचपन से ही उन्हें इन्सानियत के लिए बेचैन किये हुए थे। रशीद जहाँ का यूँ इतनी जल्दी और निडरपन के साथ ‘अंगारे’ के ग्रुप में शामिल हो जाना और दो अहम लेखन के जरिए उसकी छपाई में शामिल होना सब कुछ अपने आप न था, बल्कि इसके पीछे खुद रशीद जहाँ की अपनी व्यक्तिगत सोच व फ्रिक्र, रूज्हान व तबींयत काम कर रही थी। इन दोस्तों से मुलाकात ने उसे और ज्यादा बढ़ावा दिया और वह निडर होकर इस आग में कूद पड़ीं। ‘अंगारे’ के साथ जो हादिसा हुआ और उसकी जो प्रतिक्रिया हुई, उसकी भी अपनी एक तारीख है। लेकिन उसका एक दिलचस्प और अर्थपूर्ण पहलू यह भी है कि सज्जाद ज़हीर, अहमद अली की कहानियों के मुकाबले रशीद जहाँ की कहानियों की धार उतनी तेज न थी, जितनी कि उन्हें कठिनाई पहुँचाने की कोशिश की गई। रशीद जहाँ अँगारे-वाली के खिलाफ फतवे, फैसले और जान से मार डालने की धमकी आदि-आदि।
जाहिर है, इसके पीछे कमजोर व नासमझ लोगों की खराब भावना तो काम कर ही रही थी, सदियों के मर्दाना समाज की झूठी शान व शौकत काम कर रही थी और खोखली सामुदायिक संस्कृति का चुरमुराता हुआ निज़ाम भी हिचकियाँ ले रहा था। रशीद जहाँ शुरू से ही इन पहलुओं पर गौर करती आयी थीं। अच्छी शिक्षा, संस्कार और खुद उन की तबीयत ने उन्हें बेबाक और निडर बना दिया था। अतः वह इस हादिसे से बिल्कुल न डरीं। बेख़ौफ़ होकर घूमती रहीं। हाजरा बेगम लिखती हैं:
”‘अंगारे’ शाए करते समय खुद सज्जाद ज़हीर को अन्दाजा नहीं था कि वह एक नई अदबी राह का संगेमील बन जायेगा। वह ख़ुद तो लन्दन चले गये, लेकिन यहाँ तहलका मच गया। पढ़ने वालों की मुखालफत इस कदम बढ़ी कि मस्जिदों में रशीद जहाँ-अँगारे वाली के खिलाफ वाज़ होने लगे..... फतवे दिये जाने लगे और ‘अंगारे’ जब्त हो गयी। उस वक्त तो वाकिई ‘अंगारे’ ने आग सुलगा दी थी।“
‘अंगारे की छपाई और हँगामा महज़ एक समाजी हादिसा न था। हाजरा बेगम का कहना है:
”आज ‘अंगारे’ पढ़ कर इस तरह ताज्जुब होता है जैसे डी.एच.लाॅरेन्स की किताब ‘वेल आॅफ लवलीनेस’ को पढ़ कर कि किताब ने क़यामत बरपा कर दी थी।“
आखिर कोई बात तो थी कि एक तरफ ‘अंगारे’ के खिलाफ आग सुलग रही थी, तो दूसरी ओर बाबाए-उर्दू मौलवी अब्दुल ह़क उस पर प्रशंसनीय टिप्पणी कर रहे थे। मुंशी दयानारायण निगम ने भी ‘जमाना’ में प्रशंसनीय टिप्पणी की:
”चार नौजवान मुसन्निफों ने, जिनमें एक लेडी डाॅक्टर भी हैं, ‘अंगारे’ नाम से अपने दस किस्सों को किताबी सूरत में शाए किया। इनमें मौजूदा जमाने की रियाकारियों पर रौशनी डालने, मुरव्विजा रस्म व रिवाज की अन्दरूनी खराबियों को बेनकाब करने की कोशिश की गई थी। हमारे नाम-निहाद आला तबके की रोजमर्रा मआशरत के नकायस का मज़ह़का उड़ाया गया था। गो इस मज्मुए का तर्जेबयान अक्सर मकामात पर सूकयाना था, जो मजाक़े-सलीम को खटकता था, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि नौजवाने-आलम ने दुन्या में जो अलमे-बगावत बलन्द कर रखा है, उसी का एक अदना करिश्मा इस किताब की इशारा है।“
‘अंगारे के विरोध में जितना लिखा गया, इसके पक्ष में बहुत कम, लेकिन इसके बावजूद ये कहानियाँ बड़ा काम कर गयीं और उर्दू कहानी के इतिहास में मील का पत्थर बन गयीं।
‘अंगारे’ के पब्लिशर सज्जाद जहीर थे, जिन्होंने कहा था- ‘समाजी रज्अत परस्ती और दकियानूसियत के खिलाफ गुस्सा और हैजान का बेबाकाना इज़्हार था।’ अहमद अली ने भी अगस्त 1934 के ‘साकी’ में एक लेख लिखा था:
”कुछ अर्सा हुआ जब चन्द लोगों ने उर्दू की ज़िन्दगी में शायद पहली मर्तबा सही मज़्मून में ओरिजिनल अफ़साने लिखकर अपने मुल्क की मौजूदा दिमागी, रोेमानी, मुआशरती और अख़्लाक़ी जिन्दगी की असलियत को पेश किया, तो लोगों ने वो हाय-तौबा मचाई कि कुछ अर्सा तक कान पड़ी आवाज तक सुनाई न देती थी, क्योंकि लोगों के कान, आँखें और दिमाग झूठ के आदी हो चुके थे। वे हकीकत की इस इस तेज रौशनी को बरदाश्त न कर सके जो आँखों को चकाचैंध कर देती और दिमाग को हिला देती है।“
प्रोफेसर कमर रईस ने बड़े अच्छे अन्दाज में कहा है:
”यह नई नस्ल ज्यादा सरकश, बेबाक और खुद आगाह थी, मार्क्सिज्म या इश्तेराकियत ने इसे इन्सानी समाज और उसके मसाइल के इदराक व शुऊर की जो सलाहियत दी थी, उसकी बुन्याद साइंसी और अक़्ली तरीके़कार पर थी। हरचन्द कि यह बसीरत जो अभी अपने बिल्कुल इब्तिदाई मर्हले में थी, नौजवानों के जोश में दबी हुई थी। ताहम वे एक रौशन और वाज़ेह शुऊर की तरफ बढ़ रहे थे।“
इन तहरीरों की रौशनी में ‘अँगारे’ की इशाअत और उसकी ऐतिहासिक व साहित्यिक अहमियत का अन्दाजा हो जाता है। जैसा कि कहा गया कि इन तहरीरों की गाज सबसे ज्यादा रशीद जहाँ पर गिरी, लेकिन वह निडर औरत थीं। इन धमकियों और विरोध ने उनकी हिम्मत, फिक्र व नजर को और ज्यादा मजबूती व बढ़ावा दिया और वह अपनी तमाम मसरूफ़ियत के बावजूद अफ़साने लिखती रहीं और इस तरह उनका पहला संग्रह ‘औरत’ 1937 में लाहौर से निकला। लेकिन इससे पहले भी बहुत कुछ हो गया। ‘अंगारे’ के नफरत भरे हंगामों के बीच मुहब्बत का फूल खिला रशीद जहाँ और महमूदुज़्ज़फ़र एक दूसरे के करीब आये और 1934 में शादी कर ली।
‘औरत’ संग्रह में इनकी एक कहानी ‘सौदा’ है जो बेबाक और खतरनाक कहानी है। एक जगह पर इस तरह के वाक्य आते हैं:
”जान! यहाँ बुर्का उतार दो - यहाँ कौन बैठा है?“ उन मर्दों में से एक ने कहा, ”क्यूं प्यारी, एक बोसा दोगी?“ की सख्त आवाज एक अर्सा के बाद मेरे कानों में आयी, ”ए हे हम आये काहे को हैं - तुम लोगे तो हम देंगे।“ एक बुर्कापोश ने जिसकी आवाज बिल्कुल बेहिस और मुर्दा थी, जवाब दिया।
इन वाक्यों से उन औरतों को जिन्हें आज की ज़बान में सेक्स वर्कर कहा जाता है, की तस्वीर सामने आती है। यहां पर उनकी आवाज की बेहिसी और मुर्दनी बड़ी अर्थपूर्ण है और साथ ही बुर्का को लाकर पर्दा की जिस खास सभ्यता का मजाक उड़ाया गया है, उसकी तरफ नंगा इशारा है। और कहानी ज्यादा समझ में भी आती है। इस दौर तक रशीद जहाँ ने इश्तेराकियत को पढ़ जरूर लिया था, लेकिन अनुभव फिर भी सीमित था। हाजरा बेगम ने लिखा है कि वह मजदूर को एक मरीज की हैसियत से ज्यादा जानती थीं, साथ लड़ने वाले दोस्त की तरह नहीं। मार्क्सिज्म की थ्योरी को उन्होंने जरूर पढ़ा था, लेकिन उनको अमलीजामा पहनाने का उन्हें मौका नहीं मिला था। शायद इसीलिये उनकी शुरू की कहानियों में कुछ कमी का एहसास होता है। इस कहानी की नंगी वार्ता इसका उदाहरण है। लेकिन इनकी बाद की कहानियों में इस कमी का एहसास रूख्सत होता जाता है और एक खास किस्म की दार्शनिक मजबूती ही नहीं, फ़न्नी चाबुकदस्ती और दृढ़ किरदारसाजी नजर आने लगती है। ये सब यूं ही नहीं होता, जल्द ही फिक्र व अमल की वह मंजिल आती है, जब वह दोबारा सज्जाद जहीर और उनके दोस्तों से मिलती हैं और बाकाइदा प्रगतिशील आन्दोलन की बुन्याद रखने में बड़ा और अहम रोल अदा करती हैं।
सज्जाद जहीर शिक्षा पूरी करके इलाहाबाद वापस आ चुके थे, लेकिन इससे पहले लन्दन में ही प्रगतिशील लेखक संघ की बुन्याद डाल चुके थे और इसका मेनीफे़स्टो हिन्दुस्तान में अपने खास दोस्तों को भेज चुके थे। महमूदुज़्ज़फ़र और रशीद जहाँ उनके खास दोस्तों में थे। इलाहाबाद में वह फिराक गोरखपुरी और एजाज़ हुसैन से मिले, मेनीफेस्टो पर बात की और संघ का इरादा जाहिर किया। उन्हीं दिनों इलाहाबाद में हिन्दुस्तानी एकेडमी ने हिन्दी, उर्दू भाषाओं की एक कांग्रेस बुलाई जिसमें प्रेमचन्द, जोश, अब्दुल हक, दयानारायण निगम, रशीद जहाँ आदि इलाहाबाद आये, सज्जाद जहीर लिखते हैं:
”रशीद जहाँ अमृतसर से आयी थीं। हम चाहते थे कि इस इज्तिमा के मौके पर अदीबों से हमारी गुफ्तगू और बहसें हो और इनमें वह भी शरीक हों ताकि पंजाब जाकर वह वहाँ के अदीबों से हमारा राबिता काइम कर सकें। अब मुझे याद नहीं कि हम यानी रशीद जहाँ, अहमद अली, फिराक और मैं इस कान्फ्रेंस में आने वाले अदीबों में से किन-किन से मिले और उनसे क्या-क्या बातें हुईं? लेकिन मुंशी प्रेमचन्द से पहली मुलाकात मेरे दिल पर नक़्श है।
रशीद जहाँ जो सही तौर पर हिन्दुस्तानी एकेडमी की मेहमान थीं, इलाहाबाद पहुंच कर संघ के सम्बन्ध में मेज़बान बन गयीं। इस पूरे किस्से का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि अंग्रेजी साहित्य के मर्द उस्ताद अहमद अली ‘अँगारे’ के हंगामे से घबरा कर एकान्त की जिन्दगी बसर कर रहे थे और औरत रशीद जहाँ जो ‘अँगारे’ के हादिसे का सबसे ज्यादा शिकार हुईं, वह बेखौफ व निडर होकर आजादी से आन्दोलन व संघ के मुआमलात में पेश-पेश थीं। इलाहाबाद से ससज्जाद जहीर के घर पर मीटिंग में उनका अहम रोल था, खास तौर से मौलवी अब्दुल हक को बुलाने में उन्हीं का हाथ था। और मौलवी साहब मेनीफेस्टो पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति थे और इन्होंने एक बड़े काम का उपदेश भी दिया था - ‘ऐलान शाए’ करने, अन्जुमन बनाने और जल्से करने से ज्यादा जरूरी है कि हम उस अदब की तख्लीक के लिये मेहनत करें जो हमारे नजदीक सही और जरूरी है।’ प्रेमचन्द, जोश और अब्दुल हक के हस्ताक्षर ने पूरे हिन्दुस्तान के अदीबों को संघ के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया। हालात ही कुछ ऐसे थे। वक्त का मिजाज और तेवर भी संघ के हक और पक्ष में था।
जनवरी 1936 में सज्जाद जहीर पंजाब गये तो रशीद जहाँ और मजमूदुज़्ज़फ़र के मेहमान हुए और वहाँ के साहित्यकारों व शाइरों से मुलाकातें कीं। उन मुलाकातों में सब से दिलचस्प मुलाकात फै़ज़ से थी, अतः मुलाकात हुई। खामोश, शर्मीले फैज उन दिनों इस इश्क में मुब्तला थे और इश्किया शाइरी में शराबोर थे। एक दिन रशीद जहाँ ने डांटते हुए कहा, ‘यह क्या मामूली से इश्क में मुब्तला हो, इन्सानों से प्यार करो।’ यह कह कर उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी का मेनीफेस्टो और माक्र्स की किताब थमा दी। फैज ने जब उसे पढ़ा तो फैज का कहना है:
”यह किताब मैंने पढ़ी, बल्कि दो, तीन बार पढ़ी। इन्सान और फितरत, मर्द और मुआशरा, मुआशरा और तबकात, तबके और जराए-पैदावार की किस्म, जराए-पैदावार और पैदावारी रिश्ते, पैदावारी रिश्ते और मुआशरे का इर्तिका, इन्सानों की दुन्या के पेच-दर-पेच और तह-दर-तह रिश्ते-नाते, कद्रें, अकीदे, फिक्र व अमल वगैरह-वगैरह के बारे में यूं महसूस हुआ कि किसी ने इस पुरे खज़ीनए-असरार की कुंजी थमा दी। यूं सोशलिज्म और मार्कसिज्म से अपनी दिलचस्पी की शुरूआत हुई। फिर लेनिन की किताबें पढ़ीं - ये सब कुछ पढ़ कर, सुन कर हमने उस दूसरी तस्वीर में रंग भरने शुरू किये। एक आजाद, गैर तबकाती मुआशरे की तस्वीर - जहाँ कोई सरमायादार नहीं, कोई जागीरदार नहीं और कोई जमींदार नहीं। न कोई आका है, न कोई बन्दा, न कोई तलासे-मआश में सरगर्दा, न फिक्रे-फर्दा में गिरिफ्तार, जहाँ मजदूर, किसान राज करते हैं और हर मुआमला उनकी मर्जी से तय पाता है।“
फैज जो बाद में प्रगतिशील आन्दोलन के सबसे बड़े और प्रसिद्ध शाइर बन कर उभरे, उनको प्रगतिशील फिक्र और आन्दोलन की ओर आकर्षित करने का सेहरा रशीद जहाँ के सर जाता है। बाद में फैज, सज्जाद जहीर, महमूदुज़्ज़फ़र और रशीद जहाँ लाहौर भी गये और वहां के अदीबों, शाइरों से मिले और देखते-देखते उन नौजवानों की गैर मामूली कोशिशों से पंजाब प्रगतिशील अदीबों व शाइरों का बहुत बड़ा केन्द्र बन गया। ‘रौशनाई’ में सज्जाद जहीर लिखते हैं:
”हम खुश और मुत्मईन थे, रशीद फैज को छेड़ रहीं थीं। अब यह हज़रत भी किसी कदर पिघले और बोलने-चालने पर रजामन्द से मालूम हो रहे थे। लेकिन हम में से किसी को यह वहम व गुमान भी नहीं था कि लाहौर की अदब-परवर जमीन पर यह वह पहला लगजीदा कदम है जो बाद को उर्दू अदब के सुनहरे खोशों का अम्बार लगा देगा। चन्द साल के अन्दर-अन्दर यहीं से कृष्णनदर, फैज, बेदी, नदीम कासिमी, मिर्जा अदीब, जहीर काश्मीरी, साहिर लुधियानवी, इब्ने-अन्शा, मख्मूर जालन्धरी, आरिफ अब्दुल मतीन, रहबर, अश्क वगैरह जैसे शाइरों और अदीबों ने तरक्कीपसन्द अदब के अलम को इतना ऊँचा किया कि उसकी दरखशाँ बुलन्दियाँ हमारे वतन के दूसरे हिस्सों के अदीबों के लिए काबिले-रश्क बन गयीं।“
यह सही है कि यह संघ उस समय बना, जब इसकी आवश्यकता थी, लेकिन यह भी सही है कि अगर इन कुछ नौजवानों ने, जिनमें रशीद जहाँ भी थीं, गैर मामूली मेहनत और कमिटमेंट का सुबूत न दिया होता, तो यह पौधा आसानी से बर्ग व बार नहीं ला सकता था। रशीद जहाँ और मजमूदुज़्ज़फ़र के लिये सज्जाद जहीर लिखते हैं:
इन दोनों ने अपनी जिन्दगी का मक़्सद जैसे अपनी ज़ात को भुला कर इन्सानियत को बना लिया था जिसे फारिगुलबाली या खानगी इत्मीनान कहते हैं। वे उनकी किस्मत में नहीं थे। आयंदा जो जमाना आने वाला था, वह महमूद के लिये कैद व बन्द, मेहनत व मशक्कत और कौमी कामों के सिलसिले में फिक्र व तदद्दुद का जमाना था। रशीदा के लिये तवील तनहाइयों, माली मुश्किलात और जिस्मानी कुल्फत का। मगर वह अमृतसर हो या देहरादून या लखनऊ जब भी उनके घर जाओ, तो महसूस होता था कि खुशी वहाँ तैर रही है। ऐसी खुशी जो दो दिलों के मेल और दो दिमागों की हम आहंगी से शफ़्फ़ाफ ठंडे पानी के चश्मे की तरह फूट निकलती है और जो दूसरे अफसुर्दा या गमगीन रूहों को भी सैराब करके उनमें तरन्नुम और बालीदगी पैदा कर देती है।
इन तमाम दिक्कतों और कैफीयतों के बावजूद रशीद जहाँ ने लखनऊ की पहली और ऐतिहासिक कांफ्रेंस के एहतिमाम में बड़ा रोल अदा किया। कान्फ्रेंस का एहतिमाम अपने आप में मुश्किल और पेचीदा काम होता है। और उस समय जब मुल्क व समाज अलग-अलग धारों और गलतफहमियों में घिरे हों, तहरीके-आजादी जोर-शोर से आगे तो बढ़ रही थी, लेकिन नाॅन काॅपरेशन और खिलाफत की तहरीकें, दहशतपसन्द नौजवानों की इंकिलाबी तहरीक, हिन्दू व मुस्लिम फ़सादात ने फ़जा में जहर और अंग्रेजी हुकूमत को मजबूत कर रखा था। ऐसे में किसी नई तहरीक का काइम होना बेहद मुश्किल काम था। उर्दू अदब में यूं भी एक ख्याल आम था कि शाइर को तो बस शाइरी करना चाहिये, सियासत, जलसे, जुलूस आदि से दूर रहना चाहिये। सज्जाद जहीर ने लिखा है:
शुरू-शुरू में तो प्रेमचन्द का यही खयाल था और गालिबन मौलवी अब्दुल हक साहब भी यूँ ही सोचते थे, लेकिन हालात और वाकिआत ने हमें इन ख्यालात में तरमीम करने पर मजबूर किया। 1935 से ’36 के करीब का जमाना हमारे मुल्क के नौजवान दानिश्वरों के लिये बहुत बड़ी जेहनी छान-बीन, खोज, तब्दीलियों और जिन्दगी की नई राहों के दरयाफ्त करने का ज़माना था।
इन हालात में न सिर्फ कांफ्रेंस करना और प्रेमचन्द को अध्यक्षता के लिए तैयार करना, कई भाषाओं के बड़े-बड़े अदीबों का सम्मिलित होना अपने आप में गैर मामूली बात तो थी ही - एक इतिहास लिखा जा रहा था और इस इतिहास को लिखे जाने में रशीद जहाँ का कलम और कदम दोनों काम कर रहे थे। वह लखनऊ गयीं। हाजरा बेगम के साथ मिलकर टिकट बेचती रहीं। चैधरी मुहम्मद रूदौलवी को अध्यक्ष, स्वागत कमेटी बनने पर इन्होंने ही मजबूर किया। एक सेवक की तरह वह कांफ्रेंस के इंतिजाम देखती रहीं। कांफ्रेंस कामयाब हुई और खूब कामयाब हुई। प्रेमचन्द का खुलबा, प्रेमचन्द की नजदीकी, प्रेमचन्द का व्यक्तित्व - इन सबने नौजवानों और खासकर रशीद जहाँ को बेहद आकर्षित किया। कांफ्रेंस के बाद वह उनसे बहुत करीब और बेतकल्लुफ हो गयीं। प्रेमचन्द की मौत से उन पर गहरा असर हुआ। उन्होंने एक उम्दा लेख भी लिखा, जिसमें एक जगह लिखती हैं:
मुझे मुंशी प्रेमचन्द से मिलने का शौक था। बचपन से उनके नाम से वाकफियत थी। प्रेमचन्द इतना बड़ा मुसन्निफ, हमारी कांफ्रेंस का सद्र, हमारी खुशी की कोई इन्तिहा न थी। प्रेमचन्द के आर्ट में एक बेमिसाल चीज - जमाने की तब्दीलियों का असर था। बूढ़ी काकी, सुब्हे-अकबर, बाजारे-हुस्न लिखने का एक वक्त था। जमाना बदला। कांग्रेस आयी। पोलिटिकल जिद्दोजहद और कशमकश के जो नक्शे प्रेमचन्द के यहाँ मिलते हैं, वोह किसी के यहाँ नहीं। आजकल के जवानों में पिछले दस साल के जवानों से फर्क है। उसी तरह अगर आज प्रेमचन्द होते, तो उनके अफसाने भी जमाने के साथ बदलते रहते - हम लोग उनकी मौत से इतने गमगीन हैं, तो उनके देरीना इल्मी और शख्सी दोस्तों और अजीजों के गम का अन्दाजा लगाना मुश्किल है। एक बड़ा और अच्छा मुसन्निफ मर गया। ताजवाब और बेमिसाल शख्सियत भी मुसन्निफ के साथ चली गयी।
कांफ्रेंस के बाद वह देहरादून चली गयीं, जहां वह अदीब कम, सियासी कारकुन ज्यादा बन गयीं। उनकी जिन्दगी कई भागों में बंटी थी। अदीब, डाॅक्टर और सियासी कारकुन। समाजी और अमली काम तो किये ही। लखनऊ में रहने के दौरान उन्होंने अफसाने और ड्रामे भी लिखे। यह जमाना उनकी रचनाओं की ऊँचाई का जमाना था।
इसी जमाने में उन्होंने चोर, वह, आसिफजहाँ की बहू, छिद्दा की माँ, इफ्तारी, मुजरिम कौन, मर्द औरत, सिफर जैसी उम्दा कहानियां लिखीं और कुछ बहुत अच्छे ड्रामे। अब इन कहानियों में पहले वाली जज्बातियत व जानिबदारियत न थी, बल्कि मजबूती व ताजगी थी और हकीकत भी। ‘सौदा’ जैसी शुरू की कहानियों में नकाब पहने मर्दो के बीच घिरी औरत अब गहरे समाजी शुऊर के हवाले से ‘वह’ का रूप ले चुकी थी। और ड्रामा ‘औरत’ की हिरोइन तो अपने मौलवी शौहर से तेवर के साथ कहती है - ”जरा संभल कर मैं कहती हूं, बैठ जाओ, अगर अपनी इज्जत की खैर चाहते हो, अगर इस बार तुमने हाथ उठाया तो मैं जिम्मेदार नहीं।“ इन कहानियों और ड्रामों को पढ़िये, तो एकतरफा गम व गुस्सा या एहतिजाज नहीं उभरता, बल्कि पूरे समाजी निज़ाम के हवाले से मर्द और औरत के रिश्ते, अमीर और गरीब के बीच की दीवार, भूख-प्यास और जिन्दगी की वह कद्रें जहाँ इंसानियत दम तोड़ रही थी, तभी तो कहानी ‘इफतारी’ में नसीमा का नन्हा बच्चा असलम उससे पूछता है:
”माँ दोज़ख़ क्या होती है?“
”दोजख-! दोजख, वह तुम्हारे सामने ही तो है।“
”कहाँ-?“
”वह नीचे, जहां अन्धा फकीर खड़ा है। जहां वह जुलाहे रहते हैं और जहां वह अंग्रेज रहता है और लोहार भी“
दोजख की आग दरअस्ल भूख की आग है।
ड्रामा ‘काँटे वाला’ के यह डायलाॅग देखिये:
”सांस लेना बगावत है, तो मैं पूछता हूँ, फिर मौत क्या है? यह सब भूख को दबाने के बहाने हैं, लेकिन भूख दबती नहीं, गला दबाने से चीख बन्द नहीं हो जाती, बल्कि और दुगुनी हो जाती है। भूखे की चीख, मरते हुए की चीख - जिंदा आदमियों से ज्यादा भयानक है।“
अब उनकी कहानियों और ड्रामें मेें खराबिये-निज़ाम को बदलने और एक नये अवामी निजाम को बनाने की इच्छा दिखाई देती है। कहानी ‘सिफर’ (जिसके केन्द्रीय पात्र के बारे में यह ख्याल आम है कि वह सज्जाद जहीर का किरदार है) में इस फल्सफे को बड़े सलीके से कहानी की सूरत में पेश किया है। बेचैनी, संघर्ष, भूख-प्यास, खराबी, नाबराबरी, गम व गुस्सा, इश्क व मुहब्बत, किन्तु जीवन का कोई भी तरीका व फल्सफा रशीद जहाँ की कहानियों में बड़ी सादगी और आम बोलचाल की जबान से उभर कर आकर्षक और अर्थपूर्ण अन्दाज में पढ़ने वाले के दिल में जगह बना लेना है। ‘चोर’, ‘वह’ ऐसी कहानियां हैं, जिनके केन्द्रीय पात्र मुद्दतों दिमाग से सवार रहते हैं।
रशीद जहाँ ने कहानियां कम ही लिखीं, लेकिन इन कम कहानियों में भी विषय, पात्र, भाषा की रंगारंगी, फैलाव, संजीदगी और गहराई के खूब-खूब नमूने देखने को मिलते हैं। फिक्र व खयाल, कल्पना व ध्यान के दिलचस्प करिश्मे, समझने और समझाने के अर्थपूर्ण तज्रबे, इंसानी जिन्दगी के बिगड़े हुए और गन्दे चेहरे, बदलते रिश्ते, बदलते हुए मर्द और औरत दिखाई देते हुए मिलेंगे। और जहाँ ऐसा नहीं है, वहाँ किसी किस्म की सड़ांध काम कर रही है, इस हकीकत से भरी तस्वीरें दिखाई देती नजर आयेंगी। जिन पर रशीद जहाँ का साइंसी ज्ञान, दृष्टिकोण और उनके व्यक्तित्व की खास जुर्रत का एक दिलकश रंग व रोगन चढ़ा हुआ नजर आयेगा।
यह एक सच्चाई है कि रशीद जहाँ औरत थीं और इनकी कहानियों का केन्द्र बिन्दु भी औरत ही है, लेकिन इस सिलसिले में उनका बड़ा कारनामा यह है कि उन्होंने सबसे पहले अपने आप को पुराने किस्म की औरतों की लाइन से अपने आप को अलग किया, हद यह है कि अपने से सीनियर औरत-कहानीकारों की लाइन में खड़ा रहना भी पसन्द नहीं किया, क्योंकि उनकी तान अधिकतर औरत की जायज और नाजायज हिमायत और उनकी गैर मामूली बेगुनाही और बेबसी पर टूटती है, जहां औरत सिर्फ बेगुनाह और बेकुसूर है। लेकिन रशीद जहाँ ने सबसे पहले अपनी आँखों से बेकार की हिमायत का पर्दा हटाया और हकीकत की ऐनक लगाई और पूरी ईमानदारी और सच्चाई से उनको देखा, परखा और पूरे इंसाफ और एतिदाल के साथ उन पर कदम उठाया। सिर्फ उनके पक्ष में ही नहीं, बल्कि उनके विरोध में भी। प्रोफेसर कमर रईसा का ख्याल है कि -
तरक्कीपसंद अदीबों में प्रेमचन्द के बाद रशीद जहाँ तन्हा थी, जिन्होंने उर्दू अफसानों में समाजी और इंकिलाबी हकीकत निगारी की रवायत को मुस्तहकम बनाने की सई की।
उर्दू में पहली बार एक इंकिलाबी और साइंसी जेहन रखने वाली खातून ने जिन्दगी को उस तारीखी और मादूदी अवामिल के तनाजुर में देखा, इसलिये उनकी नजर उन पहलुओं पर गई जिन पर न सिर्फ मर्द, बल्कि खातून अफसानानिगारों की रसाई भी नहीं हो सकती थी।
इतनी कम मुद्दत में रशीद जहाँ का यह जेहनी व फितरी विकास मार्कसिज्म के पढ़ने और प्रगतिशील आन्दोलन से जुड़ाव से ही मुमकिन था। उन्होंने कम लिखा, लेकिन ऐसा लिखा कि आने वाली नस्ल या खासकर औरतों की नस्ल गैर मामूली तौर पर आकर्षित हुई। ऐसे निडर और यादगार कारनामों के कारण वह औरतों की शिक्षा और आजादी का चिन्ह बन गयीं। हाजरा बेगम लिखती हैं:
रशीद जहाँ का कारनामा यह है कि उन्होंने अपनी चन्द कहानियों से अपने बाद लिखने वाली बीसियों लड़कियों और औरतों के दिमागों को मुतास्सिर किया। इस्मत चुग़ताई, रज़िया सज्जाद जहीर, सिद्दीका बेगम और न जाने कितनी मुसन्निफा थीं, जिन्होंने रशीद जहाँ के अफसानों, रशीद जहाँ की जिन्दगी और मसहूरकुन शख्सियत को मशाले-राह समझा और अपनी तहरीर से उर्दू अदब को नई बुलन्दियों पर पहुँचाया।
इस्मत चुगताई के वाक्यों को भी पढ़िये:
गौर से अपनी कहानियों के बारे में सोचती हूँ, तो मालूम होता है कि मैंने सिर्फ उनकी (रशीद जहाँ) बेबाकी और साफगोई को गिरिफ्त में लिया है। उनकी भरपूर समाजी शख्सियत मेरे काबू न आयी, मुझे रेाती-बिसूरती, हराम के बच्चे जनती, मातम करती हुई निस्वानियत से हमेशा नफरत थी। खामखाह की वफा और जुमला खूबियाँ जो मशरिकी औरत का जेवर समझी जाती थीं, मुझे लानत मालूम होती हैं। जज्बातियत से मुझे हमेशा कोफ्त रही है। इश्क में महबूब की जान को लागू हो जाना, खुदकुशी करना और बावेला करना मेरे मजहब में जायज नहीं, यह सब मैंने रशीदा आपा सिखा है। और मुझे यकीन है कि रशीदा आपा जैसी लड़कियाँ सौ लड़कियों पर भारी पड़ सकती हैं।
सच यह है कि अगर रशीद जहाँ न होती, तो प्रगतिशील आन्दोलन की आधी दुन्या अधूरी रह जाती और एक बड़ा इंसानी गोशा अंधेरे में रह जाता। रशीद जहाँ ने अपने छोटे-से कारनामों से सही, उस अंधेरे गोशों को रौशन किया। आज अफसानवी अदब के आस्मान पर ज़किया मुशहदी, निगार अजीम, तरन्नुम रियाज, सर्वत खान, गजाल जैगम जैसी कहानीकार औरतें जगमगा रही हैं। कहीं न कहीं इन सब पर रशीद जहाँ का एहसास और एहसान है। आज जो निसाइयत अर्थात औरतपन और स्त्री संघर्ष का जो आन्दोलन सर उठा रहा है, उसमें भी रशीद जहाँ का खून-पसीना काम कर रहा है।

(प्रो. अली अहमद फ़ातमी)

प्रगतिशील लेखकों के राष्ट्रीय महासंघ (लखनऊ) का घोषणा पत्र

हम भारत के प्रगतिशील लेखक जो अपने संगठन के स्वर्ण जयन्ती-समारोह के अवसर पर राष्ट्रीय प्रगतिशील लेखक महासंघ के चैथे सम्मेलन में एकत्र हुए हैं, फिर एक बार प्रगतिशील आन्दोलन के महान उद्देश्य के प्रति, जनतंत्र, धर्म निरपेक्षता, विविधता के बीच देश की एकता और समाजवाद के ध्येय के प्रति अपने को समर्पित करते हैं।
हमें इस बात की गहरी चिंता है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आने के चार दशकों के दरम्यान शासक वर्ग और उनकी पार्टी, जिन पर निहित स्वार्थी तत्वों का प्रभुत्व रहा है, उपर्युक्त महान लक्ष्यों को विकसित तो नहीं ही कर सकें, बल्कि उनसे इतना दूर चले गये हैं कि जन-विरोधी और साम्प्रदायिक तत्व तथा क्षेत्रीय संकीर्णतावादी एवं खुली पृथकतावादी शक्तियां हमारे महान देश की सांस्कृतिक और सामाजिक एकता के ढांचे को तोड़ रही हैं।
हमने राष्ट्रीय स्वाधीनता-संग्राम की आग में तप कर अपनी व्यापक पहचान बनायी, लेकिन स्वतंत्रता मिलने के बाद हमारा शासक-समुदाय एक वैज्ञानिक सांस्कृतिक नीति के अभाव में विभिन्न भाषायी एवं नृवंशी इकाइयों की सक्षम पहचान की आवश्यकताओं की रक्षा करने में असमर्थ साबित हुआ है, जबकि ऐसा करने का आधार हमें स्वधीनतरा-संग्राम से ही मिला था।
आर्थिक और सामाजिक विकास में क्षेत्रीय असमानता, मूल्य-वृद्धि, गरीबी, बेरोजगारी, निरक्षरता, सामाजिक सुविधाओं के अभाव और जीवन में अनिश्चय की स्थिति ने हमारी मानवतावादी परम्पराओं को दबोच लिया है, क्योंकि शासक वर्ग भ्रष्टाचार की कीचड़ में डूबा हुआ है और मध्य वर्ग को सम्पन्नता के मोहक जाल में फंसाए जा रहा है। प्रतिक्रियावादी, सम्प्रदायवादी और फूटपरस्त ताकतें एवं पुनरुत्थानवादी तथा कट्टरपंथी विचारक भ्रष्ट तरीकों से जन-असंतोष और ऊब का फायदा उठाते हैं और साम्राज्यवादी ताकतों एवं उनके दलालों से उन्हें देश के भीतर तथा बाहर हर प्रकार की मदद मिल रही है।
वे कल्पित पौराणिक अतीत का गौरव गान करते हैं, मनुष्य की हस्ती को रहस्य में ढंक देते हैं, अपने भवितव्य का निर्माण करने की आस्था को वे दबाते हैं, अपने साथ रहने वाले भाइयों के प्रति वे नफरत और विद्वेष पैदा करते और फैलाते हैं। धर्म, वर्ण, जाति, लिंग और क्षेत्र के आधार पर भेदभाव का औचित्य सिद्ध करते हैं और अति दक्षिण तथा अति वाम दोनों ही रूपो में हिंसा की बर्बरतापूर्ण संस्कृति का निर्माण करते हैं। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि भारत के कुछ इलाकों में धार्मिक कट्टरपंथी और वामपंथी अत्यंत सौहार्दपूर्ण गठबंधन से जुड़े हुए हैं।
हमारी जनता में आधुनिकीरण और वैज्ञानिक विकास की जो वाजिब लालसा है, उसका दुरूपयोग निहित स्वार्थी तत्व और उनका सहयोगी साम्राज्यवाद करते हैं। वे ऐसा करने का मौका इसलिए पा लेते हैं कि शासक हमारे देश में तकनीकी और वैज्ञानिक विकास के नाम पर विश्व बैंक और अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की सलाह पर भरोसा कर रहे हैं। इससे समय की कसौटी पर खरी उतरी हमारी आर्थिक आत्मनिर्भरता की नीति नष्ट हो रही है और श्रेष्ठ वर्गवाद एवं उपभोक्तावाद को बढ़ावा मिल रहा है। श्रेष्ठ वर्गवाद समाज पर शासन करने और अब सब कुछ के ऊपर सार्वभौम शक्ति होने क ी अभिजात वर्ग की धारणा को मजबूत बनाता है। इससे मेहनतकश जनता के प्रति बेरुखी और नफरत का भाव पैदा होता है, बावजूद इसके कि वह जनता सामाजिक रूप से पिछड़ी हुई है और गांवों एवं नगरों दोनों जगह सम्पन्न वर्ग की हिंसा की शिकार है। यह आकस्मिक नहीं है कि हाल के वर्षों में आरक्षण विरोधी आन्दोलन का नेतृत्व सम्पन्न वर्ग ने ही किया।
दुर्भाग्य से, हमारी नयी शिक्षा-नीति भी श्रेष्ठ वर्गवाद की ओर ही उन्मुख है। विचारों के क्षेत्र में उपर्युक्त प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति मनुष्य के अकेलेपन और आधारहीनता की धारणा में होती है, जिसकी नियति होती है स्वयं सूली पर चढ़ने के लिए कंघे पर सलीब लिए चलना। इसके अनुसार मनुष्य इतिहास से नहीं पैदा हुआ है, बल्कि अलग-अलग और निचले क्षणों में रहस्यपूर्ण ढंग से उसने रूप से ग्रहण किया है। साहित्य के क्षेत्र में इस प्रवृत्ति को इस तरह रहस्यपूर्ण बनाया जाता है कि साहित्य-सृजन को सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों और जन संघर्षों से तथा उसके कलात्मक रूप को अन्तर्वस्तु से स्वतंत्र कहा जाता है। इस स्थिति में साहित्य का उद्देश्य श्रेष्ठ कलात्मक गुण उपलब्ध करना मात्र समझा जाता है। साहित्य को आदमी के संघर्ष से अलग-थलग कर देने की कोशिश की जा रही है, जिससे निहित स्वार्थियों के हमने और यथास्थिति बनाये रखने की साजिशों के मुकाबले मेहनतकश जतना निरò हो जाए। साहित्य के पश्चिमी पंडित और साम्राज्यवाद के सिद्धांतकार, जो हमेशा कलात्मक सृजन के नये आधार खोजते रहते हैं, ऐसे विचारों को नये-नये रूपों में पेश करके नये लेखकों को प्रगतिशील आन्दोलन से दूर ले जाने की कोशिश करते रहते हैं।
इस पर गौर करना जरूरी है कि इलेक्ट्राॅनिकी के विकास ने संचार माध्यमों में क्रांति कर दी है। लेकिन दुर्योग से उस पर निहित स्वार्थियों और अमरीका के सूचना-साम्राज्य का कब्जा है, जो उपभोक्तावाद के नुकसानदेह व्यवहार का प्रचार करता रहता है। संचार-माध्यमों के लिए आज मानववादी मूल्यों की शिक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है मनोरंजन। क्योंकि यह उपभोक्ता-सामग्री की बिक्री में मददगार होता है और श्रोताओं को रोजमर्रा की समसयाओं के प्रति संवेदनहीन बना देता है। यह पूंजीवादी मूल्यों को बड़े पैमाने पर फैलाने और मिथ्या चमक-दमक के पीछे दौड़ने का उकसावा देने का सबसे जोरदार माध्यम है। यह बात अब छिपी नहीं है कि धार्मिक कट्टरपंथ से लेकर श्रेष्ठ वर्गवाद और विश्व प्रभुत्ववाद तथा उसके विभिन्न रूपों तक का उदय साम्राज्यवाद से ही हो रहा है।
साम्राज्यवाद सभी स्वतंत्रता प्रेमी राष्ट्रों को, तोड़-फोड़ के जरिए, अस्थिरीकरण के लिए राजनीतिक-आर्थिक दबाव का उपयोग करके, उनसे नजदीक से नजदीक किसी स्थान पर सैनिक अधे कायम करके और पड़ोसी राष्ट्रों को हथियारबंद होने और एक-दूसरे से लड़ने के लिए उकसा कर, धमकाना चाहता है। साम्राज्यवाद सैनिक गुटतंत्रों को पे्ररित करके सम्बद्ध देश के शासक पर कब्जा कराता है, ताकि वह उक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपने औजार के रूप में उनका इस्तेमाल कर सके, जैसा कि पाकिस्तान और अमरीकी प्रभुत्व के अधीनस्थ अनेक देशों में हुआ है। अमरीकी प्रभुत्व कुबूल करने का मतलब है जनतंत्र का खात्मा। यह जगविदित है कि नस्लवाद, जातिवाद, उपनिवेशवाद आदि जो कलंक आज की दुनिया में मौजूद है, उन्हें अमरीकी साम्राज्यवाद का ही संरक्षण प्राप्त है।
साम्राज्यवाद अपने अंतिम पतन को रोकने के लिए सैन्यीकरण और हथियारों की होड़ का भी इस्तेमाल करता है। वह इस प्रकार का भ्रम पैदा करता है कि इस नाभकीय युग में सीमित युद्ध किया जा सकता है या यह कि उसने ‘सामरिक प्रतिरक्षा पहल’ के रूप में एक ऐसा हथियार पा लिया है, जो किसी भी नाभिकीय विनाश से पूर्ण सुरक्षा प्रदान करने में समर्थ है।
साम्राज्यवाद ने नाभिकीय हथियार चलाने का अधिकार कम्प्यूटर को सौंप कर मानवता का भवितव्य वास्तव में निर्जीव वस्तु के हाथों के हवाले कर दिया है, जिसका मतलब यह है कि मशीन की गति में छोटी-सी गड़बड़ी हमारे इस भूमंडल को पूरी तरह नष्ट कर दे सकती है।
लेकिन हम प्रगतिशील लेखक इस हालत में भी यह देखकर प्रेरणा पाते हैं कि मेहनतकश जनता हर जगह मानव-मूल्यों के लिए लड़ रही है। वह नए नायक, नए प्रकार का मनुष्य पैदा कर रही है, जो हर जगह हमारे लिए प्रकाश-स्तंभ की तरह डटा रहता है। उसके साथ सम्पर्क से, उसके संघर्ष में शिरकत करके हम उसे ज्यादा अच्छी तरह समझने में समर्थ होते हैं, दुश्मन को पहचान लेते हैं और जटिल सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को समझने की गहरी दृष्टि प्राप्त करते हैं, जिससे हमारे सृजन को नयी चमक और गहराई प्राप्त होती है। इस तरह हम प्रगतिशील लेखक अपनी जनता के साथ रहते हैं, शत्रुतापूर्ण शक्तियों से लड़ते हैं और सामाजिक तथा सांस्कृतिक प्रगति का रास्ता साफ करते हैं।
हमारा परचम साम्राज्यवाद के खिलाफ मजबूती से ऊँचा उठा हुआ है, हम नाभिकीय हथियारों को समाप्त करने और दो विरोधी समाज-व्यवस्थाओं के शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए विश्वव्यापी शान्ति आन्दोलन में भाग लेते हुए अपने भविष्य का निर्माण करने के हर राष्ट्र के अधिकार के लिए भी लड़ते रहेंगे।
हमने अपने परचम पर लिखा है- ‘आत्मनिर्भरता’, और हम देश की आर्थिक स्वतंत्रता को सुदृढ़ बनाने के संघर्ष में शामिल हैं। इसे दबोचने के हर साम्राज्यवादी प्रयत्न का हम पूरी ताकत से विरोध करते हैं, अमरीका और उसके सहयोगी देशों से तथाकथित तकनीक के हस्तान्तरण के नाम पर अधिकाधिक मुनाफे के लिए आर्थिक स्वतंत्रता को तिलांजलि देने के भारत के निहित स्वार्थियों के प्रयत्न का भी हम विरोध करते हैं।
हम आश्वस्त हैं कि भारत में काफी वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाएं हैं, इसलिए दूसरे देशों के अनुसंधान का फल अपने देश में लाने के बदले अगर हम अपने अनुसंधान-कार्य का विकास करें तो हम अपने बूते पर अगली सदी में पहुंच सकते हैं।
हमारे परचम पर विचारधारात्मक संघर्ष के अक्षर चमक रहे हैं। हम धार्मिक कट्टरपंथ, जातिवाद, क्षेत्रीय संकीर्णतावाद, सामंतवाद, रूढ़िवाद, श्रेष्ठ वर्गवाद, विश्व प्रभुत्ववाद और उपभोक्तावाद की मानवता विरोधी खतरनाक प्रवृत्तियों एवं विचारों के खिलाफ, उनके विभिन्न दार्शनिक एवं सौन्दर्य शास्त्रीय सिद्धान्तों के खिलाफ संघर्ष की घोषणा करते हैं, क्योंकि वे सिद्धान्त हिंसा और नफरत फैलाते हैं, मनुष्यता के भविष्य के प्रति-खास करके मेहनतकश जनता के प्रति उदासीनता पैदा करते हैं और सर्वाधिकारवादी रूझान को भी जन्म देते हैं। उपर्युक्त प्रवृत्तियां देश में अस्थिरता पैदा करती हैं और उनकी चल जाए तो देश विघटित भी हो सकता है।
हम घोषित करते हैं कि हमारा संघर्ष साम्राज्यवाद की संस्कृति और सूचना-व्यवस्था का खात्मा करने और नई अन्तर्राष्ट्रीय सूचना-व्यवस्था कायम करने और अपने राष्ट्रीय संचार माध्यम के जनतन्त्रीकरण के लिए भी है।
हम घोषित करते हैं कि हम अपने महान देश की सभी भाषाओं की समानता को कुबूल करते हैं और मुक्त और निर्भीक वातावरण में उन सबके विकास के लिए पूरा अवसर और अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
सर्वोत्तम के उत्तराधिकारी
हमारी घोषणा है कि हम पूरी मानव जाति की परम्पराओं और सांस्कृतिक उपलब्धियों के सर्वोत्तम अंश के उत्तराधिकारी हैं। हम राष्ट्रीय स्वतन्त्रता और समाजवाद के लिए अपनी जनता के वीरता पूर्ण संघर्ष को आगे बढ़ाने का संकल्प विशेष रूप से लेेते हैं, हमारा संघर्ष हमेशा इस विराट आन्दोलन का अंग रहा है।
हम घोषणा करते हैं कि अपनी कलात्मक परम्पराओं के अनुसार नये कला-रूपों और अभिव्यक्ति के नए प्रकारों के लिए हमारी खोज जारी है और अपनी कला में ताजगी लाने के लिए हम जनता की जिन्दगी में रोज-ब-रोज व्यवहृत मुहावरों, बिम्बों और रूपकों के विशाल भण्डार का लाभ उठाएंगे।
हम प्रगतिशील लेखक, सभी देशभक्त और जनतांत्रिक लेखकों से आग्रह करते हैं कि इस भीषण संकट की घड़ी में अपनी पूरी कलात्मक क्षमता के साथ एकताबद्ध हों और मानव जाति के विवेक के प्रतिफलित करने वाले प्रगतिशील लेखक आन्दोलन को मजबूत बनाएं। यह आन्दोलन वास्तव में हमारे युग के उस महान आन्दोलन का अंग है, जो विश्व शांति की रक्षा करने, राष्ट्रीय स्वतन्त्रता एवं अखण्डता को सुदृढ़ बनाने, जनतांत्रिक मूल्यों तथा संस्कृति को सुरक्षित रखने और न्यायोचित एवं विवेक संगत समाज व्यवस्था कायम रखने के लिए छिड़ा हुआ है।

क्रांति के लिए (शंकर शैलेन्द्र)

क्रांति के लिए उठे कदम
क्रांति के लिए जली मशाल

भूख के विरुद्ध भात के लिए
रात के विरुद्ध प्रात के लिए
मेहनती गरीब जात के लिए
हम लड़ेंगे हमने ली कसम - ३

छिन रही हैं आदमी की रोटियां
बिक रही हैं आदमी की बोटियाँ
किन्तु सेठ भर रहे है कोठियां
लूट का ये राज हो ख़तम - ३

गोलियों की गंध में घुटी हवा
हिंद जेल आग में तपा तवा
खद्दरी सफ़ेद कोढ़ की दवा
खून का स्वराज हो ख़तम - ३

जंग चाहते है आज जंगखोर
ताकि राज कर सकें हरामखोर
पर जवान है, जहान है कठोर
डालरों का जोर हो ख़तम - ३

तय है जीत मजूर की, किसान की
देश की, जहान की, अवाम की
खून से रंगे हुए निशान को
लिख गयी है मार्क्स की कलम - ३


-शंकर शैलेन्द्र



Wednesday, 13 January 2010

परसाई क पुनर्पाठ

यह दृश्य अधिकतर लोगों का देखा हुआ दृश्य है। लेकिन देखकर अनदेखा कर देना या भूल जाना सामान्य बात है। परसाई देखे हुए को परिभाषित करते हैं। सबसे कठिन काम है मूक भावों, मनोविकारों को पकड़ना और उन्हें दिखाना। परसाई के पास एक दृष्टि है, अनुभव है और दूसरों को भी वे अनुभव कराते हैं। उनकी भाषा, कहने का ढंग अनुभव की दूरी को पाटता है।
शहर में अगर कहीं वफा है...
वेद प्रकाश
एक बार जुआ खेलने के आरोप में मिर्जा गालिब को कैद हो गई। उन्होंने कैद में कविता लिखी। उस कविता का अभिप्राय है -
‘कैदियों ने मुझे सर-आंखों पर बिठाया है। मैं इनकी मुहब्बत पर कितना नाज करूं? शहर में अगर कहीं वफा है तो उन चोरों में है, जो पकड़े जा चुके हैं। मैं उनके साथ रिश्ता जोड़ना चाहता हूं।’
इस पर डाॅ. विश्वनाथ त्रिपाठी की टिप्पणी है, ‘हिन्दी-उर्दू के मध्यकालीन कवियों में सिर्फ गालिब हैं जो कैदियों से रिश्ता जोड़ना चाहते हैं। गिजाज की आजादी, मानवीय संवेदना और जीवन-परिस्थितियों ने गालिब को उनकी असल रिश्तेदारी समझा दी थी। नवाब अमीउमरा, सेठ-साहूकार, मुगल साम्राज्य, ब्रिटिश साम्राज्य उन्हें पेंशन, रसद दे सकता था, आत्मीयता नहीं दे सकता था। ये सब न पकड़े गए चोर हैं।’
सोचते हुए कभी-कभी यह लगता है कि साथ जो होना चाहिए, जैसा व्यवहार होना चाहिए, वह नहीं होता। व्यवस्था की तरफ से भी और प्रकृति की तरफ से भी। जिस पर व्यवस्था की मार पड़ती है, उस पर प्रकृति की भी मार अधिक पड़ती है। कई बार हम जिसे भाग्य अथवा प्रकृति की मार समझते हैं, उसके मूल में व्यवस्था का भी दोष रहता है। उसके पक्ष में व्यवस्था होती है, वह प्रकृति से भी काफी दूर तक लड़ सकता है। इस बात को आज की परिस्थितियों में समझना बहुत मुश्किल नहीं है। श्रेष्ठ रचनाकार प्रकृति और व्यवस्था के इस संबंध की अभिव्यक्ति करता है। इनके टूटू हुए संबंध-सूत्रों को जोड़ता है। पे्रमचंद की रचनाओं में यह अभिव्यक्ति सर्वाधिक है। उन्हें अपना साहित्यिक पुरखा कहने वाले परसाई के यहां भी। परसाई की रचनाएं समकालीन मनुष्य के किसी प्रसंग में फंसे रहने का चित्रण करती है, लेकिन इसके माध्यम से वे समकालीन जीवन की अनेक स्तरीय परिस्थितियों के कारण रूप को प्रकाशित करती हैं।
नयी कहानी और नयी कविता में मृत्यु-बोध तथा हत्या-आत्महत्या का दर्शन खूब फला-फूला। यह अधिकतर उधार लिया गया दर्शन था। यदि उसमें वास्तविकता होती तो उसका रूप कुछ और होता। परसाई ने एक कहानी लिखी ‘जिन्दगी और मौत।’ इस कहानी को जवाब के तौर पर मृत्युबोध का जाप करने वाली कहानियों के समक्ष रखा जा सकता है। यह कहानी ‘वसुधा’ के जून 1957 अंक में प्रकाशित हुई थी।
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, ‘मरण से बढ़कर करुणा का विषय और क्या हो सकता है? लेकिन मरण भी करुणा का विषय तभी बनेगा जब वह अपनी विश्वसनीय परिस्थितियों या देश-काल को साथ लेकर आए। अनेक कहानियों का आरंभ नाटकीयतापूर्ण ढंग से करने वाले परसाई, यह कहानी ऐसे शुरू करते हैं, ‘सेनेटोरियम’ लगभग दो मील दूर है। 7 घण्टे एम्बुलेन्स कार में बैठे हो गये। भीतर कवि हैं। रह-रहकर उन्हें खांसी आती है और मैं कांप-कांप उठता हूं। बगल में बैठा ड्राइवर भी, जो ऐसे अनगिनती मनुष्यों को मौत से मिलने आधे रास्ते तक पहुंचा आया है, ‘हे राम!’ कहकर गहरी सांस छोड़ता है।
परसाई मौत के सन्नाटे का भी वर्णन कर सकते हैं। मृत्यु-भय से कैसे अनुभव प्रकट होते हैं, इसका भी। मौत अगर पड़ोस में हो तो प्रकृति कैसी-कैसी लग सकती है, इसका वर्णन देखिए-
‘ऐम्बुलेन्स चल पड़ी है। सांझ उतरने लगी है। वृक्ष पक्षियों के कलरव से गूंज उठे हैं- यह जीवन का मुक्त कल्लोल है। और इधर निर्बल फेफड़ों से निकली यह मजबूर खांसी-मृत्यु का क्रन्दन। दोनों ओर के वृक्षों से उठते इस कलरव के बीच से यह खांसी बढ़ रही है- जैसे मरण के स्वागत में दोनों ओर गीत गाती जिन्दगी खड़ी है।
रचनाकार बाहरी दृश्यों को जिन रूपों में लेता है, वह उह्नसका यथार्थ होता है यानी रचनाकार को जो लगता है वही उसकी यथार्थ दृष्टि है। परसाई जीवन और मृत्यु का संश्लिष्ट चित्रण करते हैं। एक तरफ प्रकृति का मुक्त कल्लोल यानी उसका स्वतंत्र आलंबनत्व और दूसरी तरफ मृत्यु का क्रन्दन। प्रकृति सबको अपने भीतर समेटे हैं। बाहरी दृश्यों को मनोभावों या स्थिति विशेष रंग में रंगकर प्रस्तुत करने की रूढ़ि रही है। कहीं-कहीं यह पद्धति बहुत आवश्यक भी होती है। वहां विशेष रूप से जहां यातना की तीव्रता या भाव-सघनता है की अनुभूति करानी हो। कहानी में एक और चित्र इस तरह है-
‘सामने लम्बा-चैड़ा मैदान, सर्वत्र हरियाली-लेकिन इस हरियाली में जिन्दगी का हरापन कहीं नहीं दिख्ता। सम्पूर्ण प्रकृति जैसे किसी आशंका से हर क्षण सहमी रहती है। इतने मनुष्य हैं- मरीज, डाॅक्टर, नर्स लेकिन जीवन का स्पन्दन कहीं अनुभव नहीं होता। ठण्डी हवा हल्की-सी सिहरन पैदा कर रही है। जहां-तहां हट्स हैं- एक दूसरी से दूर, अपने-आप में एक भिन्न संसार। हरियाली में बल्बों से जगमगाती वे झोपड़ियां आकाश में झिलमिल करते नक्षणों-सी मालूम होती हैं।’
परसाई अपनी रचनात्मक प्रभाव-क्षमता को समृद्ध करने के लिए अनुभाव, संवाद आलंबन, उद्दीपन-सबका उपयोग कर सकते हैं, करते हैं।
कुल छह पृष्ठों की इस कहानी के आरंभिक ढाई पृष्ठों में वातावरण बनाया गया है। परसाई कहीं-कहीं वाचकीय टिप्पणियों के माध्यम से कहानी का वातावरण बनाते हैं। इस संदर्भ में ‘किताब का एक पन्ना’ कहानी का उल्लेख हो चुका है। परसाई क्ल्लहीं-कहीं कुछ पात्रों के माध्यम से भी कथ्य की भूमिका बनाते हैं। ‘जिन्दगी और मौत’ के इन आरंभिक पृष्ठों में किन्हीं कवि का चित्रण हैं, जो फेफड़े के रोग से ग्रस्त हैं और वाचक उन्हें सेनेटोरियम में भर्ती करने के लिए ले जाता है। ध्यान रहे कि यह कहानी सन् 1957 की है। उन दिनों अधिकतर कवि सामान्य जन ही होते थे और सामान्य आदमी के लिए उस समय टी.बी. रोग का क्या अर्थ होता था, हम कुछ-कुछ समझ सकते हैं। केवल कवि और उनकी बीमारी का वर्णन, इस कहानी का उद्देश्य नहीं है। लेकिन कवि का रोग तथ संत्रास वाचक का नजदीकी अनुभव है। कवि से वाचक का संबंध है, कवि के रोग के कारण को वाचक जानता है। हम अपनी या अपने किसी आत्मीय, संबंधी, मित्र की यातना के द्वारा दूसरों की यातना का अनुमान करके दुःखी होते हैं, परसाई इन पृष्ठों में यह भी बताते हैं कि उन्हें कैसे-कैसे अनुभव किन कारणों से हुए। वे कवि को लेकर सेेनेटोरियम गए तो उन्हें एक नया अनुभव हुआ। यही अनुभव कहानी बन गया है। यह अनुभव गालिब के उस अनुभव के समान है, जो उन्हें कैद में रहते हुआ।
कहानी का वास्तविक आरंभ होता है इन पंक्तियों से, जहां से एक-एक वाक्य,एक-एक शब्द बहुत‘कुछ कहता नजर जाता है-
-जनरल वार्ड के सामने हम आ गए हैं। नया मरीज आता देख 50-60 रोगी एकदम बरामदे में आ गये हैं। ये मनुष्य लगते ही नहीं हैं- ये केवल अस्तित्व हैं- बिल्कुल वायवी! शून्य आंखों में केवल उत्सुकता! मरीज की मायूसी, पीड़ा, चिन्ता भी इनकी आंखों में नहीं है, केवल कुतूहल, केवल उत्सुकता-बच्चों की तरह! नये रोगी के माध्यम से ये दुनिया से सम्बन्ध जोड़ना चाहते हैं।’
यह दृश्य अधिकतर लोगों का देखा हुआ दृश्य हैं लेकिन देखकर अनदेखा कर देना या भूल जाना सामान्य बात है। परसाई देखे हुए को परिभाषित करते हैं। सबसे कठिन काम है मूक भावों, मनोविकारो को पकड़ना और उन्हें दिखाना। परसाई के पास एक दृष्टि है, अनुभव है और दूसरों को भी वे अनुभव कराते है। उनकी भाषा, कहने का ढंग अनुभव की दूरी को पलटाता है। मरीज मनुष्य हैं, लेकिन लगते नहीं क्योंकि शारीरिक-मानसिक स्वस्थता मनुष्य होने के लिए आवश्यक है। रोग, मानसिक रूप से भी रिक्त करता है। रोगियों का केवल ढांचा मनुष्य का है, इसलिए वे मनुष्य नहीं लगते, अस्तित्व-मात्र लगते हैं। यह संसार उनके हाथों से छूट रहा है, वे हमसे दूर जा रहे हैं। उनका ढांचा-शरीर हमारे पास खड़ा है, लेकिन वे वस्तुतः हमसे दूर हैं। उनके देखने का ढंग ऐसा है जिससे लगता है कि बहुत दूर से देख रहे हो। सांसारिक अनुभव को आंखे प्रमुखता से ग्रहण करती हैं। आंखे कहने के लिए शब्द की मांग नहीं करतीं। आंखें ही सबसे ज्यादा, सबसे सच्चे, विश्वसनीय को शब्द देते हैं। मूक को शब्द देना, अर्थ और शब्द की दूरी को कम करना है। रोगियों की आंखों में उन्होंने किस अभाव और किस भाव को देख लिया है। एक स्थिति ऐसी आती है जब प्राणी मात्र सम पर आ जाते हैं। इन रोगियों की आंखों के माध्यम से परसाई ने प्राणी मात्र की आदिम निरीहता को देखा। यह निरीहता हमारे आदिम संस्कारों से भी जुड़ी है। इसलिए इसका अबूझ प्रभाव पड़ता है। उनकी आंखों में बच्चों की तरह केवल कुतूहल और उत्सुकता है। वह भी इसलिए कि एक नया मरीज आ गया है। नया रोगी छूटी हुई दुनिया से उनका संबंध स्थापित करता है। उनके परिवार में बढ़ोत्तरी करता है। इसलिए वे उसे देखते एकदम बरामदे में आ गए। ऐसा विश्सनीय, अनुभूत लेकिन सघन, दुसाध्य चित्रण निराला और परसाई जैसे रचनााकर ही कर सकते हैं। नये रोगी के जरिए वे दुनिया से संबंध इन प्रश्नों के माध्यम से जोड़ते है-
‘कहां से आये हैं?’
‘कौन सी स्टेज?’
‘एक लंग?’
‘दोनों लंग?’
‘कलेप्स करना पड़ेगा’
ये सब टी.बी. के विशेषज्ञ हो गये हैं। जरा देर हलचल रुक गयी है। मैं जवाब दे रहा हूं, वे कान खोले सुन रहे हैं। फिर हलचल हुई- -अरे राम राम! बड़ी देर कर दी।’
शुक्लजी ने लिखा है कि ‘दूसरों के दुःख से दुःखी होने का नियम बहुत व्यापक है और दूसरों के सुख से सुखी होने का नियम उसकी अपेक्षा परिमित है।’
यह नियम हमारे देश के सरकारी अस्पतालों ने विशेष रूप से घटित होते हुए देखा जा सकता है। संकट के समय दूर-दूर से आए लोग परिजन हो जाते हैं। वे एक-दूसरे के दुःख को बांटकर उसे कम करने की चेष्टा करते हैं। ऐसा नहीं है कि वहां पर केवल ऐसा ही सात्विक वातावरण होता है। वहां भी चालाकियां और काईयांपन होता है। लेकिन परसाई उन व्यंग्यकारों की तरह नहीं हैं जो हर स्थिति में, हर पात्र पर व्यंग्य करें, उसे हास्यास्पद बना दें। उनकी व्यंग्य दृष्टि यह बखूबी पहचानती है कि किस पर हंसना है, किस पर रोना है, किसे आत्मीयता और करुणा देनी है। उनके साहित्य में अनेक स्थलों पर मानवीय पात्र मिलते हैं, उनमें ‘जिन्दगी और मौत’ के ये संकटग्रस्त रोगी पात्र भी शामिल हैं। ये नये रोगी का स्वागत इस प्रकार करते हैं- ‘और अब इनमें एक विचित्र व्यवस्तता आ गयी है। उनके भटके हुए सामथ्र्य को सहारा मिल गया है। उनके अस्तित्व को सार्थकता मिल गयी है। वे नये मरीज के प्रबंध में लग गये हैं-
‘कौन-सा बैड है?’
‘सिस्टर को बुलाओ?’
‘चादर बदलने को बोलो।’
सब बच्चों की तरह दौड़ रहे हैं। एक क्षण को उन्हें लगा कि वे स्वस्थ हैं और नए मरीज की परिचर्चा कर रहे हैं। मेरा काम कुछ नहीं रह गया। उनके अन्दर की मानवी करुणा, संवेदना उमड़ पड़ रही है। वे कुछ कर सकने को आतुर हैं। वे इस घर के वासी हैं और मेहमान की सेवा चाकरी में लग गये हैं। सामान जमा रहे हैं, बिस्तर ठीक कर रहे हैं, पानी ला रहे हैं। 2-4 कवि के पास खड़े हैं और उन्हें धीरज दे रहे हैं- ‘चिंता नहीं है। जल्दी ठीक हो जायेंगे। मैं भी ऐसा ही आया था पर अब देखिये।’
जो मनुष्य नहीं है, अस्तित्व मात्र हैं, भावरिक्त हैं, जिनके सामथ्र्य को सहारा नहीं है, जो दिन-रात एक जैसा, जितना जीवन बचा है, उसे व्यतीत कर रहे हैं, वे ही अचानक व्यस्त, सार्थक हो गए हैं, उनके सामथ्र्य को केन्द्र मिल गया है। उनकी संवेदना, मानवीयता और करुणा उभर आयी है। वे अब रोगी नहीं रहे, घर-बासी हो गये हैं और मेहमान की खातिरदारी में लगे हैं। अपने आपको भूलकर विशुद्ध अनुभूति मात्र हो गए हैं, मुक्त हृदय हो गए हैं। कहानी में इन रोगियों के लिए कई बार आता है- ‘बच्चों की तरह’। वे बच्चों की तरह देखते हैं, बच्चों की तरह दौड़ते हैं, बच्चों की तरह सिसकते हैं, आदि। रोगी बच्चे नहीं हो गए हैं, बच्चों की तरह हो गए हैं। बच्चे से हो ही नहीं सकते क्योंकि अब तक इन्होंने जो जीवन जिया है, उसमें अनेक भाव कमाए होंगे। क्रोध, ईष्र्या, घृणा भी उन भावों में निश्चित ही रहे होंगे। पर अब ये इन ज्यादातर भावों से रिक्त हो चुके हैं। अब इनके पास केवल वही भाव रह गया है जिससे मनुष्य का जीवनारंग होता हैं वह भाव है करुणा और हिंदी में करुणा से संबंधित कोई बात आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का उल्लेख किए बिना नहीं की जा सकती। उन्होंने लिखा-
‘जब बच्चे को सम्बन्ध ज्ञान कुछ-कुछ होने लगता है, तभी दुःख के उस भेद की नींव पड़ जाती है जिसे करुणा कहते हैं। बच्चा पहले परखता है कि जैसे हम हैं वैसे ही ये और प्राणी भी हंै और बिना किसी विवेचना-क्रम के स्वाभाविक प्रवृत्ति द्वारा वह अपने अनुभवों का आरोप दूसरे प्राणियों पर करता है। फिर कार्य-करण सम्बन्ध से अभ्यस्त होने पर दूसरों के दुःख के कारण या कार्य को देखकर उनके दुःख का अनुमान करता है और स्वयं एक प्रकार का दुःख अनुभव करता हैं। प्रायः देखा जाता है जब मां झूठ-मूठ ‘ऊँ-ऊँ’ करके रोने लगती है तब कोई बच्चे भी रोे पड़ते हैं। इसी प्रकार जब उनके किसी भी भाई या बहिन को कोई मारने उठता है तब वे कुछ चंचल हो उठते हैं।’
‘जिन्दगी और मौत’ के रोगी बच्चों की तरह हो गए हैं- इसका आशय स्पष्ट हो गया होगा। बच्चों का भाव-संसार सीमित होता है। करुणा या दुःख उसमें प्राथमिक है। उनके सीमित भावों और तत्सम्बन्धी कार्यों के बीच व्यवधान बहुत कम बन पाता है। जिसके प्रति करुणा उत्पन्न होती है, उसकी भलाई का उद्योग किया जाता है। इन रोगियों में नए रोगी के प्रति करुणा, संवेदना उमड़ती है तो ये कुछ करने को आतुर हो उठते हैं और बच्चों की तरह दौड़ते हैं। जो कुछ करने का सामथ्र्य रखते हैं, करते हैं। जो स्वयं करुणा के पात्र हैं, वे दूसरे पर करुणा कर रहे हैं। शुक्ल जी ने करुणा का सैद्धांतिक विवेचन सर्वाधिक किया उसका महत्व समझाया लेकिन इस स्थिति का संकेत संभवतः नहीं किया। परसाई इस स्थिति पर भी लिखते हैं इससे शुक्ल जी की मान्यता का विकास होता है। इससे रोगियों के प्रति पाठक की करुणा द्विगुणित होती है, रोगी श्रद्धा के पात्र भी बनते हैं। परसाई के पास करुणा की मार्मिकता को बढ़ाने का एक और तरीका है। वह है भावना, संवेदना तथा बढ़े हुए भाव का यथार्थ की चोट। उनका वाचन रचना के बीच में अक्सर एक टिप्पणी करता है तो बड़ी कठोर होती है, जहां किसी ज्ञात-अज्ञात के प्रति आक्रोश, अमर्ष, नाराजगी, क्रोध, झुंझलाहट, क्षोत्र आदि न जाने कितने भाव होते हैं, रोगियों पर वह टिप्पणी इस तरह है -
‘वही र्धर्य, जो उन्हें मिला था, वे नये मरीज को दे रहे हैं। वे जान गये हैं कि कोई उम्मीद नहीं है, मगर मरीज मरीज को धोखा दे रहे हैं। उनकी आत्मीयता उमड़ रही है, उन्होंने नये मरीज को स्वीकार कर लिया है, परिवार में शािमल कर लिया है। मुझसे बोले, ‘आप चिन्ता न करना। हम सब ठीक कर लेंगे। समझ लो कि घर में आ गये हैं।’
कैसा यह घर? और कैसे उसके ये वासी? इनमें अनेक उस लोक की यात्रा निकल पड़े हैं- यह सेनेटोरियम एक पड़ाव पर है- दो घड़ी रुके हैं और एक क्षीण आशा है कि शायद घर से वापिस लौटने की खबर आ जाय, नहीं तो आगे तो बढ़ना ही है,
कबीर तो पूरे जीवन को ही क्षण मानकर भक्ति में, दुःख में उसकी सार्थकता ढूंढते हैं। इन मरीजों का जीवन सचमुच ‘दो घड़ी’ का है, ये इस बात को जानते हैं। जानकर भी चीखते-चिल्लाते नहीं। उन्होंने इस बात में सार्थकता ढूंढ ली है कि दूसरों को इस थोड़े समय के जीवन की आत्मीयता दी जाए। ये हर नए रोगी को इस घर-परिवार में शामिल करते हैं। वाचक की झुंझलाहट इस बात को लेकर भी होगी कि इतने संवेदनशील, करुणा-आत्मीयता देने वाले ये मनुष्य ऐसे रोगी क्यों हैं? मानवीयता को इनकी आवश्यकता है। लेकिन शायद ये दुःख के मांजे हुए पात्र हैं। स्थितियों से गुजर कर ऐसे बने हैं। परसाई ने लिखा है कि दुःख सबको मांजता ही नहीं, वह मनुष्य को कमीना भी बनाता हैं लेकिन इस कहानी में परसाई ने वास्तविक दुःख में पड़े हुए मनुष्य की बढ़ी हुई मानवीयता तथा दुःख कातरता का चित्रण किया है।
एक अध्यापक के जीवन का बहुत बड़ा सुख यह है कि उसे जगह-जगह ‘सर नमस्ते’ कहकर पुकारने वाले विद्यार्थी मिल जाते हैं। यह अध्यापक का आत्म विस्तार है। लेकिन यह विस्तार जितना ही अधिक होगा दुःख के कारण भी उतने ही अधिक होंगे। जिसकों चाहने-जानने वाले जितने अधिक होते हैं, उसे सुख-संदेश भी उतने ही अधिक मिलते हैं और दुःखद खबरें भी। शर्मिंदगी का सामना करने की आशंका भी ज्यादा होती है। वाचक ऐसा ही अध्यापक है। वह इस समय सेनेटोरियम में है। अचानक एक नाटकीय स्थिति उत्पन्न हो जाती है-
‘सर नमस्ते! मैंने चैंककर देखा। एक नव-तरुण है। बोला, ‘आपने मुझे नहीं पहचाना? मैं आपका विद्यार्थी रहा हूं। मेरा नाम नगेन्द्र नाथ है।’
‘सर नमस्ते’ से मेरा पिण्ड नहीं छूटता। शहर के किसी भी मुहल्ले में जाऊं, चाहे वीराने में जाऊं कोई ‘सर नमस्ते’ कह ही देता हैं अगर शहर में कहीं से चोरी करके भागूं, तो जगह-जगह ‘सर नमस्ते’ होगी और पकड़ लिया जाऊंगा। एक बार मित्रों के साथ सिनेमा में बैठा खूब हल्का फिल्म देख रहा था। हंसी-मजाक-चुहल! इण्टरवल हुई तो पीछे से आवाज आयी, ‘सर नमस्ते’ दो विद्यार्थी ठीक पीछे बैठे थे। डटा रहा- सोचा, ‘प्राप्तेषु षोडषे वर्षे।’
यह नगेन्द्र यहां! 3 साल पहले इसे पढ़ाया था। अच्छा खूबसूरत, स्वस्थ लड़का, हाकी बढ़िया खेलता था। और आज यह यहां?’
‘सर नमस्ते’ का स्वर अक्सर सुख देता है। लेकिन कभी-कभी वही ‘सर नमस्ते’ अनुभव कराता है। वाचक के माध्यम से यह परसाई की रचनात्मक झंुझलाहट है। यह हास्य नहीं व्यंग्य है, आत्म व्यंग्य भी और अबूझ लगने वाली परिस्थितियों पर भी। जहां इस स्वर की कोई आवश्यकता-अपेक्षा नहीं, वहां पर भी यह सुनने को मिल जाए तो झुंझलाहट होती है। जिस खूबसूरत, स्वस्थ, बढ़िया हाकी खेलने वाले लड़के को तीन वर्ष पहले पढ़ाया। जिसे कहीं अच्छी जगह देखकर संतोष होता- वह नगेन्द्र नाथ भी यहां सेनेटोरियम में। परसाई जैसे रचनाकारों का दुःख बहुत व्यापक होता है। जो ज्यादा जीवन को जानता है, उसे न जाने क्या-क्या देखना पड़ता है। उसकी यातना ‘काह न देखै नैन भरि जो जीवहु बहु काल’ की तरह होती है। समाज में एक वर्ग ऐसा है जो रोगों के ईलाज के लिए कहीं भी जाकर रह सकता है। जिसके पास फुर्सत और साधक दोनों होते हैं। लेकिन यह रोग उन्हें भी होता है जिनके पास एक दिन की भी फुर्सत नहीं होती। नगेन्द्रनाथ गरीब घर का है। उसकी मां है, छोटा भाई है जो उसी पर निर्भर हैं। वह नौकरी पर जा ही रहा था कि यहां आना पड़ा। छह महीने से यहां हैं और अभी छह महीने और रहना पड़ेगा। उसकी मां और भाई का क्या होगा? यह चिंता उसे है। बीमारी में भी अपनी चिंता की फुर्सत नहीं।
‘मैं उसकी पीठ पर हाथ फेर रहा हूं। उसे धीरज बंधा रहा हूं। बुजुर्ग कहते थे, यह राज-रोग कहलाता है, राजाओं को हुआ करता था- उन्हें फुर्सत थी। पर जो जीवन की कशमश में उलझे हैं, जो पसीने की एक-एक बूंद से एक-एक दाना कमाते हैं, जिन्हें बीमार पड़ने की फुर्सत नहीं है, उन्हें यह क्यों होता है? इसने कब से वर्ग-भेद छोड़ दिया?
जिस कवि के चित्रण से कहानी का आरंभ हुआ है केवल उसकी यातना का चित्रण कहानी का उद्देश्य नहीं है। साथ ही नगेन्द्रनाथ का दुःख भी इस कहानी का उद्देश्य नहीं है। लेकिन ये दोनों ऐसे पात्र हैं जिनके आसपास का वर्णन कहानी में है। इनके माध्यम से हम विशिष्ट से सामान्य पात्रों की यातना का अनुभव करते हैं। कहानी के वे सामान्य पात्र 50-60 रोगी हैं। कवि के रोग के कारण का उल्लेख कहानी में है। कवि कहता है- श्च्वअमतजल ेनििमतपदहश् नगेन्द्रनाथ की कहानी भी कवि से अलग नहीं है। कहीं न कहीं कहानी में भी मुख्य है- श्च्वअमतजल ेनििमतपदहश् ‘गरीबी और दुख ऐसे लोगों को बीमार पड़ने की फुर्सत नहीं है जो गरीब हैं, जिनके दुःख और हैं, जो जीवन की कशमश में उलझे हैंः जो पसीने की एक-एक बूंद से एक-एक दाना कमाते हैं। लेकिन जो रोग किसी समय राज-रोग कहलाता था, आज वहीं आक्रमण करता है जहां गरीबी और दुःख देखता है। और ये गरीबी और दुःख कहां से आए- क्या किसी और लोक से आए हैं? क्या ये मनुष्य द्वारा बनाई गई व्यवस्था की ही देन नहीं हैं? इसलिए कहा गया था कि रचनाकार टूटे हुए सम्बन्ध-सूत्रों को जोड़ता हैं धनंजय वर्मा के अनुसार परसाई ने अनेक तरह की अमानवीयता और पाखंडों में छले जाते समकालीन आदमी को रोजमर्रा तकलीफ को जवान दी। यह तकलीफ मनुष्य रचित ही नहीं, मनुष्य रचित भी है। अनेक रोगों का कारण गरीबी तथा दुख है, और गरीबी तथा दुख के कारण हम स्वयं हैं।
सेनेटोरियम के रोगियों में न जाने कितने नगेन्द्रनाथ जैसे रहे होंगे। जो कुछ वे बोलते हैं, उससे वे मूर्त होते हैं, नगेन्द्रनाथ के चित्रण से वे और अधिक मूर्त होते हैं। रोगियों में नर्स को चिड़चिड़ी कहने वाला भी है और ‘कुछ नहीं - त्मचतमेेपवदश् (मौनदमन) है।’ कहने वाला भी। यह दक्षिण का है और पूछने पर बताता है कि ‘मैं टाटा इंस्टीट्यूट आॅफ सोशलाजी में था। कोर्स का एक साल रह गया था, सो यहां काटना पड़ रहा है। यानी गरीब, दुखी, प्रतिज्ञाशाली सब यहां सेनेटोरियम में रोगी बनकर जीवन बिता रहे हैं। गिंसबर्ग ने अपनी एक कविता में लिखा, ‘मैंने देखा है अपनी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ दिमागों को पागलपन से तहस-नहस होते-भूखे विक्षिप्त नंगे।’
सेनेटोरियम के रोगी मनुष्य नहीं लगते, अस्तित्व मात्र लगते हैं, लेकिन हैं तो मनुष्य ही। जब कोई बाहर से आता है तो उसके सहारे ये बाहर की उस दुनिया से जुड़ना चाहते हैं जो इनसे छूट गई है। नर्स इन्हें बच्चा समझकर डांटती है। बाहर से आए व्यक्ति के सामने ये अपने को बच्चा मानने को तैयार नहीं। नर्स की बातें इन्हीं रोग और अस्पताल की याद दिलाती हैं और बाहर से आया व्यक्ति जीवन से जोड़ता है। परसाई ने रोगियों का मनोविज्ञान ऐसे चित्रित किया है -
‘वे सब डांटे हुए बच्चे की तरह दुबककर रह गये हैं, निर्बल क्रोध और विवशता से एक-दो गले भर आये। इन्हें मीठी बात चाहिए,, स्नेह की वाणी चाहिए। घर से दूर, परिवार से दूर, मित्रों, सम्बन्धियों से दूर इस घेरे में बन्द ये आत्माएं जीवन का संस्पर्श चाहती हैं। उन्हें स्नेह की चाह है, माधुर्य की चाह है- उन्हें वह सब चाहिए जो जीवन को अर्थ देता है। नर्स के कड़वे बोल जैसे उन्हें जीवन से दूर ढकेलते हैं।
परसाई की अनेक रचनाओं में, संकट में पड़कर किसी अज्ञात सत्ता को पुकारते पात्रों का मार्मिक वर्णन मिलता है, अज्ञात को सम्बोधित यह पुकार उन पात्रों की यातना को कई गुणा बढ़ा देती है। साथ ही विडंबना की भी व्यंजना करती है। कस्बे में प्लेग पड़ने पर परसाई जी की मां मर रही थीं और परसाई-परिवार गा रहा था- ‘जय जगदीश हरे...।’ ‘किताब का एक पन्ना’ कहानी में भिखारिन युवती गाती है- ‘भगवान किनारे लगा दे मेरी नैया’ और ‘जिन्दगी और मौत’ के रोगी रोजाना गाई जाने वाली आरती आज फिर बड़े करूणा कंठ से गा रहे हैं- ‘जय जगदीश हरे...।’
‘गले उनके रुंधे हैं। पीड़ित आत्मा का आर्तनाद-सा लगता है। टी.बी. के मरीज को इस युग में भी लगता है कि उसका अन्त आ गया। ये सब अपने को गया हुआ मान बैठे हैं, जीवन इनका खो गया है। इनका विश्वास गया, आशा गयी, निष्ठा गयी! ये किसी अलक्ष्य, पर सर्वोपरि शक्ति से आसरा चाहते हैं। नदी में गिरे उस आदमी जैसे हैं, जो आसपास किसी तैरती लकड़ी को न पाकर चीखता है कि किनारे पर कोई कहीं सुन ले और बचा ले। कण्ठ से धनीभूत पीड़ा प्रवाहित हो रही है।
गाते-गाते, दो-तीन आदमी फूट-फूटकर रोने लगे। बच्चों की तरह सिसक रहे हैं।’
फिर वहीं ‘जय जगदीश हरेे।’ इस प्रार्थना की वास्तविकता परसाई व्यक्तिगत अनुभव से जानते हैं। यह प्रार्थना उनमें आतंक, त्रास और भय उत्पन्न करती है, ‘मैं इससे नफरत करता हूं। जवानी से ही मैं सब प्रार्थनाओं और भजनों से नफरत करने लगा।’
व्यक्तिगत अनुभव, रचनाकार का अनुभव बनकर अपने पात्रों द्वारा भगवान को पुकारते देख उनके दुख का अनुभव करता-कराता है। परसाई के ये पात्र उनके आत्मीय हैं। लेकिन ये जिसे रक्षा के लिए पुकारते हैं, वह भ्रम या धोखा है। परसाई की तटस्थ दृष्टि इस विडंबना को देखती है। विक्षोभ उत्पन्न करती है। जो करूणा पुकार जड़ पत्थर चाहे जड़ हो, कठोर हो - सत्य है, उसका अस्तित्व है। लेकिन जिसे पुकारा जाता है, वह है - इस पर परसाई का पूरा सन्देह है। इस सत्य को केवल परसाई का रचनाकार जानता है, इसलिए उसकी यातना और अधिक बढ़ जाती है, वह कबीर के दुःख के आसपास की है।
कहानी के अंत में वाचक कवि को सेनेटोरियम में छोड़कर, उसके उपचार का प्रबंध करके लौटने लगता है। वाचक चलने लगा तो वही करूण स्थिति वाले रोगी उसे विदा करते हैं, जो दूसरों को संभालने की क्षमता रखते हैं - ‘बाहर चलने लगा, तो उन 40-50 मरीजों ने ‘नमस्कार, जै रामजी की’ की झड़ी लगा दी। कैसी आत्मीयता और दो घण्टे के इस परिचित के जाने का कैसा दुख। जैसे जन्म का साथी जा रहा हो।’
बाबा नागार्जुन ने रास्ते में ही रह जाने वाले असफल, अनाम लोगों पर एक कविता लिखी ‘उनको प्रणाम’, परसाई ने अपने कुछ सात्विक वृत्तियों के पात्रों को अपनी रचनाएं समर्पित की हैं। उनमें से एक है ‘जिन्दगी और मौत’, इस कहानी के रोगियों से उन्होंने रिश्ता जोड़ा, जन्म का साथी माना। इनके आचरण, संवेदनशीलता, सीमित सकर्मकता को देखते हुए क्या ये सचमुच रोगी लगते हैं? डा. विश्वनाथ त्रिपाठी द्वारा निराला पर लिखी कविता ‘पागल’ की याद आती हैं -
ओ, नजरूल इस्लाम, रूसो, वान गाग के साथी
हमें तुम्हें पागल कहते हैं
किंतु हमें तुम क्या कहते हो?
परसाई ने समाज रक्षक होने का दंभ करने वालों, करूणा का प्रदर्शन करने वालों, करूणा चुराने वालों और करूणावान होने में समर्थ लेकिन उससे विमुख लोगों पर सीधा व्यंग्य भी किया है। लेकिन उनके रास्ते और भी हैं। इस कहानी के माध्यम से वे ऐसे लोगों पर सार्थक टिप्पणी करते हैं, व्यंग्य का एक रूप यह भी है। गालिब की वे पंक्तियां फिर याद आती हैं -
कैदियों ने मुझे सर आँखों पर बिठाया है। मैं इनकी मुहब्बत पर कितना नाज करूँ? शहर में अगर कहीं वफ़ा है तो वह उन चोरों में है, जो पकड़े जा चुके हैं। मैं उनके साथ रिश्ता जोड़ना चाहता हूँ।’
काश! कोई ऐसा भी सेनेटोरियम बने जिसमें उन वास्तविक मनोरोगियों की चिकित्सा हो जो बाहर घूम रहे हैं। परसाई साहित्य भी ऐसा ही एक सेनेटोरियम है।

भाकपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक सम्पन्न

महंगाई के खिलाफ सशक्त आन्दोलन का आह्वान

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बंगलौर में 27 से 29 दिसम्बर 2009 को का. अजीज पाशा, सांसद की अध्यक्षता में सम्पन्न हुई।
बैठक में महासचिव का. ए.बी.बर्धन ने राजनीतिक-संगठनात्मक रिपोर्ट, उप महासचिव का. एस. सुधाकर रेधी ने पार्टी संगठन तथा उसके कार्य-कलाप तथा सचिव का. डी. राजा ने राष्ट्रीय परिषद की पिछली बैठक के बाद की कार्य रिपोर्ट पेश की। महासचिव का. ए.बी.बर्धन ने आर्थिक संकट, संप्रग सरकार की जन-विरोधी आर्थिक नीति, महंगाई को नियंत्रित करने में उनकी विफलता तथा सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के अंधाधुंध विनिवेश की उसकी नीति के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने देश के सामने विद्यमान अनेक राजनीतिक सवालों तथा सरकार की विदेश एवं घरेलू नीतियों पर भी रोशनी डाली। महासचिव द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल की स्थिति, माओवादी हिंसा, उत्तर-पूर्व में विद्रोह की समस्याओं एवं वाम एकता को मजबूत करने की जरूरत आदि के बारे में भी बताया गया है।
राष्ट्रीय परिषद द्वारा अनेक प्रस्ताव पारित किए गए जिनमें से कुछ को नीचे दिया जा रहा है।
महंगाई
”आसमान छूती महंगाई, खासकर खाद्य पदार्थों की आसमान छूती कीमतों - जो हर सप्ताह 20 प्वाइंट की दर से बढ़ रही है, चावल की खुदरा कीमत 51 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है जो पिछले 6 महीनों से निर्बाध रूप से जारी है - की वजह है खाद्यान्न व्यापार में सट्टेबाजी पर रोक लगाने में केन्द्र सरकार की पूर्ण विफलता और मांग-आपूर्ति के बेमेल होने की स्थिति में सरकार द्वारा वायदा कारोबार की इजाजत देना, खाद्य पदार्थों का बेरोकटोक निर्यात और मुख्य तौर से उदारीकरण की नीति एवं एक निर्बाध बाजार अर्थव्यवस्था की स्थापना। शर्मनाक बात यह है कि करीब बीस वर्षों के बाद देश ने चावल के आयात का सहारा लिया है।
खाद्य सुरक्षा नहीं रही, केरल जैसे कुछ राज्यों को छोड़कर अनेक राज्यों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली खत्म हो गयी है। यह चिन्ताजनक बात है कि देश फिर राष्ट्र की खाद्य संप्रभुता का भीतरघात करते हुए आज खाद्य के आयात पर निर्भरशील हो गया है।
सरकार के पास पूरी दृढ़ता से इस बदतर स्थिति का सामना करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं है। उसका यह तर्क कि विकास की उच्च दर हमेशा ऊंची कीमत से जुड़ी रहती है, एकदम अतर्कसंगत है। उसकी यह सफाई कि उच्च वसूली कीमत से यह स्थिति पैदा हुई, एकदम अस्वीकार्य है। इसके अतिरिक्त खाद्यान्न की बढ़ती कीमत इन वस्तुओं के उत्पादन में गिरावट के अनुपात से काफी अधिक है।
फिर कृषि में गंभीर संकट, उत्पादन में गिरावट जो वर्षों से चली आ रही है, की वजह है सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र की घोर उपेक्षा, कृषि में निवेश में लगातार कमी, आसान कर्ज की अनुपलब्धता और सबसे बढ़कर सामाजिक आधारभूत ढांचे का अभाव।
इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद कीमतों में असहनीय अभूतपूर्व वृद्धि एवं आम जनता के सामने उत्पन्न भयंकर मुसीबतों पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करते हुए केन्द्र सरकार से अपील करती है कि वह खाद्य पदार्थों की कीमत में अभूतपूर्व वृद्धि का समाधान करने एवं जनता की मुसीबतों को दूर करने के लिए अविलम्ब प्रभावी कदम उठाये।
आवश्यक वस्तु कानून को और अधिक कठोर बनाकर जमाखोरों एवं सट्टेबाजों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी अपील करती है कि विवेकसम्मत कीमत पर जनता को आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध कराकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में आम लोगों के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पुनस्र्थापित किया जाये एवं उसे सशक्त बनाया जाये। अल्पकालिक कदम उठाते हुए सरकार को अवश्य ही कृषि को पुनर्जीवंत बनाने एवं कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए, खाद्य एवं पदार्थों का निर्यात बन्द करना चाहिए, वायदा कारोबार बंद करना चाहिए, बेईमान खाद्यान्न व्यापारियों को आसान बैंक कर्ज देना बन्द करना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों पर अतिरिक्त बोझ बढ़ाते हुए बिक्री कीमत बढ़ाने के कदम का विरोध करती है और उसे वापस लेने की मांग करती है।
खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों की बुनियादी मानवीय समस्या का समाधान करने में सरकार की लगातार अकर्मण्यता की निन्दा करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जनता से अपील करती है कि वह सभी संभव रूपों में कार्रवाई के लिए आगे बढ़े, व्याकतम एकता कायम करे,
अप्रितिरोध्य आंदोलन करे और सरकार को अपनी नीति में बदलाव लाने के लिए मजबूर कर दे।
राष्ट्रीय परिषद महंगाई के खिलाफ राष्ट्रव्यापी आन्दोलन तेज करने के वामपंथी पार्टियों के निर्णय का स्वागत करती है और वह समस्त पार्टी से आह्वान करती है कि वह हजारों-लाखों लोगों को लामबंद करके इस अभियान को पूरी तरह सफल बनाये और मार्च महीने में संसद मार्च को असाधारण रूप से सफल बनाये।
तेलंगाना
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद दोनों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के दूसरे हिस्सों में उत्पन्न भारी विक्षोभ पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करती है। इस स्थिति की पूरी जिम्मेवारी कांग्रेस की है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी एक अलग राज्य के रूप में तेलंगाना के निर्माण का समर्थन करती है। उसने मार्च 2008 में आयोजित हैदराबाद पार्टी कांग्रेस के अनुरूप यह निर्णय लिया है। अन्य प्रमुख पार्टियों ने भी तेलंगाना के निर्माण को स्वीकार किया है। संसद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रवक्ता ने उसके निर्माण का आग्रह किया। उसके साथ ही उन्होंने जोरदार अपील की कि एक आम सहमति कायम करने तथा कार्यविधि एवं अन्य विवरण तैयार करने के लिए तुरन्त एक सर्वदलीय बैठक बुलायी जाये। उसके लिए व्यापक सलाह-मशविरे की प्रक्रिया की जरूरत है।
एक राज्य के विभाजन का तकाजा है कि उससे संबंधित सभी मसलों का समाधान किया जाना है, आम सहमति के लिए व्यापक प्रयास किया जाना है और आशंकाओं को दूर किया जाना है तथा उन लोगों को मनाया जाना है जो उससे मतभेद रखते हैं।
कांग्रेस नेतृत्व ने जिसने तेलंगाना के निर्माण का पूरा श्रेय स्वयं लेने और दूसरी पार्टियों पर भारी पड़ने का सपना संजो रखा था, पूरी प्रक्रिया को जल्दबाजी में पूरा करने का प्रयास किया। तेलंगाना की मांग पर काफी विलम्ब से प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी पर फटाफट मध्यरात्रि में उसकी घोषणा की गयी। यहां तक कि संप्रग के घटकों से भी परामर्श नहीं किया गया। राज्य के दोनों हिस्सों में कांग्रेस नेता अभी तेलंगाना के निर्माण के पक्ष में और विरोध में भावनाओं को भड़का रहे हैं। कुछ ऐसी पार्टियां भी ऐसा ही कर रही हैं।
कांग्रेस की जोड़तोड़ ने पूरे आंध्र राज्य को संकट में डाल दिया है। विधायकों ने सामूहिक रूप से इस्तीफा दे दिया है। यहां तक कि मंत्रियों ने भी इस्तीफा दे दिया है और सरकार भी ठहराव में है। अब कांग्रेस नेतृत्व यह कहते हुए पैर पीछे खींच रहा है कि राज्य विधान सभा को अवश्य ही एक प्रस्ताव पास करना होगा। वह दोनों प्रतिद्वंद्वियों की भावनाएं भड़काने के बाद ऐसा कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मांग करती है कि कांग्रेस नेतृत्व को यह खेल बंद करना चाहिए। उसे अवश्य ही राज्य के दोनों हिस्सों में अपने पार्टी नेताओं को नियंत्रित और अनुशासित करना चाहिए। उसे अवश्य ही तेलंगाना राज्य के निर्माण के लिए निर्णय लेना चाहिए और विधान सभा में एक एकीकृत प्रस्ताव पेश करना चाहिए ताकि पूरे राज्य की जनता के बीच आम सहमति कायम हो सके तथा एक भाईचारे की भावना में राज्य का विभाजन हो सके।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग गठित करने के किसी कदम का विरोध करती है। यह केवल तेलंगाना पर निर्णय को स्थगित करने का ही एक कदम होगा और उस उलझन भरे दलदल से निकलने का एक प्रयास होगा जिसे स्वयं कांग्रेस ने ही निर्मित किया है। वह मुसीबत का पिटारा खोल देगा और सभी राज्यों में उन तत्वों को प्रोत्साहित करेगा जो राज्यों को दो, तीन या अधिक इकाइयों में बांटने के अभियान में लगे हुए हैं। यह महंगाई, खाद्य सुरक्षा, रोजगार के नुकसान, बेरोजगारी आदि जैसे प्रभावित करने वाले मुख्य मसलों पर संघर्ष करने से जनता के ध्यान को दूसरी ओर मोड़ने का ही काम करेगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद राज्य के दोनों हिस्सों की जनता के सभी तबकों से अपील करती है कि वे वर्तमान आन्दोलन एवं जवाबी आन्दोलन को बंद करे जो कटुता के बीज बो रहे हैं, सामान्य स्थिति बहाल करें तथा तेलंगाना के निर्माण के लिए एवं आंध्र प्रदेश के बाकी हिस्से के अलग राज्य के लिए संयत रूप से कार्य करे जो अब अपरिहार्य हो गया है।
कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मेलन
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद कोपेनहेगन जलवायु शिखर सम्मेलन के विचार-विमर्श तथा परिणामों का विश्लेषण करने के बाद अमरीका और अन्य विकसित देशों को कार्बन उत्सर्जन में कमी करने के संबंध में किसी समझौते पर नहीं पहुंचने के लिए जिम्मेवार समझती है।
तथाकथित कोपेनहेगन समझौते ने धनी औद्योगिक देशों के लिए कोई बाध्यकारी लक्ष्य निर्धारित नहीं किया है जैसी कि क्योटो करार (1997) में मांग की गयी थी जिसकी अभिपुष्टि करने में अमरीका लगातार इन्कार करता रहा है। अब उनका प्रयास केवल क्योटो करार को खत्म करना ही नहीं है बल्कि संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क तथा बाली कार्रवाई योजना (2007) का भीतरघात करना भी है।
हालांकि भारत ने चीन, ब्राजील तथा दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर कार्य किया पर अंततः वह ”अंतर्राष्ट्रीय सलाह-मशविरा एवं विश्लेषण“ के लिए सहमत हो गया। यह भारत की घोषित स्थिति में एक बदलाव है। इसे किसी कानूनी बाध्यकारी समझौते के अभाव एवं तकनीकी के स्थानांतरण पर किसी समझौते के अभाव की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह एक तरह से अमरीका को तुष्ट करने का जोड़-तोड़ है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद भारत सरकार को सावधान करती है कि वह विकासशील देशों की एकता को तोड़ने की अमरीका की दुरभिसंधि से चैकस रहें। वह सरकार से आग्रह करती है कि वह ‘बेसिक’ में हिस्सा लेते हुए जी-77 तथा जी-192 के देशों के साथ घनिष्ठ रूप से काम करे और विकसित देशों को अपनी ऐतिहासिक जिम्मेवारी को स्वीकार करने एवं क्योटो करार के अनुरूप काम करने के लिए मजबूर करें। विकासशील देशों की एकता अगले वर्ष मेक्सिको में होने वाली वार्ता के लिए आवश्यक है।
वनभूमि पर आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन में भीतरघात के प्रयास का विरोध
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वनवासी अधिकार मान्यता कानून 2006 (2007 का कानून) की व्यवस्थाओं तथा उसके नियमों के तहत आदिवासियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के कब्जे में वनभूमि के वितरण के लिए आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन के लिए 31 दिसम्बर 2009 की तिथि निर्धारित करने के केन्द्र सरकार के कथित निर्णय पर गंभीर चिंता व्यक्त करती है, हालांकि इस कानून ने उसके कार्यान्वयन के लिए कोई समय-सीमा नहीं लगायी है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद समझती है कि समय सीमा लगाने का निर्णय गैरकानूनी है और इस कानून का भीतरघात करने का सरकार का एक सुनियोजित प्रयास है जिसे एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण कानून समझा गया है।
वास्तव में लाखों वनवासी, दोनों आदिवासी तथा अन्य गरीब लोग, अपने व्यक्तिगत एवं सामूहिक दावों का आवेदन भी नहीं दे सके हैं क्योंकि उनका आवास सुदूर जंगल में इलाकों में है और वे अधिकांशतः निरक्षर हैं तथा सूचना का अभाव है एवं आदिवासी आबादी वाले राज्यों के अनेक हिस्सों में माओवादी उग्रवाद एवं विद्रोह द्वारा भारी कठिनाइयां पैदा कर दी गयी हैं। ग्राम सभा तथा पंचायतें भी अभी तक भूमि अधिकार सर्टिफिकेट जारी करने के लिए सिफारिशें देने की औपचारिकताओं की प्रक्रिया को पूरी नहीं कर सकी है। इस घड़ी में एक समय सीमा लगाकर कार्यान्वयन की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास गैरकानूनी है और कानून के लाभ प्राप्तकर्ताओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन है।
इसलिए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी केन्द्र तथा संबंधित राज्य सरकारों से अपील करती है कि वे आदिवासी अधिकार कानून के कार्यान्वयन की प्रक्रिया को खुला रखें जो ब्रिटिश शासन के समय से ही और उसके बाद शासक वर्गों द्वारा देश की आदिवासी जनता के साथ किये गये ऐतिहासिक अन्याय को दूर करने के लिए बनाया गया था।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी आदिवासी संगठनों तथा आदिवासी जनों के बीच काम करने वाले एनजीओ से अपील करती है कि वे इस कानून का भीतरघात करने के केन्द्र सरकार के घृणित प्रयासों को नाकाम करने के लिए एक साथ आयें। इस कानून का राष्ट्र ने स्वागत किया था हालांकि निहित स्वार्थों के दबाव के कारण देरी से उसके नियम बनाये गये। अब किसी भी तरह की समय सीमा लगाये बिना उसके पूर्ण कार्यान्वन की इजाजत दी जानी चाहिए।
खाद्य सुरक्षा कानून
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद खाद्य सुरक्षा पर प्रस्ताववित कानून पर गंभीर चिन्ता व्यक्त करती है।
प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून में अनेक कमियां हैं जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली को केवल बीपीएल श्रेणी तक ही सीमित रखना, सबों के लिए खाद्य सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी से वापस होने का केन्द्र का प्रयास और बीपीएल एवं एपीएल श्रेणियों के लिए मानदंड निर्धारित करने के राज्य सरकार के अधिकार को अस्वीकार करना।
योजना आयोग समेत सरकारी निकायों में गरीबी निर्धारण के मानदंड पर मतभेद है।
केन्द्र बीपीएल तथा एपीएल मानदंडों को निर्धारित करने के राज्यों के अधिकार को हड़पने क प्रयास कर रहा है। इसके अतिरिक्त अनेक राज्य सरकारें खाद्यान्न 2 रुपये प्रति किलो तथा 1 रु. प्रतिकिलो की दर से दे रही है। प्रस्तावित कानून कीमत बढ़ाकर 3 रुपये प्रतिकिलो कर देगा एवं खाद्यान्न की मात्रा 35 किलो से घटाकर 25 किलो कर देगा।
कांग्रेस के नेतृत्ववाली यूपीए सरकार समावेशी विकास की बात करती है। लेकिन वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली से बड़ी संख्या में गरीब लोगों को अलग कर रही है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद केन्द्र सरकार से आग्रह करती है कि वह खाद्य सुरक्षा के मसले पर विचार करने के लिए राज्य के खाद्य मंत्रियों की एक बैठक आयोजित करे और केरल की एलडीएफ सरकार की पहल को भी ध्यान में रखे जिसने इस मसले पर राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया।
वह यह मांग भी करती है कि प्रस्तावित कानून सभी राज्य सरकारों को भेजे जायें तथा उस पर बहस की जाये। सबों को खाद्य सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए।
उत्तर-पूर्व के विद्रोही ग्रुपों से राजनीतिक वार्ता
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद ने मिलिटेंट ग्रुपों की कार्रवाइयों के चलते जो अलग राज्य तथा संप्रभुता की मांग कर रहे हैं, उत्तर पूर्वी क्षेत्र में उत्पन्न गंभीर स्थिति पर विचार किया।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद भारत सरकार से आग्रह करती है कि वह मसले के समाधान के लिए बिना किसी पूर्व शर्त के उल्फा और अन्य मिलिटेंट और अन्य गु्रपों से राजनीतिक बातचीत शुरू करे। भारत सरकार और उत्तर-पूर्व के मिलिटेंट ग्रुपों के नेतृत्व द्वारा किसी भी बहाने पर राजनीतिक वार्ता की प्रक्रिया में विलंब नहीं किया जाना चाहिए।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सशस्त्र बल विशेष अधिकार कानून को तुरन्त वापस करने की मांग करती है जिसका केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा दुरूपयोग किया जा रहा है। इस मामले पर विचार करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त कुछ समितियों का भी यह विचार है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद राजनीतिक पार्टियों, बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक संगठनों से यह अपील करती है कि वे देश के हित में इस मांग को स्वीकार करने के लिए भारत सरकार पर दबाव डालें।

ललितपुर के भूमि अधिग्रहण के खिलाफ मुख्यमंत्री को भाकपा राज्य सचिव का पत्र

महोदय,
हम सभी जानते हैं कि प्रदेश का बुन्देलखण्ड क्षेत्र एक बहुत ही पिछड़ क्षेत्र है। उसमें भी ललितपुर जनपद और भी अधिक पिछड़ा है।
इस जनपद के विकास और सम्पर्ण बुन्देलखण्ड के विकास की आवाज भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सदैव से उठाती रही है। आज भी भाकपा मांग कर रही है कि वहां सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्थापित किये जायें।
इसके पीछे भाकपा की समझ है कि ललितपुर जनपद और समूचे बुन्देलखण्ड में तमाम पठारी, गैर उपजाऊ तथा वन विभाग की ऐसी जमीन जिस पर वृक्ष नहीं है, मौजूद है जिसके रहते बिना कृषि योग्य भूमि को लिये ही तमाम उद्योग खोले जा सकते हैं।
अब पता चला है कि आपकी सरकार ललितपुर में एक ऊर्जा संयत्र बनाने जा रही है। हम इसका स्वागत करते हैं।
लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की जनपद ललितपुर काउंसिल ने मेरे पास सैकड़ों हस्ताक्षरों से युक्त उस ज्ञापन की प्रति भेजी है जो आपको, महामहिम राज्यपाल जी को तथा माननीय प्रधानमंत्री, भारत सरकार को भी भेजा गया है।
ज्ञापन से पता चलता है कि उपर्युक्त विद्युत परियोजना के निर्माण के लिये ललितपुर जनपद के विकास खण्ड जखौरा के ग्राम दैलवारा, जैरवारा, टौरिया, रांकड तथा थनवास आदि ग्रामों के किसानों की उपजाऊ जमीनों को अधिग्रहीत किये जाने की योजना चल रही है।
स्पष्ट कर दें कि ये भूमि बेहद उपजाऊ है तथा दो फसल देने वाली सिंचित जमीन है। इन जमीनों के मालिक अधिकतर दलित और आदिवासी हैं तथा राजघाट बांध के डूबे क्षेत्र से भगाये गये किसान हैं जो अभी बर्बादी से उबर भी न पाये थे कि दोबारा बर्बादी के कगार पर लाकर खड़े कर दिये गये हैं।
हम भाकपा के बुन्देलखण्ड के विकास के लक्ष्य को दोहराते हुए कहना चाहते हैं कि उपर्युक्त परियोजना के लिये ‘नरेन्द्रा एक्सप्लोसिव’ नामक वर्षों से बन्द पड़े, उद्योग की 1100 एकड़ जमीन का उपयोग किया जाये। यह जमीन इस उद्योग के लिये किसानों से अधिग्रहीत की गयी थी तथा शेष वन विभाग से ली गयी थी। आज उसे वापस ले वहां विद्युत परियोजना का निर्माण किया जा सकता है।
दूसरे जनपद बुन्देलखण्ड में हजारों एकड़ जंगल की ऐसी जमीन मौजूद है जिस पर वृक्ष नहीं है। उसका इस्तेमाल भी उक्त परियोजना के लिये किया जा सकता है।
केन्द्र सरकार के उद्योग मंत्रालय ने भी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि उद्योगों के लिये उपजाऊ जमीने न अधिग्रहीत की जायें।
खाद्यान्न संकट, बेरोजगारी और किसानों को बर्बादी से बचाने को भी यह जरूरी है।
अतएव आपसे निवेदन है कि ललितपुर जनपद में राज्य सरकार विद्युत परियोजना का अवश्य निर्माण करे परन्तु परियोजना के लिये किसानों की उपजाऊ जमीनें कतई न ली जायें।
हम समझते हैं कि आप जनहित में, कृषि हित में एवं दलित हित में उक्त परियोजना का निर्माण ‘नरेन्द्रा एक्सप्लोसिव’ की बेकार पड़ी जमीन पर अथवा किसी दूसरी गैर उपजाऊ जमीन पर करायेंगी। अन्यथा भाकपा किसानो के आन्दोलन का पूरा-पूरा सहयोग एवं समर्थन करेगी।
सधन्यवाद।

कोपनहेगन समझौताः विकासशील देशों पर नया लगाम

कोपनहेगन जाने के पूर्व ही पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने घोषित किया था कि भारत स्वतः कार्बन उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कटौती करेगा तो संसद में आपत्ति प्रकट की गयी क्योंकि ऐसी एकतरफा घोषणा से भारत की स्थिति कमजोर पड़ती थी। तब जयराम रमेश ने कहा था कि यह आश्वासन भारतीय जनगण को संबोधित है और ऐसा वे कोपनहेगन में नहीं करने जा रहे हैं और यह भी कि पर्यावरण के क्योटो प्रोटोकाल से पीछे हटने का प्रशन नहीं उठता है। ऐसी दुमंुही बातों पर तब भी किसी ने विश्वास नहीं किया था, पर अब जब जयराम रमेश कोपनहेगन में अपने दोनों ही हाथों से ऐसा ही लिखित समझौते पर हस्ताक्षर कर लौटे हैं तो झेंपते से बोले कि उन्होंने क्योटो संधि पर लचीला रूख अपनाया। लाज छिपाने का यह अनोखा तरीका है। असल बात तो यह है कि उन्होंने क्योटो संधि को अलविदा कर दिया है।

आखिर क्या मजबूरी थी कि भारत क्योटो संधि से पीछे हट गया? विकासमान देशों के साथ मिलकर भारत ने जो दबाव बनाया था, ऐसा करके भारत स्वयं विकासमान देशों से अलग-थलग हो गया। विकसित देशों ने अफ्रीकी देशों को आर्थिक और तकनीकी सहायता का आश्वासन देकर पहले से ही फोड़ने का प्रयास कर रहे थे। ऐसे में भारत को ज्यादा सावधानी बरतनी थी। इस तरह बेजरुरत भारत-अमरीकी परमाणु संधि के बाद फिर एक बार भारत की घुटनाटेकू विदेश नीति उजागर हुई है। साम्राज्यवाद के समक्ष ऐसी ही घुटनाटेकू नीति के चलते भारत के संबंध अपने ही पड़ोसी देशों के साथ अच्छे नहीं हैं। संप्रग शासनकाल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख हमेशा ही दुविधाजनक संदिग्ध होती गयी है।
राष्ट्र संघ के 187 देशों का सर्वसहमत और अत्यंत न्यायपूर्ण क्योटो संधि को तजने का कोई कारण नहीं था। क्योटो संधि के अंतर्गत विकसित देशों के ऊपर कानूनी प्रतिबंध था कि वह अपना कार्बन उत्सर्जन घटाकर 2.7 टन प्रतिव्यक्ति की सीमा के अंदर करे। वर्तमान में अमेरिका 23.5 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्सर्जन करता है, जबकि भारत में महज 1.7 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन उत्सर्जन है। क्योटो संधि के अंतर्गत विकासशील देशों को कार्बन उत्सर्जन की सीमा घटाकर 1.4 टन प्रतिव्यक्ति करने की है। ऐसी स्थिति में भारत को मात्र 0.3 टन प्रतिव्यक्ति कार्बन घटाना होता। अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर करना यह कहकर इंकार किया कि इस संधि का बुरा असर उसकी अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। तो क्या भारत का अपना कार्बन उत्सर्जन 20 प्रतिशत कम करने से भारतीय अर्थव्यवस्था पर अच्छा असर पडेगा?
जाहिर है, भारत फिर अमेरिकी फांस में फंस गया है। भारत को नये कोपनहेगन प्रस्ताव के मुताबिक उत्सर्जन कम करने संबंधी नियमित रपट देनी होगी और उसकी जांच, निरीक्षण माॅनिटरिंग, वेरिफिकेशन के नाम पर भारत में अमेरिकी दखलंदाजी बढ़ती जाएगी और तब अमेरिका पर कोई ऊंगली नहीं उठाएगा कि वह क्यों अपना कार्बन उत्सर्जन कम नहीं कर रहा है।
कार्बन उत्सर्जन का संबंध निःसंदेह अर्थव्यवस्थ के साथ जुड़ा है और इसलिए अमेरिका आर्थिक क्षेत्र में अपना दबदबा बनाये रखने के लिए पर्यावरण संरक्षण के मामले में टांगे भिड़ा रहा है, उसी तरह जैसा उसने परमाणु अप्रसार संधि; एनपीटी के मामले में किया। सर्वविदित है माल उत्पादन के लिए कारखानों में मुख्यतः कोयला, बिजली और तेल का इंधन इस्तेमाल होता है। कोयला, तेल, बिजली जलाने और तैयार करने से कार्बन डाइआक्साइड गैस बनती है। इसे ही ‘ग्लोबल वार्मिंग’ कहते हैं। धरती पर तापमान बढ़ने से पहाड़ों पर जमे ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं। उत्तर ध्रवु आर्कटिक और दक्षिण ध्रुव अंटार्कटिका की बर्फ भारी मात्रा में पिघल रही है। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है। प्रकटतः इससे दुनिया के समुद्र तटीय शहरों और आवासों का अस्तित्व खतरें में है। कार्बनडाइआक्साइड गैस पृथ्वी के वायुमंडल में लिपटा ओजोन गैर परत को भी कमजोर करता है। ओजोन गैस परत पृथ्वी का कवच है, जो सूर्य की हानिकारक अल्ट्रावायलट किरणों से पृथ्वी को बचाता है। विकसित देशों में ज्यादा कल-कारखानें हैं। इसलिए ये प्रदूषण फैलाने वाले सबसे बडे़ देश हैं। अमेरिकी नीति का मर्म यह है कि वह प्रदूषण फैलाने के अर्थात् कार्बन उत्सर्जन के अपने अधिकार सुरक्षित रखना चाहता है, वहीं वह विकासमान देशों को कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए कानूनी तौर पर प्रतिबंधित करना चाहता है। परमाणु अप्रसार संधि; एनपीटी पर हस्ताक्षर कराकर उन्होंने ऐसा ही किया। वे स्वयं आणविक हथियार रखेंगे, किंतु दूसरों को इसकी इजाजत नहीं देंगे। इससे उनकी वरीयता बनी रहेगी। जाहिर है, औद्योगिक देश अपने कारखानों का माल उत्पादन जारी रखने के लिए पिछड़े देशों को कारखाना विस्तार रोकना चाहते हैं।
आर्थिक विकास की विश्व प्रतियोगिता में हर देश ऊर्जा की खपत में वृद्धि कर रहा है और इससे उसी अनुपात में दुनिया में कार्बन-उत्सर्जन बढ़ रहा है। इस तरह बेलगाम माल उत्पादन और मुक्त बाजारवाद से दुनिया में एक तरफ कुछ देश और कुछ व्यक्ति अपार संपदा समेटे हैं, तो दूसरी तरफ इस दौर में न केवल दुनिया में गरीबी और दारिद्रय का फैलाव हो रहा है, बल्कि संपूर्ण पृथ्वी का अस्तित्व ही गंभीर खतरे के आगोश में है। इस खतरे की ओर ध्यान आकृष्ट करने के लिए मालद्वीप की सरकार ने अपने मंत्रिमंडल की बैठक समुद्र की गहराई में पैैठकर की तो नेपाल सरकार का मंत्रिमंडल ने एवरेस्ट के तुंग शिखर पर जाकर बैठक रचायी। वैज्ञानिकों का आकलन है कि एशिया-अफ्रीका के समुद्र तटीय देशो का बड़ा भाग 2150 तक समुद्र के गर्भ में चला जाएगा। भारत के कलकत्ता, मुंबई जैसे शहर भी खतरे में होंगे। अनुमान है कि बंग्लादेश का एक तिहाई भाग समुद्र में डूबेगा और वहां से कई करोड़ आबादी का पलायन होगा। बंग्लादेशी भागकर कहां जायेंगे? भारत उनके लिए सबसे सुगम है। ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया में बड़ा उलटफेर होने वाला है।
कोपनहेगन में फिर अमेरिकी कूटनीति की जीत हुई। वह 1992 के संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्बन्धी फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी), 1997 की क्योटो संधि और 2004 की बाली कार्ययोजना प्रावधानों को ठेंगा दिखाने में कामयाब हो गया, जिसके मुताबिक विकसित औद्योगिक देशों के लिए पहले अपना कार्बन उत्सर्जन घटाना लाजमी था। जयराम रमेश के ‘लचीलेपन’ के चलते अब ये दोनों ही दस्तावेज बेकार हो गए। संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन और क्योटो संधि विकासमान देशों के हित में अत्यंत महत्वपूर्ण थे।
अमेरिका स्वाभाविक ही कोपनहेगन में अपनी दोहरी जीत से प्रसन्न है। विश्व का 4.5 प्रतिशत आबादी वाला देश, जो 22 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन का दोषी है, वह किसी प्रकार की बाध्यकारी वचनबद्धता से साफ बच गया और उलटा वह भारत जैसे विकासमान देशों को वचनबद्धता के दायरा में खींच लाने में कामयाब हो गया, जिसका विकसित औद्योगिक देशों के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन ही अत्यल्प है। निश्चय ही, यह विकासशील देशों के आर्थिक विकास पर नया लगाम साबित होगा।

सत्य नारायण ठाकुर

हिन्दी ब्लॉग टिप्सः तीन कॉलम वाली टेम्पलेट