Saturday 16 January 2010

बैंकों के विलय का विरोध

नयी दिल्लीः लोकसभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रबोध पंडा ने स्टेट बैंक आॅफ सौराष्ट्र (रिपील) और स्टेट बैंक आॅफ इंडिया (सबिसिडयरी बैंक्स) संधोधन विधेयक, 2009 का कड़ा विरोध किया।
उन्होंने लोकसभा में प्रधानमंत्री के एक भाषण का हवाला देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने भूमंडलीय आर्थिक मंदी के संदर्भ में कहा था कि हमारे देश में बैंकिग प्रणाली मजबूत है और हमें अपनी बैंकिंग प्रणाली पर गर्व है। प्रधानमंत्री ने यह भी कहा था कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली काफी मजबूत है। उस समय मैंने समझा था कि प्रधानमंत्री हमारे देश की बैकिंग प्रणाली को प्रमाण पत्र दे रहे हैं। लेकिन अचानक 10 जून को अखबारों में यह खबर छपी कि वित्तमंत्री ने बैंकों के सुदृढ़ीकरण के पक्ष में एक बयान दिया। वित्तमंत्री ने कहा था कि सभी बैंकों की प्रतिस्पर्धा का स्तर बढ़ाना तथा वित्तीय अस्थिरता का खतरा कम किया जा सके। ऐसा प्रतीत होता है कि भूमंडलीकरण एवं आर्थिक सुधार नीति का हम चुपचाप अनुसरण कर रहे हैं। हमारे देश के पुराने दृष्टिकोण को चुपचाप बदला जा रहा है।
जहां तक सरकारी बैंकों की बात है, भारतीय स्टेट बैंक हमारे देश का सबसे बड़ा बैंक है। शुरु में उसके सात सहयोगी बैंक थे और अब यदि हम इंदौर बैंक एवं सौराष्ट्र बैंक को छोड़ दें तो उसके पांच सहयोगी बैंक रह जायेंगे। ये बैंक हैं, स्टेट बैंक आॅफ ट्रावनकोर, स्टेट बैंक आॅफ पटियाला, स्टेट बैंक आॅफ बीकानेर एंड जयपुर, स्टेट बैंक आॅफ मैसूर तथा स्टेट बैंक आॅफ हैदराबाद। पता नहीं सरकार के दिमाग में क्या है। क्या सरकार इन सहायक बैंकों का विलय करना चाहती है? यदि ऐसा है तो उसे स्पष्ट करना चाहिए ताकि सदन में बैंकों के सुधार के बारे में बहस हो सके। समझा जाता है कि निजी बैंकों बड़े पैमाने पर सुदृढ़ीकरण कर रहे हैं। लेकिन हमें पता नहीं कि सरकार उस रास्ते पर चलेगी या नहीं। यह कोई कैबिनेट का विषय नहीं है। यह एक बुनियादी सवाल है। इस पर संसद में ही बहस होनी चाहिए। अभी तक ऐसा नहीं हुआ है।
जहां तक भमंडलीकरण परिस्थिति का सवाल है, अभी क्या स्थिति है? भूमंडलीय स्तर पर बैंकिंग प्रणाली को गंभीर संकट का सामना करना पड़ा है। लेकिन हमें ऐसे संकट का सामना करना नहीं पड़ रहा है और इसका कारण है कि हमारे यहां सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र बैंक काफी अच्छा काम कर रहे हैं। हमारे यहां 30 सार्वजनिक क्षेत्र बैंक हैं और उनकी स्थिति अच्छी है। वे हमारे देश के कोने-कोने में फैले हुए हैं। वे बड़े पैमाने पर लोगों की सेवा कर रहे हैं जिनमें किसान, गरीब एवं अन्य वर्ग के लोग शामिल हैं।
छोटे-छोटे कर्ज लेने वालों की मदद करने के लिए इन बैंकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। विलय के बाद ये बैंक किसानों एवं गरीब लोगों की मदद करने लायक नहीं रह जायेंगे। जिन बैंकों का विलय किया जा रहा है वे कर्ज लेने वालों की किस प्रकार मदद कर पायेंगे? इस पहलू को समझा जाना चाहिए।
यहां यह उल्लेख करना उचित होगा कि पिछले साल अमरीका में बड़े बैंकों एवं वित्तीय संस्थाओं के विफल हो जाने के बाद अमरीका ने यह महसूस किया कि छोटे बैंक के प्रबंधन की तुलना में बड़े का प्रबंधन ज्यादा कठिन है। जो बात अमरीकी अधिकारियों की समझ में आयी क्या वह बात हमारी सरकार की समझ में नहीं आ सकती? विलय के असर के कारण ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक मंदी की नौबत आयी। केवल यह बात नहीं है कि विलय के कारण मानव संसाधनों का एक यूनिट के रूप में ट्रांसफर हो जायेगा। प्रबंधन का क्या होगा? कर्मचारियों का क्या होगा? कर्ज लेने वालों का क्या होगा? ये सभी पहलू विलय से जुड़े हुए हैं।
मैं सरकार से अनुरोध करना चाहूंगा कि वह इसे हल्के ढंग से नहीं ले। विलय के बारे में पूरी बहस होनी चाहिए और बिना बहस के ऐसा कोई विधयक नहीं लाया जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि हजारों बैंक कर्मचारी विलय के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। वे सरकार की इस कारवाई का विरोध कर रहे हैं। वे विलय के बिल्कुल खिलाफ हैं, फिर सरकार इस संबंध में विधेयक लाने की बात क्यों सोच रही है? मैं इसका विरोध करता हूं।
रेलवे के कामकाज का
निजीकरण न किया जाये
नयी दिल्लीः लोकसभा में रेल मंत्रालय की अनुपूरक अनुदान मांगों पर बहस में हिस्सा लेते हुए सीपीआई के सदस्य प्रबोध पंडा ने कहाः
सर्वप्रथम मेरा कहना है कि यह अनुपूरक अनुदान मांग है। यह पूरा बजट नहीं है। अतः विचार-विमर्श की अत्यंत सीमित गुंजाइश है। मुझे अपने संसदीय चुनाव क्षेत्र के संबंध में कई बातें कहनी है, पर मैं उस पहलू पर नहीं जा रहा हूं। क्योंकि मैं रेलवे की सलाहकार समिति का सदस्य हूं। अतः मैंने तमाम मुद्दे उठाये हैं। रेल मंत्री ने उन मीटिंगों की
अध्यक्षता की थी। अतः वे जानती हैं कि मैंने क्या कहा था। मैंने अनेक बातें कहीं। पिछले बजट भाषण में रेल मंत्री ने कुछ महत्वपूर्ण परियोजनाओं की घोषणा की। वासुमत पिं्रटिंग्स, बर्न स्टैंडर्ड और ब्रेथवेट के अधिग्रहण के संबंध में की गयी घोषणाअओं का क्या हुआ? उच्च क्षमता वाले माल डिब्बे के निर्माण एवं आपूर्ति के लिए कोलकाता में मजेरहाट में नयी फैक्टरी के प्रस्ताव की क्या स्थिति है? डालमिया नगर में नयी फैक्टरी की घोषणा का क्या हुआ? नंदीग्राम, लालगढ़ और बेलपहाड़ी तक नयी रेलवे लाइनें बिछाने की घोषणाओं का क्या हुआ? मैं मंत्री महोदय से जानना चाहता हूं कि इन घोषित परियोजनाओं के संबंध में क्या कदम उठाये गये और उनकी क्या स्थिति है? यह सही है कि कुछ परियोजनाएं जो चल रही थी पहले ही काम कर रही हैं। रेलमंत्री को धन्यवाद है कि वे मदद कर रही है और उनका मंत्रालय भी इन परियोजनाओं को निर्धारित समय तक पूरा करने के बारे में मदद कर रहा है। पर अन्य मामले जस के तस हैं।
मैं अपने चुनाव क्षेत्र से संबंधित दो-तीन बातें रखना चाहता हूं। खड़गपुर में रेलवे के पास बहुत अधिक जमीन है। मैं खड़गपुर रेलवे स्टेशन पर रेलवे द्वारा बनाये गये और बनाने के लिए रेलवे द्वारा अनुमति दिये गये अधिकृत स्टालों के संबंध में कह रहा हूं। उन्हें बिजली नहीं दी जा रही है। यदि रेलवे इन अधिकृत स्टालों को बिजली देने की स्थिति में नहीं है तो वे पश्चिम बंगाल बिजली बोर्ड को आवेदन करेंगे। उस हालत में रेलवे को उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र देना चाहिए। पर न तो उन्हें बिजली दी जा रही और न ही अनापत्ति प्रमाण पत्र। इतना ही नहीं, मंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा और अन्य समय भी कहा, जो समाचार पत्रों में आया है कि वह केटरिंग (खानापान सेवा) नीति पर फिर से विचार करेंगी। रेलवे की वर्तमान केटरिंग नीति गरीब लोगों के पक्ष में नहीं है। बड़ी तादाद में बेरोजगार युवा न केवल साधारण स्टेशनों बल्कि ‘ए’ और ‘बी’ केटेगरी के स्टेशनों पर खाने पीने की चीजें बेचा करते थे। अब उन्हें खदेड़ दिया गया है। वे छोटी-छोटी ट्रालियों से अपना धंधा कर रहे थे, मेरा रेल मंत्री से अनुरोध है कि वे समस्या पर ध्यान दे ताकि ये गरीब बेरोजगार युवा अपनी रोजी-रोटी से वंचित न हों।
वासुदेव आचार्य रेलवे की आचार्य स्थायी समिति के अध्यक्ष थे। पर स्थायी समिति को केवल सिफारिश देने का ही हक है। मेरा कहना है कि यह एक वास्तविक समस्या है। मैं एक अन्य वास्तविक समस्या, जिसे मैं इस सदन में कई बार मंत्री के सामने भी उठा चुका हूं, का जिक्र करना चाहता हूं और वह यह है कि खड़गपुर में 50,000 से अधिक लोग रेलवे की जमीन पर रह रहे हैं। वे कोई आज वहां नहीं रहने लगे। उनका वहां रहना अनधिकृत हो सकता है, पर वे वहां रेलवे जंक्शन पर निर्माण कार्य के लिए आये हैं। रेलवे अधिकारी कभी-कभी उन्हें उस क्षेत्र को खाली करने की धमकी देते हैं। यह एक वास्तविक सामाजिक समस्या है। रेल मंत्री ने कई बार घोषणाएं की हैं कि रेलवे का न केवल प्रशासकीय दायित्व है बल्कि कुछ सामाजिक दायित्व भी हैं। अतः रेल मंत्री को इस समस्या पर गौर करना चाहिए।
अब मैं एक अन्य बात उठाऊंगा जो अन्य सदस्य भी इस सदन में उठा चुके हैं। आज कल रेलवे के विभिन्न कामों को निजी पार्टियों को पहले ही दिया जा चुका है। यह ठीक नहीं। रेलवे देश का सबसे बड़ा सार्वजनिक क्षेत्र संगठन है। हमें रेलवे पर गर्व है। अतः इसका निजीकरण नहीं होना चाहिए। यह एक गंभीर नीतिगत विषय है। इस विषय को रेलमंत्री को गंभीरता से लेना चाहिए। मैं सरकार द्वारा मांगी गयी अनुपूरक अनुदान मांगों पर आपत्ति नहीं कर रहा हूं। पर इन तमाम मुद्दों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यदि इन पर ध्यान नहीं दिया जाता तो तमाम घोषणाएं बेकार है, उन्हें राजनैतिक फायदे के लिए किया गया, इसके अलावा अन्य किसी बात के लिए। यही मेरा कहना है।
जनता की सेवा हो
रेलवे का आदर्श
नयी दिल्लीः लोकसभा में रेल मंत्रालय की अनुपूरक अनुदान मांगों पर बहस के दौरान सीपीआई के सदस्य पी. लिंगम ने कहा:
मैं रेलवे को यह कहना चाहता हूं कि जनता की सेवा उसका परम-आदर्श होना चाहिए। उसे सर्वोच्च प्राथमिकता देने की जरूरत है। देश के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जहां तक रेलवे की सेवा और लाभ आज तक नहीं पहुंचे है। एक दीर्घकालीन दृष्टिकोण से रेलवे के नये रूटों की पहचान करनी चाहिए और वहां रेलवे की लाइनें बिछायी जानी चाहिए।
मेरे चुनाव क्षेत्र में वतीरायेरूप्पू सेतूर, शिवगिरि, वासुदेवनाल्लूर और पुलियांगुडी के बरास्ता मदुराई और शेनकोटा तक एक नयी रेलवे लाइन पर विचार किया जाना चाहिए और वहां रेल सेवा चलायी जानी चाहिए।
जनता की लम्बे अरसे से चली आ रही मांग है कि राजपलायम में लेवल क्रासिंग नं. 449 के स्थान पर एक फ्लाईओवर बनाया जाना चाहिए। मेरा रेलवे से अनुरोध है कि नियमों एवं सर्वे के कामों जिनमें बेवजह देरी होती है- का हवाला देने के बजाय जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस परियोजना को हाथ में लेने की कोशिश की जानी चाहिए।
रेलमंत्री नेे पहले इरोड और शेनकोट्टा के बीच एक सवारी गाड़ी चलाने की घोषणा की थी, वह अभी कागजों पर ही है। इसके बजाय इरोड और शेनकोट्टा के बीच एक्सप्रेस टेªन नं. 6609 को एक साप्ताहिक टेªक के रूप में चलाने की बात कह गयी थी, उसे भी बंद कर दिया गया है। मेरा रेल मंत्रालय से अनुरोध है कि उसे एक दैनिक सवारी गाड़ी के रूप में फिर से शुरू किया जाये। कोल्लाम और पुन्नालुर के बीच गेज बदलने का काम बड़े लम्बे अरसे से लम्बित पड़ा है जिससे उस रूट के अनेक कस्बे और गांव वस्तुतः अलग-थलक पड़ गये है, इस काम में तेजी लायी जाये।
सभी रेलवे स्टेशनों पर सेवा सुविधाओं में वृद्धि की जानी चाहिए और उनके बुनियादी ढांचे को बढ़ाया जाना चाहिए। शौचालयों, प्लेटफार्मों और छतों में सुधार किया जाना चाहिए। डिवीजनल रेलवे मैनेजर यथासंभाव ऐसे होने चाहिए जो स्थानीय भाषा को जानते है इसके बिना सेवा और जनता के बीच सही संबंध नहीं बन पाता। अतः मेरा रेल मंत्री से अनुरोध है कि डीआरएम की नियुक्ति में स्थानीय भाषण को जानने वाले लोगों को नियुक्ति करने के पहलू को ध्यान में रखा जाये।
जो स्कीमें और परियोजनाएं लम्बे अरसे से लम्बित पड़ी है। पर्याप्त पैसे से देश अनेक काम में तेजी लायी जानी चाहिए। रेलवे को सुनिश्चित करना चाहिए कि इसकी सेवाओं के निजीकरण की प्रवृत्ति को खत्म किया जाये, रेलवे में खानपान की गुणवत्ता को बेहतर बनाया जाये।

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