Saturday 30 January 2010

अलगाववादी नारों से सावधान

कांग्रेस के नेतृत्व वाली संप्रग-2 सरकार ने जिस जल्दबाजी में अर्द्धरात्रि को अपनी अदृश्य एवं स्तुतियोग्य उच्च कमान का हवाला देते हुए पृथक तेलंगाना राज्य बनाने की घोषणा की उसकी देश भर में जो प्रतिक्रिया होनी थी, वही हुई। देश के लगभग हर प्रांत में अलग राज्य के जो अविकसित भ्रूण गर्भ में पड़े थे, उन्हें हवा पानी देकर जीवित करने की कोशिशें तेज हो गईं तो आंध्र प्रदेश में विभाजन के विरोध में ऐसा आन्दोलन खड़ा हुआ कि सारा देश दांतों तले उंगली दबा गया। पृथक तेलंगाना अब बन ही जाना चाहिए इससे हमें ऐतराज नहीं। लेकिन जब संसद में भाकपा ने सुझाव दिया था कि इससे पूर्व सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाई जानी चाहिए, उसे न बुलाकर भारी अवसरवादी रवैये का परिचय दिया गया।
अब यह बात साफ हो गई है कि महंगाई की विकराल समस्या का निदान तो दूर उसको रोकने तक में नाकाम संप्रग-2 की सरकार जनता की अन्य समस्याओं को भी सुलझा नहीं पा रही है, उसने जनता का ध्यान बंटाने और उसे क्षेत्रीय आधार पर बांटने की गरज से ही इस मुद्दे को यह रूप दे डाला। देश के दूसरे राज्यों की तरह उत्तर प्रदेश में भी पृथक राज्यों के कई अविकसित भ्रूण जो जन समर्थन न मिलने के कारण गर्भ में सोये पड़े थे, को जगाने की कोशिश अन्य किसी ने नहीं सत्तासीन प्रदेश की मुखिया ने ही की। पहले उन्होंने प्रदेश को बांटकर तीन राज्य बना डालने और अगले ही दिन उसे चार भागों में बांटने को खत केन्द्र सरकार को लिख डाले। ऊपर से तुर्रा यह कि प्रदेश की जनता को उकसाया कि वह राज्य विभाजन के लिए सड़कों पर उतर कर संधर्ष करे। इस उकसावे को प्रदेश की जनता से विनम्रतापूर्वक ठुकरा कर साबित कर दिया कि वह एक अविभाजित उत्तर प्रदेश को ही अपने सीने से लगाये हुये है।
यहां राज्य की मुखिया के बारे में ही आम जनों की राय है कि अन्यों की भांति वह भी जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। महंगाई, जमीनों का अधिग्रहण, सूखा, बाढ़, अपराधों की बाढ़, भ्रष्टाचार और यहां तक दलितों और महिलाओं के उत्पीड़न को रोक पाने में असफल साबित हुई हैं। अतएव प्रदेश की जनता का ध्यान विभाजन की ओर मोड़ना और उसकी एकता को टुकड़े-टुकड़े कर देना ही उनका लक्ष्य है। शासक पूंजीपति वर्ग की कोई भी पार्टी ऐसा करेगी ही यह स्वाभाविक है। लेकिन इन उकसावों के बावजूद प्रदेश की जनता तो खामोश बनी ही रही, उन परम्परागत शक्तियों, जो पृथक राज्य की मांग पर जब तब अपनी राजनीतिक रोटियां सेकती रहती हैं, की भी आगे जाने में हिचकिचाहट यह दर्शाती है कि उन्हें जनता की भावना का अहसास है।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोकदल हरित प्रदेश के नाम पर राजनीति करता रहा है। लेकिन उसका जातीय आधार गन्ने, आलू, बिजली, पानी के सवालों पर तो उनके साथ जुटता है, हरित प्रदेश के नाम पर कभी नहीं जुटा। जुटे भी क्यों? पृथक राज्य की बात पिछड़े भागों से उठे, यह तो माना जा सकता है लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश को विकसित होने का दावा करने वाला लोकदल अपने मुद्दे को ही न्यायोचित नहीं ठहरा पाता। उसकी आवाज इस भ्रामक प्रचार पर टिकी है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की आमदनी का 80 प्रतिशत भाग पूर्व को भेज दिया जाता है। यह उतना ही भ्रामक है जितना गरीबी, बेरोजगारी आदि के लिए पूर्व जन्म के कार्यों को जिम्मेदार ठहराना।
अलग बुन्देलखंड की मांग उठाने वालों को भी जन समर्थन नहीं मिल पा रहा। बुन्देलखंडवासी जानते हैं कि उस क्षेत्र के विकास की जरूरत है कि जिसके लिए केन्द्र और राज्य दोनों ही सरकारों को प्रयास करने होंगे। झारखंड, छत्तीसगढ़ आदि का उदाहरण भी उनके सामने है जहां अलग राज्य बनने के बाद दल-बदलुओं, जनता की सम्पत्तियों का दोहन करने वालों तथा पूंजीपति-उद्योगपतियों के हाथों बिकने वालों के हाथ में शासन तंत्र चला गया। बुन्देले यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि उनकी यह दशा क्षेत्र के सामंती और पूंजीपतियों के बेइंतहा शोषण के कारण है। बुन्देलखंड का जनमानस अच्छी तरह समझता है कि अलग राज्य बनने के बाद तो पूरा शासन तंत्र इन्हीं शोषकों के हाथों चला जाएगा और जनता की निर्मम लूट होगी।
निश्चित ही पूर्वांचल बुन्देलखंड के बराबर न सही लेकिन पिछड़ा हुआ है। क्षेत्र के पिछड़ेपन को दूर करने की आवाज वहां भी उठती है और इस आवाज को समूचे प्रदेश से समर्थन मिलता है। पूर्वांचल के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए ठोस कदम उठाये जाने चाहिए। लेकिन अलग राज्य बनने के बाद संसाधन कहां से आयेंगे और कैसे विकास होगा, इन बातों को जनता गहराई से सोचती है। अतएव कुछ चुके मोहरों की कोरी बयानबाजी के अलावा पूर्वांचल के लोगों ने मुख्यमंत्री के सड़कों पर उतरने के तुर्रे को कोई महत्व नहीं दिया।
फिर अंतिम बचा मौजूदा प्रदेश का वह भाग जहां राजधानी लखनऊ है। यह इलाका दूसरे क्षेत्रों के लोगों को अपने में समाहित करने के लिए विख्यात है, जहां अलगवादी मांग कभी उठी ही नहीं।
दरअसल छोटे राज्यों में जनता की ताकत कम हो जाती है और शोषक पूंजीपतियों की ताकत बढ़ जाती है। छोटे सूबों की सरकारें खरीद-फरोख्त के इस दौर में आसानी से पूंजीपतियों द्वारा मैनेज कर ली जाती हैं और किसान-मजदूरों को उसका परिणाम भुगतना पड़ता है। हरियाणा का उदाहरण सामने है जहां हाल ही में मजदूरों के कई आन्दोलनों को उद्योगपतियों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हित में सरकार ने कुचलने की कोशिश की।
उत्तर प्रदेश के मौजूदा स्वरूप में किसानों-मजदूरों की संयुक्त ताकत है जिसके बल पर सरकार के झपट्टे से एक हद तक संयुक्त आन्दोलन चलाकर वे बच पाते हैं। दादरी की भूमियों के अधिग्रहण के सवाल पर भाकपा-जनमोर्चा के नेतृत्व में प्रदेश भर में आन्दोलन चलाया गया और आज मामला किसानों के पक्ष में है। लेकिन यही किसान और कामगारों की ताकत अलग-अलग राज्यों में बंट जायेगी तो उनके सामने सरकार के हाथों पहंुच लुटने-पिटने के अलावा कुछ शेष नहीं होगा।
प्रदेश की जनता को इस पर गौरव है कि मथुरा, काशी, अयोध्या, गोरखनाथ, नैमिषारण्य, देवा जैसे गौरवशाली सांस्कृतिक स्थल उसके पास हैं। ताजमहल और अवध के स्मारक उसकी हृदयस्थली में हैं। अवध-आगरा संयुक्त प्रदेश के गौरव को समेटे भव्य विधान भवन उसके पास है। गंगा, यमुना, बेतवा, घाघरा, शारदा, राप्ती जैसी नदियाँ उसके वक्षस्थल को प्रक्षालित करती हैं। खेती, बागवानी और उद्योगों में वह अग्रणी है। हिन्दी की उपभाषाओं - ब्रजभाषा, अवधी, भोजपुरी, बुन्देली और खड़ी बोली के साथ उर्दू सभी का यहां अलग ही महत्व है। ऐसे में प्रदेश की एकता और एकता के भीतर ही विकास यहां की जनता का सपना है जिसे तोड़ने की कोशिशों को जनता बर्दाश्त नहीं करेगी।

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