Friday 22 January 2010

प्रजातंत्र के कुत्ते

व्यंग्य
रोज की तरह सुबह सैर करने को निकला तो मुझे देखकर नुक्कड़ वाली नीम के नीचे सोया मरियल कुत्ता पंजे झाड़ कर उठ खड़ा हुआ। इससे पहले शायद ही मैंने उसे अपने पांव पर खड़े देखा हो। किसी ने रोटी डाल दी तो उसी प्रकार लेटे-लेटे खा ली नहीं तो हरि इच्छा।
नजदीक आने पर वह मेरे पांव के पास आकर कुंऽकुंऽऽ करने लगा। मैंने भरपूर नजर से उसे देखा, उसने भरपूर नजर से मुझे देखा, सहानुभूति अंकुरित तो होनी ही थी। फिर अचानक वह जोर-जोर से भौंकने लगा। मुझे लगा भूख उसे भौंकने को मजबूर कर रही है। सहानुभूति का अंकुर दया में परिवर्तित होने लगा। मैं उल्टे पांव घर लौटा और रात की बासी रोटी पत्नी से मांग कर लाया और उसी सहानुभूति के भाव से उसे भेंट कर दी। उस पट्ठे ने रोटी की तरफ मुंह उठाकर देखा तक नहीं। मुझे लगा यह जरूर कोई खानदानी है, भूखा मर जाना मंजूर किन्तु बासी रोटी नहीं खाएगा।
वह उसी तरह भौकते-भौकते पड़ोस वाली गली में गया और भौकते-भौकते तुरन्त लौट भी आया। इस बार उसने अपने अगले दोनों पांवों से हाथों का काम लेते हुए झंडा थाम रखा था, जिस पर लिखा था - ‘रोटी नहीं वोट चाहिए’। मैं एकदम सकते में आ गया। आखिर कुत्तों को भी वोट की अहमियत का पता चल गया। देखते ही देखते कई कुत्ते उसी प्रकार अगले दोनों पांवों से हाथों का काम लेते हुए उसी प्रकार के झंडे थामे हुए वहां पर इकट्ठे हो गए। वे सब एक सुर में भौक रहे थे यानी अपने प्रिय उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार के लिए तैयार थे।
मैं अपनी हैरानी से उबरता कि शर्मा जी दिखाई दे गए। शर्माजी आर.डब्लू.यू. के प्रेसीडेंट थे। मुझे हैरान परेशान होते हुए देखकर बोले - ”क्यों गुप्ताजी! खबर बनती है या नहीं?“ मैं उनका आशय नहीं समझा, इसलिए आंखें फाड़-फाड़ कर उनकी ओर देखने लगा।
”अरे भाई अपने चहेते उम्मीदवार को चुनाव का टिकट न मिलने के कारण पार्टी के सभी कार्यकर्ता बागी हो गए। अब नए कार्यकर्ता कहां से लाएं? इसीलिए यह तरीका निकाला है।“
पर शर्मा जी, यह तो सिर्फ भौक ही सकते हैं, वोटरों को प्रभावित तो नहीं कर सकते।“
इस बार शर्मा जी ने भेदभरी मुस्कान बिखेरते हुए कहा, ”कार्यकर्ता क्या करते हैं? शोर मचाकर भीड़ ही तो इकट्ठी करते हैं। वे क्या बोल रहे हैं, उन्हें खुद पता नहीं होता।“
”पर शर्मा जी राजनीति इस स्तर पर आ जाएगी, इसकी तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी“ मैंने हताश होकर कहा।
”भइया जी प्यार और तकरार में सब जायज है, देश तरक्की पर है, फिर घिसे-पिटे तरीकों का क्या मतलब?“
मैं इसका क्या जवाब देता। अब कुत्तों के भौंकने पर प्रजातंत्र का दारो-मदार होगा। मैंने वहां से खिसकना ही बेहतर समझा। गली पार कर पार्क तक पहुंचा तो वहां अजीब दृश्य था। एक सज्जन तमाम कुत्तों को इकट्ठा करके उन्हें दो पांवों पर चलने का अभ्यास करा रहे थे। एक सज्जन पार्टी के झंडों पर अलग-अलग इबारत लिख रहे थे। मैं वहीं पर ठिठक गया। जानने की इच्छा भी थी, घिर जाने की आशंका भी थी, पर मैं वहां से हिल नहीं सका। ‘चमत्कार’ चैनल के संवाददाता और कैमरामैन मेरे पहुंचने से पहले ही इस घटना को दिलचस्प खबर बना कर कैमरे में कैद करने में मशगूल थे। मुझे देखकर ‘चमत्कार’ के संवाददाता मेरी ओर मुखातिब हुआ।
”क्यों गुप्ताजी ‘चमत्कार’ के अनुकूल है न यह खबर?“
मैं क्या कहता.... कुछ कहने को था ही नहीं। दरअसल मैं वहां से भाग जाना चाहता था। पता नहीं उसने या उसके कैमरामैन ने भूरे बाबा को कब इशारा कर दिया कि भूरे बाबा के इशारे पर तमाम कुत्तों ने मेरे गिर्द घेरा डाल दिया। वे सब सुर-ताल में भौक रहे थे। भूरे बाबा दूर बैठे अपने सोड़े दांत निकाल कर हंस रहे थे और अपनी खिचड़ी दाढ़ी में सूखी भिण्डी जैसी उंगलियां लगतार फिरा रहे थे।
‘चमत्कार’ के संवाददाता ने कुछ ज्यादा ही संजीदा होते हुए कहा - ”जब तक आप भूरे बाबा का इण्टरव्यू लेकर प्रसारित नहीं करते तब तक ये कुत्ते आपके इर्द-गिर्द भौक-भौक कर लगातार अपना प्रस्ताव पेश करते रहेंगें।“
मेरे लिए यह एक विकट समस्या थी। इस तरह की स्थिति में मैं इससे पहले कभी पड़ा नहीं था, पर मार्किट में आजकल इस तरह की चीजें धड़ल्ले से बिक रही हैं। हर चैनल इसी तरह का कोई न कोई नायाब नुस्खा लेकर आ रहा है। पिछले दिनों एक चैनल ने एक गांव का किस्सा निर्मित किया। वहां रामचरित मानस की कथा सुनने हर शाम को एक सांप आता और कथावाचक से थोड़ी दूर पर पसर जाता, किसी कोई कुछ नहीं कहता, उसकी इस श्रद्धा से श्रोता (टेलीविजन के दर्शक) भाव-विभोर हो गये; चर्माेत्कर्ष और भी निराला ज्योंही कथा सम्पन्न हुई नाग देवता ने प्राण त्याग दिए। दर्शक वाह-वाह कर उठे, क्या पुण्य आत्मा थी। चैनल की बल्ले-बल्ले। इस संस्मरण से मेरा उत्साह बढ़ा। कुत्तों का चुनाव प्रचार भी दिखाया जा सकता है, जरूर दिखाया जा सकता है। कुत्ता सांप की तरह दहशत तो पैदा नहीं करता।
मैंने बाबा की मुस्कराहट का जवाब उसी प्रकार मधुर मुस्कान से दिया। कुत्तों ने ना जाने कैसे यह भांप लिया कि बात बन गई इसीलिए अनुशासित सिपाही की भांति पंक्तिबद्ध होकर वे बाबा के पीछे जा बैठे। कुत्ता स्वामीभक्त होता है, इतना तो मैंने सुन रखा था परन्तु कुत्ता इतना अनुशासित भी होता है, यह मैं पहली बार देख रहा था। टाॅकी, जैकी जैसे कुत्तों की बात अलग है, वह नसलें ही दूसरी होती हैं, जो हिन्दी के बजाए मालिक की अंग्रेजी हिदायतों का अनुसरण करना पसंद करते हैं। मालिक के इशारे पर करतब करके दिखाते हैं और इस प्रकार नमक का हक अदा करते हैं। इस प्रकार ये कार्यकुशल कुत्ते कार्यकर्ताओं से अधिक प्रभावी हो सकते हैं। कल्पना कीजिए जब अगले दोनों पांव उठाकर उनमें पार्टी का घोषणापत्र थाम कर कुत्ते जंतर-मंतर से गुजरेंगे तो कैसा मंजर होगा? अपनी इस कल्पना से मैं स्वयं ही गदगद हो गया।
मैं भूरे बाबा के सम्मुख आज्ञाकारी शिष्य की तरह पालथी मारकर बैठ गया। बाबा ने तनाव मुक्त होने के लिए तम्बाकू और चूना मिलाकर हथेली पर रगड़ा, फटकी मारी और चुटकी में लेकर जीभ के नीचे दबा लिया। लगा तैयारी पूरी हुई।
”बाबा, आपको यकीन है कि यह नौटंकी कामयाब होगी?“
बाबा ने पिच्च करके एक ओर थूका, फिर थोड़ा संजीदा होकर बोले - ”आप पत्रकारों के साथ यही दिक्कत है। सही स्थिति के लिए गलत भाषा का इस्तेमाल करते हैं। अरे भाई, यह नौटंकी नहीं, यह एक सांस्कृतिक अनुष्ठान है। पंक्ति के बीचों-बीच वह जो भूरे रंग का कुत्ता बैठा है, वह कोई साधारण कुत्ता नहीं है। उसके पूर्वज ने सशरीर महाराज युधिष्ठर के साथ स्वर्गारोहण किया था। हम भारतीय संस्कृति को भूलते जा रहे हैं। हम इसके सिर पर मुकट पहना कर इस बात को दर्शाएंगे। उसको उसके पूरे परिचय के साथ प्रस्तुत करेंगे।“
”आपके पास क्या सबूत है कि यह कुत्ता उसी का वंशज है?“ मैं आदतन कह बैठा।
बाबा बिगड़ गये। बोले - ”तुम्हारे पास क्या सबूत है कि तुम अपने ही बाप की सन्तान हो, अरे भाई तुम्हें तुम्हारी मां ने ही तो बताया न कि वह तुम्हारे पिता हैं। इसी प्रकार हमें भी संत ज्ञानियों ने यह बताया।“
मेरे शरीर से चिन्गारियां निगलने लगी। शरीर कांपने लगा, पर मैं कुत्तों के सामने कुत्तों जैसी कोई हरकत नहीं करना चाहता था। गुस्सा पी गया, चूंकि मेरे सामने टीआरपी का सवाल था, मैं अगर बाबा से बिगाड़ता तो कोई दूसरा इस प्रोजेक्ट को लपक लेता। यह मैं किसी कीमत पर भी होने नहीं देना चाहता था।
”अरे भाई जब फिल्मी सितारे लिखे हुए भाषण को मंच पर लटके झटके साथ पढ़कर मतदाताओं को रिझा सकते हैं तो फिर ये कुत्ते अगर लिखित इबारत लेकर मतदाताओं के सामने उपस्थित होते हैं तो किसी को क्या एतराज हो सकता है।“ बाबा आत्मविश्वास से लबरेज थे।
नायक कुत्ते को गौर से देखने पर उसके वंश के बारे में मेरे सारे सन्देह जाते रहे। जंतर-मंतर पर उस मुकुटधारी कुत्ते को चलते देखने की कल्पना मुझे हौसला दे रही थी। मुझे यकीन था कि हमारा ‘चमत्कार’ चैनल सब चैनलों को पानी पिला देगा।
”यदि आपकी सरकार बनती है तो इन कुत्तों की स्थिति सुधारने के लिए आपके पास कोई योजना है?“ मैंने आखिरकार पूछ ही लिया।
”है, है क्यों नहीं। हम आगे की सोचकर ही कोई कदम उठाते हैं। एक तो यह कि कोई किसी कुत्ते को अपने दरवाजे से दुत्कारेगा नहीं, अन्यथा उस पर उचित कानून के अन्तर्गत कार्रवाई की जाएगी। अगर भारतीय दंड संहिता में ऐसी कोई धारा नहीं होगी तो उसे डाला जाएगा। कोई कुत्ता, कुत्ते की मौत नहीं मरेगा। मरणोपरांत उसे सद्गति मिलेगी, जो सर्वसाधारण को मिलती है।“
बाबा का उत्साह देखकर मेरे मन में फिर प्रश्न उभरने लगे। रोज-रोज होने वाली प्रेस कांफ्रेसों ने हमारी आदत जो बिगाड़ दी है।
”बाबा, यह बताने की कृपा करें कि ये सब किस प्रकार संभव हो पाएगा?“
बाबा ने दाढ़ी में उंगलियां फिराते हुए कहा - एक आश्रम के निर्माण की हमारी योजना है जहां कुत्तों और मनुष्यों के बीच फासले को पाटने की कोशिश की जाएगी। उसकी देख रेख के लिए एक ट्रस्ट बनाई जाएगी।
उसके बाद कुछ पूछना बाकी नहीं रहा था यद्यपि कई सवाल मुझे साल रहे थे, शंकाओं को दबा कर मैंने बाबा को प्रणाम किया, प्रणाम किए बिना साक्षात्मकार पूरा जो नहीं होना था, मैं मन ही मन स्वयं को तसल्ली दे रहा था कि प्रणाम वाले दृश्य को प्रसारण से पूर्व सम्पादित कर दिया जाएगा, बाबा को कहां याद रहेगा यह सब।
लौटते हुए लगा कि मैं घुटनों तक पानी में चल रहा हूं, कपड़ों को गीला होने से बचाने का व्यर्थ प्रयास कर रहा हूँ, पर टीआरपी वाली बात भी अपनी जगह सच थी, बल्कि यही एक मात्र सच था। किसी सीरियल के एक विदूषक संवाद बार-बार मेरे कानों से टकरा रहा था -
”पैसा फेकों मुंह पे मैं कुछ भी करूंगा।“

का. केवल गोस्वामी

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